ऐसे बने थे अटल जी पत्रकार
स्रोत:    दिनांक 29-दिसंबर-2018
 -देवेन्द्र मिश्र                          
अटल जी राष्ट्रधर्म और पाञ्चजन्य के प्रथम संपादक थे। भाऊराव जी और दीनदयाल जी के प्रयासों से 1947 में राष्ट्रधर्म शुरू हुआ और उसके संपादन का दायित्व अटल जी को दिया गया और इस तरह वे पत्रकार बने
बार में छापेखाने में छपाई की नई तकनीक और उसकी बारीकियों को समझते अटल जी।
अटल जी उत्कृष्ट राजनेता, यशस्वी संपादक, कवि और पत्रकार होने के साथ-साथ अच्छे कम्पोजिटर भी थे। बात 1980 की है, जब मैं बतौर मुख्य उप संपादक रांची से प्रकाशित दैनिक 'रांची एक्सप्रेस' में कार्यरत था। उस समय यह बिहार का अकेला अखबार था, जहां फोटो टाइप सेटर (पीटीएस) के जरिए कम्पोजिंग होती थी। अटल जी जब भी रांची आते, 'रांची एक्सप्रेस' के मालिक सीताराम मारू के यहां जरूर आते थे। 1980 में वे आए तो उन्हें पीटीएस लग जाने के बारे में बताया गया। वे पीटीएस की तकनीक और इसकी बारीकियों-विशेषताओं को देखने पे्रस पहुंच गए। वे कुर्सी पर बैठ गए और काफी देर तक तकनीक को समझने का प्रयास करते रहे। इसी दौरान उन्होंने बताया कि वे 'हैण्ड कम्पोजिंग' करना भी जानते हैं। 'राष्ट्रधर्म' के संपादन के दौरान कभी-कभी करना पड़ता था।
अटल जी के पत्रकार बनने की कहानी भी काफी दिलचस्प है। बात 1947 की है। उन दिनों भाऊराव जी देवरस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, उत्तर प्रदेश के प्रांत प्रचारक थे और दीनदयाल जी उपाध्याय सह प्रांत प्रचारक। संघ के कार्यक्रमों में अटल जी कविता-पाठ किया करते थे। खूब तालियां बजती थीं। भाऊराव जी और दीनदयाल जी की नजर में यह युवा, प्रखर और ओजस्वी कवि आ गया। जुलाई के महीने में दीनदयाल जी, भाऊराव जी और अटल जी की बैठक हुई। तय हुआ कि संघ के प्रचार-प्रसार के लिए एक मासिक पत्रिका निकाली जाए। किसी ने नाम सुझाया 'राष्ट्रधर्म'। अटल जी इसके पहले संपादक बने।
31 अगस्त, 1947 को रक्षाबंधन पर राष्ट्रधर्म का पहला अंक प्रकाशित हुआ। इस अंक में दीनदयाल जी ने 'चिति' नाम से एक लेख लिखा था, जिस पर आगे चल कर कई लोगों ने शोध किया। इस अंक के पहले पन्ने पर संपादक अटल बिहारी वाजपेयी की कविता प्रकाशित हुई थी, 'हिंदू तन मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय, मैं शंकर का वह क्रोधानल, कर सकता जगती क्षार क्षीर।' यह कविता बाद में बहुत मशहूर हुई।
'राष्ट्रधर्म' के पहले अंक की 3,000 प्रतियां प्रकाशित हुई थीं। उस दौर में कोई भी हिंदी पत्रिका 500 से अधिक नहीं छपती थी। राष्ट्रधर्म की सभी प्रतियां हाथों-हाथ बिक गईं तो 500 और प्रतियां छापनी पड़ीं। राष्ट्रधर्म के दूसरे अंक की 8,000 और तीसरे अंक की 12,000 प्रतियां छपी थीं। अटल जी कुछ ही महीने इस पत्रिका के संपादक रहे।
'राष्ट्रधर्म' की सफलता से उत्साहित संघ ने 'पाञ्चजन्य' नाम से एक साप्ताहिक भी निकालने का फैसला किया। इसके भी पहले संपादक की जिम्मेदारी अटल जी को ही मिली। 1948 में मकर संक्रांति के अवसर पर पाञ्चजन्य का पहला अंक प्रकाशित हुआ। उनके साथ काम करने वाले लोग बताते थे कि संपादन का उनका अंदाज वाकई निराला था। उन दिनों लेटर प्रेस होने के कारण कम्पोजिंग आज जैसी आसान नहीं थी। अंतिम दौर में पता लगता था कि चार-छह पंक्तियों की जगह खाली छूट रही है। कम्पोजिटर दौड़ा-दौड़ा आता था कि कुछ और पंक्तियां दे दीजिए, जिससे जगह भर जाए। अब लेख हो, गीत हो या कविता, अटल जी तुरंत उसमें चार-छह पंक्तियां बोलकर जुड़वा देते थे। अटल जी के साथ-साथ भाऊराव जी और दीनदयाल जी ने भी कम्पोजिंग सीख ली थी।