अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर झूठी खबरें फैला रहा सेकुलर मीडिया
स्रोत:    दिनांक 07-दिसंबर-2018

अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर मुख्यधारा मीडिया का एक वर्ग हर वह काम कर रहा है जिससे भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान होता हो। इस काम में उसका एक मजबूत अस्त्र है कार्टून। कार्टूनों के जरिए गंभीर बातें भी हल्के-फुल्के ढंग से कह दी जाती हैं। जिनके खिलाफ कार्टून होते हैं आमतौर पर वह भी इनका बुरा नहीं मानते। लेकिन जब कार्टून का इस्तेमाल सेना जैसी संस्था को नीचा दिखाने के लिए किया जाए तो शक पैदा होता है। इकोनॉमिक टाइम्स ने एक कार्टून के जरिए सेना पर ऐसी भद्दी टिप्पणी की जिसकी अनुमति कोई भी स्वाभिमानी समाज नहीं दे सकता।
उधर, करतारपुर गलियारे के बहाने कई पत्रकारों को पाकिस्तान के भ्रमण का मौका मिला। कुछ तो इतने अभिभूत थे कि सोशल मीडिया से लेकर अपने संस्थानों तक पर पाकिस्तान की तारीफ के पुल बांधे जा रहे थे। जो देश भारत में आतंक फैलाने के लिए बदनाम रहा है उसके प्रति कुछ पत्रकारों का यह प्रेम अपने आप में बहुत कुछ कहता है।
अयोध्या में राम मंदिर के मुद्दे पर भी मीडिया के इसी वर्ग ने भ्रम फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कुछ प्रमुख चैनलों ने दिखाया कि अयोध्या में मुसलमान अपने घर और दुकानें छोड़कर जा रहे हैं। यह पूरी तरह से मनगढ़ंत रिपोर्ट थी।
जो चैनल घरों के बंद दरवाजे दिखा रहे थे वह बाहर बैठकर उन्हीं घरों के सदस्यों के इंटरव्यू भी ले रहे थे। अयोध्या के इतिहास में आजतक कभी हिंदुओं ने मुसलमानों पर हमला नहीं किया, लेकिन इस बार हिंदुओं के खिलाफ यह झूठ बहुत सोचे-समझे तरीके से फैलाया गया। अयोध्या में हुई धर्मसभा को कुछ चैनलों ने 'शक्ति प्रदर्शन' का नाम दिया।
अंदमान के सेंटिनल द्वीप पर कन्वर्जन की मंशा से गए एक ईसाई मिशनरी की वहां मौत की खबर आई। कुछ अखबारों और चैनलों की पहली कोशिश यह साबित करने की थी कि वह एक सामान्य पर्यटक था। यह मौका था जब भारत में कर्न्वजन के प्रयासों पर एक व्यापक बहस छिड़ती। लेकिन किसी भी चैनल या अखबार ने इतना साहस नहीं दिखाया। एनडीटीवी ने तो यह बहस आयोजित की कि उन वनवासियों को मुख्यधारा में लाया जाना चाहिए। स्पष्ट है कि उसकी मंशा अवैध रूप से घुसपैठ करने वाले ईसाई मिशनरी के कृत्य को सही साबित करने की थी। इंडियन एक्सप्रेस समेत कुछ अखबारों ने उस घुसपैठिये की मृत्यु के लिए 'मर्डर' शब्द का इस्तेमाल किया। जबकि अब तक तकनीकी रूप से पुलिस ने भी इसे ‘हत्या’ नहीं कहा है।
भाजपा सरकार आने के बाद से बहुतों की शिकायत है कि देश में बोलने की आजादी छिन गई है। लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है जब मीडिया उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के बयानों को गलत तरीके से दिखाने का साहस करने लगा है।
सबसे पहले टाइम्स नाऊ चैनल ने बताया कि योगी आदित्यनाथ ने राजस्थान में एक जनसभा में कहा है कि ‘हनुमानजी दलित थे’। टाइम्स नाऊ से होते हुए यही खबर तमाम हिंदी अखबारों और चैनलों तक पहुंच गई। किसी ने जरूरत नहीं समझी कि एक बार वह वीडियो सुन ले कि आखिर योगी आदित्यनाथ ने क्या कहा है। सोशल मीडिया पर आम लोगों ने योगी के बयान का सही वीडियो डाला तब जाकर मीडिया के झूठ की पोल खुली।
विधानसभा चुनाव की सभाओं में राहुल गांधी और कांग्रेस के दूसरे नेता लगातार कह रहे कि केंद्र सरकार ने उद्योगपतियों के कर्ज माफ कर दिए। मीडिया इसे आंख मूंद कर दिखाता भी है। जबकि यह बात साबित हो चुकी है कि ऐसी कोई कर्जमाफी नहीं हुई है। इसके बजाय केंद्र सरकार वह हजारों करोड़ रुपये वसूल चुकी है, जो कांग्रेस के समय सरकारी बैंकों के जरिए बांटे गए थे।
सवाल यह है कि मीडिया इस झूठ में भागीदार क्यों बन रहा है? इसी तरह पेट्रोल-डीजल, गैस और रुपये की कीमतों पर भी चुनावी सभाओं में गलतबयानी हो रही है और मीडिया उसे जस का तस दिखा रहा है।