डर तो है, पर किससे !
स्रोत:    दिनांक 31-दिसंबर-2018
 
भारत आज भी ऐसा देश है जहां शराब पीने वालों के मुकाबले शराब को न छूने वालों की संख्या ज्यादा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शराब की खपत के आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। इसकी पड़ताल करने वाले बखूबी जानते हैं कि इस देश की परंपरा, नैतिकता, भावनात्मकता और आस्थाओं का संगम लोगों को ‘कॉकटेल’ से दूर करता है। और किसी को हैरानी हो सकती है, परंतु हम भारतीयों को इस बात से कोई आश्चर्य नहीं होता। भावनाएं हैं तो प्रकट होती हैं। परंपराएं हैं तो उनका पालन होता है। आस्था है तो अगाध है। हम ऐसे हैं, क्योंकि हम भारतीय सदियों से ऐसे ही हैं।
ऐसे में जब फिल्मी कलाकार नसीरुद्दीन शाह ने ‘गाय’ की हत्या की ‘पुलिसकर्मी’ की हत्या से तुलना करने की शरारती इरादों में लिपटी गेंद फेंकी तो सोशल मीडिया की प्रतिक्रियाओं में उस गेंद की ठुकाई पर किसी को हैरानी नहीं हुई। किसी भी मुद्दे पर कानून को हाथ में लेना गलत है। तिस पर भी हत्या! यह तो बर्बरता है। मगर क्या गाय आज से इस समाज की शृद्धा का केंद्र है? क्या भारत की स्वतंत्रता और उसमें भी केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार बनने के बाद से ही भारत के लोग गो-ग्रास निकालने लगे हैं?
नसीरुद्दीन शाह को यह जानना चाहिए कि1872 में ब्रिटिश राज के दौरान गोहत्यारों को सबक सिखाने वाले ‘कूका’ आंदोलनकारी कौन थे? कौन थे जो इस देश की आजादी और आस्था की लड़ाई में अपनी जान झोंककर लड़ रहे थे और अंग्रेजों द्वारा तोपों के मुंह से बंधवाकर उड़ा देने पर भी जिनके आंदोलन का उबाल ठंडा नहीं पड़ा? तोप और बंदूक के बल पर दमन करने वाले अंग्रेज बाहर से आए मगर तोप-तलवार से न दबने वाले लोग मंगल ग्रह से नहीं आए थे। वे यहीं के, इसी माटी के लोग थे।
गोरक्षा में हिंसा न हो, इसकी चिंता करने के साथ ही गोहत्या न हो, इस बात को सुनिश्चित किए बिना इस भावुक-आस्थावान समाज का आक्रोश कैसे थामा जा सकता है। दुनिया में और कहीं हो न हो, किन्तु शराब के ठेके खुलने पर भी इस देश के लोग भड़क उठते हैं। गाय कटने पर तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचता है। बुलंदशहर जैसी घटनाओं को सिर्फ उत्पात के तौर पर देखना नासमझी ही कही जाएगी। यहां सिर्फ जनाक्रोश नहीं बल्कि उन्मादी तत्वों की हद से गुजरती शरारत और जनता की शिकायतों पर ऊंघते प्रशासन की कहानियां भी हैं। ऐसे में नसीरुद्दीन सरीखे कलाकार एक घटना के अधकचरे तथ्यों को ‘नैरेटिव’ के तौर पर स्थापित करने की भूमिका निबाहते लगते हैं। बात सिर्फ नसीरुद्दीन की नहीं, बात सिर्फ गाय की नहीं, किसी हत्या को सही ठहराने का सवाल भी नहीं, बात ऐसी पूरी लामबंदी की है जो उस भारतीय समाज की गलत छवि स्थापित कर रही है जो स्वभावत: शांत, भावुक, संवेदनशील और नैतिकता का पालन करने वाला है। इस समाज से किसे डर लगता है? सेकुलर तस्बीह फिराती ‘भारत तोड़ो ब्रिगेड’ को इस समाज की शांति और एकता से डर लगता है।
हैरानी तब होती है जब ‘डर’ और ‘असहिष्णुता’ का हौवा खड़ा करने वाले चेहरे आईएस जैसे दुर्दांत इस्लामी संगठनों की भारत में बढ़ती दिलचस्पी से, नौजवानों की भर्ती से, आतंकियों की धरपकड़ से जरा नहीं घबराते। इन्हें ‘भारत तोड़ो’ के नारों से डर नहीं लगता बल्कि वहां इन्हें भविष्य की राजनीति के लिए मुफीद मासूम चेहरे दिखते हैं। कोई हैरानी नहीं कि किसी दिन प्रगतिशील राजनीति का कोई प्यादा कह बैठे कि उसे ‘गाय के बछड़े से ज्यादा मासूम जिहादी आतंकी’ लगता है। कट्टर पीएफआई को सहलाती कांग्रेस को जनेऊ दिखाने और केरल में सड़क पर बछड़ा काटकर खाने का स्वांग आता होगा, नसीरुद्दीन सरीखे कलाकारों को भी डर बेचने की कला आती होगी, परंतु इस देश के लोग भोले हैं। इन भोले लोगों को दोहरे-दोमुंहे दल और किरदारों से डरना चाहिए। यह डर लाजिम है, जरूरी है।