ब्राह्मणवाद’ का नाम लेकर हो रही हिंदू समाज को तोड़ने की कोशिश
स्रोत:    दिनांक 07-दिसंबर-2018
एक साजिश के तहत देश ही नहीं विदेशों में ब्राह्मणों को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करके भारत की सामाजिक संरचना को न केवल नीची निगाह से देखा जाता है, बल्कि उसकी आड़ लेकर हिन्दुत्व पर प्रहार किया जाता है। ऐसे लोगों का मूल उद्देश्य ‘ब्राह्मणवाद’ की आड़ में हिन्दुत्व और भारतीयता पर निशाना साधना है
भारत यात्रा के दौरान ट्विटर के सीईओ जैक डोरसी ‘ब्राह्मणवाद’ से जुड़े एक विवादित पोस्टर (चित्र में ऊपर) को लेकर काफी आलोचना का सामना कर रहे हैं
पश्चिमी देशों के आम लोग भारत की संस्कृति-सभ्यता के बारे में बहुत कम ही जानते हैं। लेकिन एक बात वे सभी जानते हैं कि भारत में ‘अमानुषिक’ जाति व्यवस्था है, जो हिन्दुत्व का एक महत्वपूर्ण अंग है। उनमें से अधिकांश जानते हैं कि ‘ब्राह्मण उच्च वर्ग से हैं, जो निचली जातियों का दमन करते हैं।’ इसके साथ ही सबसे बुरी हालत में वहां के अस्पृश्य हैं।
यह बात मैंने प्राथमिक विद्यालय में ही जान ली थी, लेकिन उस समय मुझे कुछ ही साल पहले के नाजी दौर के यातना शिविरों या उपनिवेशवाद के अत्याचारों के बारे में कुछ भी नहीं पता था। वर्ष 1960 के दशक के आरंभ में जर्मनी स्थित बावेरियन स्कूली पाठ्यक्रम में भारतीय जाति व्यवस्था के बारे में पढ़ाया जाता था जिसमें ब्राह्मणों को खलनायक के रूप में पेश किया जाता था। तब से आज तक यही स्थिति बनी हुई है। कुछ समय पहले मैंने ऋषिकेश में तीन युवा जर्मनों से पूछा कि वे हिंदू धर्म के साथ प्रमुख रूप से क्या जोड़ते हैं। उनका उत्तर था ‘जाति व्यवस्था।’ निश्चित रूप से, उन्होंने यह भी पढ़ा था कि यह अत्यंत अमानवीय है। पूरी संभावना है कि दुनिया भर के स्कूली बच्चों को ‘अमानवीय’ जाति व्यवस्था के बारे में पढ़ाया जाता है लेकिन क्यों? क्या इसके पीछे एक खास मकसद है ?
इसमें कोई दो राय नहीं कि जाति व्यवस्था है और अस्पृश्य भी हैं। यह भी सच है कि ऐसी व्यवस्था पूरी दुनिया में मौजूद है। दिलचस्प बात है कि ‘जाति’ के लिए प्रयुक्त अंग्रेजी शब्द ‘कास्ट’ पुर्तगाली शब्द है। मतलब कि यह मूलत: भारतीय शब्द भी नहीं है। प्राचीन वेदों में चार वर्णों का उल्लेख है - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, जिनसे मिल कर समाज के ढांचे का निर्माण होता है। ठीक वैसे जैसे सिर, हाथ, जांघ और पैरों आदि से मिलकर मनुष्य का शरीर बनता है। यह एक सुंदर तुलना है, जिसका तात्पर्य है कि सभी भाग महत्वपूर्ण हैं। ठीक है कि सिर को ज्यादा सम्मान दिया जाएगा, लेकिन क्या आप पैरों की अनदेखी कर सकते हैं? सत्य यही है कि सभी लोगों को बौद्धिक श्रम में नहीं लगाया जा सकता क्योंकि किसानों, व्यापारियों और श्रमिकों के बिना समाज का निर्माण संभव नहीं होगा। सभी को अपनी भूमिकाओं का निर्वाह करना होगा और भविष्य में ये भूमिकाएं बदल भी सकती हैं। वर्ण मूल रूप से वंशानुगत नहीं था। यह किसी के प्रमुख गुणों (चारित्रिक लक्षणों) और उसके पेशे पर निर्भर था। ब्राह्मणों का काम विशेष रूप से वेदों को याद रखना था और भविष्य की पीढ़ियों के लिए उन्हें सही ढंग से संरक्षित करना था।
ब्राह्मण वेदों की शुद्धता के संरक्षक थे। तो यह समझ में आने वाली बात है कि वे उन लोगों से दूरी बनाके रखते थे जो मृत जानवरों को हटाने या मल व्ययन के काम में लगे होते थे। हालांकि, समाज को इन कामों के लिए भी लोगों की जरूरत होती है। पश्चिम में भी लोग इन पेशों में लगे लोगों के साथ हाथ नहीं मिलाते। लेकिन इस बात को कोई मुद्दा नहीं बनाता। अपने सात्विक गुणों के कारण, इस बात की संभावना बहुत कम थी कि ब्राह्मण समाज के अन्य समूहों के लिए अपमानकारी हों। आम तौर पर यह उन समूहों की प्रवृत्ति होती है जो खुद को सामाजिक रूप से किसी अन्य समूह से ऊपर का मानते हैं। यह लाक्षणिक प्रवृत्ति दुनिया के सभी समाजों में है, लेकिन यह सच है कि दुर्भाग्यवश कालांतर में भारत में चार वर्णों में श्रेणीकरण जन्म से होने लगा। आज बहुत से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने वर्ण-धर्म का पालन नहीं करते हैं और इसलिए उन्हें कोई वर्ण विरासत में मिला नहीं मानना चाहिए।
लेकिन, भारत की सामाजिक संरचना को लगातार नीची निगाह से क्यों देखा जाता है, जबकि पश्चिम की सबसे ऊंची जाति के रूप में स्वीकृत कुलीन समुदाय के लोग भी कामगारों के साथ मेलजोल नहीं रखते और उनके आसपास नहीं रहते। इस बात पर किसी ने कोई नाराजगी क्यों नहीं दिखाई कि अंग्रेजों के शासनकाल में कर्नाटक के मडिकेरी शहर स्थित एक क्लब समेत पूरे देश भर में अनेक ऐसे क्लब और सार्वजनिक स्थान थे जो केवल श्वेतों के लिए थे? उस दौर को देखने वाले एक भारतीय सज्जन ने मुझे बताया कि ऐसे स्थानों पर लिखा होता था ‘कुत्तों और भारतीयों को आने की अनुमति नहीं है।’ कोई भी इस बात पर क्षुब्ध क्यों नहीं होता कि ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की कृषि नीति ने ढाई करोड़ भारतीयों को भूखा मार दिया? एक ऐसे देश के ढाई करोड़ पुरुष, महिलाएं और बच्चे दाने-दाने को मोहताज होकर भुखमरी से यंत्रणादायी मौत का शिकार बने जो अंग्रेजों के कब्जे से पहले दुनिया का सबसे अमीर देश था। इंटरनेट पर भारतीयों की ऐसी भयानक तस्वीरें उपलब्ध हैं जिनमें वे केवल त्वचा और हड्डियों का ढांचा भर दिखते हैं। कोई इस बात पर नाराज क्यों नहीं होता कि दास प्रथा की समाप्ति के बाद भी अंग्रेजों ने छोटी-छोटी नौकाओं में ठूंस-ठूंस कर मजदूरों को दुनिया भर में भेजा। इनमें से बहुत से मजदूरों की मौत तो रास्ते में ही हो गई और जो जीवित बचे, उन्हें भयावह यातनाओं का शिकार होना पड़ा। कोई इस मुद्दे पर बात क्यों नहीं करता कि मुस्लिम आक्रांताओं ने हिंदुओं, खासकर ब्राह्मणों के साथ क्या किया। वे कितने क्रूर थे? उनके हमलों में कितने हिंदू मारे गए या फिर दास बना लिए गए? कितनी हिंदू महिलाओं ने सामूहिक आत्मदाह कर खुद को आक्रांताओं के हाथ पड़ने से बचाया? आजकल, आईएसआईएस जैसे संगठनों को देखकर हम कल्पना कर सकते हैं कि उस दौर में क्या हुआ होगा। फिर भी वामपंथी और यहां तक कि ‘ब्रिटिश सांसद’ इन सब बातों से चिंतित नहीं हैं। अलबत्ता, वे भारत की ‘अमानवीय जाति व्यवस्था’ से चिंतित हैं।
यह बात मानने में कोई हर्ज नहीं कि औपनिवेशिक आकाओं ने 1871 में शुरू हुई जनगणना के माध्यम से उस समय तक मौजूद वर्णों की परिवर्तनीयता को खत्म करके जातियों के बीच अलगाव पैदा करने की कोशिश की और आज, उनके लोकतांत्रिक उत्तराधिकारी, किसी राजनीतिक शक्ति के बिना भी जोड़-तोड़ करने वाले मीडिया और यहां तक कि संसदीय कानून के सहारे अपने ही देश में अलगाव पैदा करने की कोशिश करते हैं।
मेरा मत है कि ब्राह्मणों ने दूसरों से भेदभाव करके या उन्हें हीन समझ कर जो अपराध किया वह सब वास्तव में ईसाई उपनिवेशवादियों और मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा किए गए अत्याचारों की तुलना में लगभग नगण्य है। ऐसे में जाति-व्यवस्था के तथाकथित अत्याचारों का इतना अधिक प्रचार क्यों? वास्तव में इसका कारण उन लोगों पर से ध्यान हटाना हो सकता है जिन्हें वास्तव में भारत में अपने अतीत और वर्तमान के कृत्यों के लिए दोषी महसूस करना चाहिए। इन अत्याचारों के दोषी ब्राह्मण नहीं हैं। बहुत से ब्राह्मण आज मुख्य रूप से आरक्षण के कारण पीड़ित हैं और बहुत गरीब होने के बावजूद वे पांथिक अल्पसंख्यकों या निचली जातियों को मिल रहे लाभों से वंचित हैं। लेकिन यही एकमात्र कारण नहीं है कि जाति व्यवस्था और ब्राह्मणों का दुनिया भर में मानमर्दन किया जा रहा है। महत्वपूर्ण मकसद यह है कि ब्राह्मणों को शर्मिंदा करना है, ताकि वे अपने पूर्वजों को दोषी मानें और उन्हें वेदों को पढ़ने और पढ़ाने के अपने मूल धर्म का पालन करने के प्रति अनिच्छुक बने रहें। इस षड्यंत्र का लक्ष्य है कि भारत से वैदिक ज्ञान खत्म हो जाए क्योंकि यह ईसाइयत और इस्लाम के लिए खतरा बन सकता है। यह उनके तथाकथित ‘प्रकट सत्य’ को चुनौती देता है। वैदिक ज्ञान तर्कपूर्ण है, इसीलिए ईसाइयत या इस्लाम के पूरी दुनिया में विस्तार में सबसे बड़ी बाधा है।
दुर्भाग्य से, बहुत सारे वैदिक ग्रंथ पहले ही लुप्त हो चुके हैं। कांचीपुरम के पूर्व शंकराचार्य स्वामी श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती ने अपनी पुस्तक- द वेदाज- में लिखा है कि वेदव्यास ने 5 हजार साल पहले चारों वेदों को जिन 1180 शाखाओं में विभाजित किया था उनमें से केवल आठ ही वर्तमान में प्रचलित हैं। समय आ गया है कि ब्राह्मणों का मान-मर्दन तथा भारतीय जाति व्यवस्था को मानवता की सबसे खराब व्यवस्था के रूप में चित्रित करना बंद हो। ऐसा करने वालों की हरकतें कितनी नकली और खोखली हैं, इसे इतने भर से समझा जा सकता है कि ये लोग आईएसआईएस जैसे संगठनों के बारे में भी निर्विकार भाव से बातें करते हैं। आईएसआईएस के लड़ाकों से यौन-संबंध न बनाने पर दर्जनों यजीदी महिलाओं को लोहे के पिंजरे में जला कर मार दिया था। लेकिन इस पर इनके मन में कोई नकारात्मक भावना या निंदा के भाव नहीं पैदा होते।
कुछ समय पहले, मैंने दक्षिण भारत के एक मंदिर में एक वृद्ध ब्राह्मण दम्पति को देखा था। उनका व्यक्तित्व गरिमापूर्ण था, लेकिन वे दोनों बहुत दुबले-पतले थे। जब प्रसाद वितरित किया जा रहा था उस समय वे कतार में मेरे आगे थे। बाद में मैंने देखा कि वे फिर से कतार में मौजूद थे। शायद उनकी गरीबी ने उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर किया था। ब्राह्मणों को अपने पूर्वजों के बारे में अपराध-बोध से पीड़ित नहीं होना चाहिए। उलटे, वे गर्व कर सकते हैं कि केवल उन्हीं लोगों के कारण भारत एकमात्र ऐसा देश है जहां कम से कम आंशिक रूप से ही सही बहुमूल्य, प्राचीन ज्ञान संरक्षित है। अपराध-बोध से ग्रस्त तो दूसरों को होना चाहिए, लेकिन वे ढीठ हैं और ऐसा नहीं करेंगे। इसके बजाय, वे हिंदू धर्म और ब्राह्मणवाद के खिलाफ बेवजह घृणा फैलाते हुए वातावरण को दूषित करना जारी रखेंगे।
(लेखिका मूलत: जर्मन नागरिक हैं जो भारत में रहकर हिन्दुत्व से संबंधित मुद्दों पर ब्लॉग लिखती हैं।)
कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना
‘शॉर्टहैंड’ लेखन का ऐसा तरीका है जिसके माध्यम से तेज गति से कही जा रही बात को लिखा जा सकता है। जिन्हें यह लेखन विधि पता है वे अपने चिह्नों का अर्थ अच्छी तरह से जानते हैं। अन्य लोगों के लिए वे निशान कागज पर पड़ी आड़ी-तिरछी रेखाएं भर होते हैं। पश्चिमी देशों में इस्रायल के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों में यहूदियों के लिए अक्सर ‘जूस’ या ‘येहोवाई’ शब्दों का प्रयोग किया जाता है। ये दोनों शब्द वास्तव में यहूदियों के लिए संकेताक्षर हैं ताकि स्थानीय कानून उन्हें यहूदियों के खिलाफ हिंसा भड़काने के आरोप में न फंसा सके। इसके बावजूद, दुनिया भर के यहूदी विरोधियों को उनका असली अर्थ पता है। इसी तरह ‘ब्राह्मणवाद’ ‘ब्राह्मणीय’ शब्द हिंदुओं के लिए संकेताक्षर हैं। भारत में काफी समय से एक धंधा जैसा चल रहा है— कन्वर्जन कर लो, लेकिन हिंदू नाम मत छोड़ो। हिंदू होने का नाटक करते हुए हिंदुत्व की विसंगतियों के खिलाफ जिहाद शुरू करो और जकात से धन जुटाओ। चूंकि वामपंथियों का दावा है कि हिंदू धर्म की सभी बुराइयों का कारण ब्राह्मण हैं, तो इसे ब्राह्मणवाद या ब्राह्मणीय व्यवस्था के खिलाफ युद्ध का नाम दिया जा सकता है। ऐसा करने से आप कानून से बचे रहेंगे लेकिन आपको धन देने वाले आपकी खूब प्रशंसा करेंगे और बदले में आपको सीधे-सीधे धन या किसी फिल्म में भूमिका या पश्चिम के किसी संस्थान की फेलोशिप या फिर किसी पत्र-पत्रिका के प्रमुख का दायित्व मिल जाएगा।                                                                                                                             - भरत शर्मा की फेसबुक वाल से