सिनौली में उभरी सरस्वती कालीन सभ्यता, वामपंथी झूठ की खुली पोल
स्रोत:    दिनांक 20-जून-2018
   

विश्व के पुरातन व गौरवशाली भारतीय इतिहास को ब्रिटिश इतिहासकारों ने विकृत करने का चरम प्रयास किया , लेकिन उनका विकृत सिद्धांत अब दम तोड़ चुका है। उत्तर प्रदेश के बागपत के सिनौली में अभी तक हुए उत्खनन से साबित हुआ है कि सरस्वती नदी के किनारे विकसित हुई सभ्यता ही वैदिक सभ्यता थी , जिसे वामपंथियों ने सिंधु घाटी सभ्यता नाम दिया था। खुदाई में निकले सारे पुरावशेषों ने हमारे वेदों में लिखी बातों को सिद्ध कर दिया है कि आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे और विश्व की सबसे प्राचीन और विकसित सभ्यता भारत की ’वैदिक सभ्यता ’ थी।

 सिनौली में हुए उत्खन्न में मिले योद्धाओं के हथियार, बर्तन व अन्य वस्तुएं    
 
वेदों में सरस्वती का वर्णन है जिसके किनारे पर ही वैदिक सभ्यता विकसित हुई , लेकिन अंग्रेजों ने भारतीयों को उनके गौरवशाली इतिहास की परंपरा से वंचित करने के लिए पूरा इतिहास ही बदल दिया। अंग्रेजी सभ्यता में पोषित हुए वामपंथी इतिहासकारों ने भारत के मूल निवासी आर्यों को बाहरी आक्रमणकारी बताया। यह बातें भारत में बच्चों को लंबे समय से पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाई जा रही है। इसमें आर्यों को भारत पर आक्रमण करके नई सभ्यता की स्थापना करने वाला बताया जा रहा है। वामपंथियों ने तो सरस्वती नदी के अस्तित्व को ही नकार दिया। उत्तर प्रदेश के बागपत जनपद स्थित सिनौली गांव में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा किए गए उत्खनन से वामपंथियों को प्राचीन भारतीय इतिहास को दोएम दर्जे का बताने का पूरा षड्यंत्र उजागर हो गया है।

सिनौली में निकले वैदिक काल के प्रमाण

 
इतिहासकार डाॅ . कृष्णकांत शर्मा  

सिनौली गांव में 2005 में एएसआई द्वारा हुए उत्खनन के क्षेत्रीय संयोजक व वरिष्ठ इतिहासकार डाॅ. कृष्णकांत शर्मा का कहना है कि बागपत की धरती से निकल रहे पुरावशेष वैदिक सभ्यता के ही है। वैदिक सभ्यता उस समय भी पूर्ण विकसित थी। यहां से निकले ताम्रजड़ित रथ , तांबे के हथियार और अन्य सामान वैदिक काल में बहुतायत से प्रयोग होते थे। वेदों में शवों को जलाने और दफनाने दोनों प्रकार से अंतिम क्रिया करने का उल्लेख है। सिनौली में मिले विशाल शवाधान केंद्र में भी शवों को दफनाया और जलाया जाता रहा है। शवों को दफनाने के प्रमाण के रूप में 177 कंकाल और जलाने के प्रमाण के रूप में राख के ढेर उत्खनन में मिले। सिनौली में मिले कंकालों की कार्बन डेटिंग पद्धति से पड़ताल से साबित हुआ कि वह चार से पांच हजार वर्ष पुराने है। ऐसे में रथ का इन कंकालों के साथ मिलना साम्राज्यवादी इतिहासकारों के सिद्धांत को पूरी तरह से पलट रहा है।  

अंग्रेजों ने गढ़ा , रथों में बैठकर आए थे आर्य

 
इतिहासकार डाॅ . अमित पाठक  

सेंटर फॉर आर्मड फोर्सेज हिस्टोरिकल रिसर्च नई दिल्ली के फेलो डॉ. अमित पाठक का कहना है कि अंग्रेजों ने अभी तक भारतीयों को बताया है कि आर्यों ने ईसा से 1500-2000 वर्ष पूर्व भारत पर आक्रमण किया था। आर्य रथों में बैठकर आए थे और भारत की सभ्यता को रौंदकर नई सभ्यता की नींव रखी। अंग्रेजों का दावा था कि आर्यों से पहले तक यहां बैलगाड़ी थी , घोड़ा गाड़ी नहीं। अब सिनौली में हुए उत्खनन से साबित हो गया कि रथ यहां पर प्राचीन काल से प्रयोग में आते थे और आर्य भी बाहरी नहीं थे। आर्कियो-जेनेटिक्स से भी साबित हो चुका है कि भारतीयों के डीएनए , क्रोमोजोम में पिछले 12 हजार वर्ष में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।

भगवान श्रीकृष्ण ने रखा था बागपत का नाम


 
इतिहासकार डाॅ . कृष्णकांत शर्मा  

ठतिहासकार डॉ. कृष्णकांत शर्मा का कहना है कि सिनौली में उत्खनन के दौरान मिले रथ और ताबूत फिर से महाभारत कालीन संस्कृति की तरफ इशारा करते हैं। महाभारत के उद्योग पर्व में वर्णन है कि कौरवों से संधि वार्ता के लिए जाते वक्त भगवान श्रीकृष्ण वृकस्थल नामक जगह पर ठहरे थे। इस क्षेत्र के आतिथ्य और वाकपटुता से खुश होकर श्रीकृष्ण ने क्षेत्र को वाकप्रस्थ नाम दिया। मान्यता है कि तब का वाकप्रस्थ ही आज का बागपत है। उत्खनन में पांच हजार साल पुरानी सभ्यता इस बात की पुष्टि करती है कि तब भी इस क्षेत्र के लोग तांबे और सोने का उपयोग करते थे। महाभारत के धर्मयुद्ध का इस पूरे क्षेत्र से जुड़ाव रहा है।

यमुना नदी के किनारे से बने रास्ते या जंगल से भगवान श्रीकृष्ण छपरौली क्षेत्र में पहुंचे। यहां वाकप्रस्थ अब बागपत से होते सीधे हस्तिनापुर गए। कुरुक्षेत्र का मैदान भी यहीं से नजदीक है और बरनावा का लाक्षागृह भी इसी क्षेत्र के आसपास पड़ता है। इससे यहां महाभारत कालीन संस्कृति की अधिक पुष्टि होती नजर आती है। इतिहासकारों का कहना है कि महाभारत के प्रमाणों को नकारा नहीं जा सकता है। अब तमाम प्रमाण इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जुड़ाव सीधे महाभारत काल से है। सिनौली में यह तो साबित हुआ ही है कि पांच हजार साल पहले यह पूरा क्षेत्र सिर्फ आबाद नहीं था , बल्कि बेहद विकसित था। ऐसे में महाभारत से इस क्षेत्र के जुड़ाव को नकारा नहीं जा सकता है।

वाकप्रस्थ का उल्लेख महाभारत के उद्योग पर्व में है:

वृकस्थलं समासाद्य केशवः परवीरहा।

प्रकीर्णरश्मावादित्ये ज्योग्नि घै लोहिषतायति।। 20।।

अवतीर्य रथात् तूर्णे कृत्या शौचं यथाविधि।

रथमोचनमादिश्य संध्यामुपविवेश ह।। 21।।

सिंधु घाटी सभ्यता ही वैदिक सभ्यता

 
इतिहासकार अमितराय जैन  

बड़ौत में पुरावशेषों को संरक्षित रखने वाले शहजाद राय प्राच्य शोध संस्थान के निदेशक व वरिष्ठ इतिहासकार अमितराय जैन का कहना है कि वामपंथी इतिहासकारों ने जिस सभ्यता को सिंधु घाटी सभ्यता कहा है , असल में वहीं वैदिक या महाभारतकालीन सभ्यता है। पूरे उत्तर भारत में वैदिक सभ्यता के अवशेष धरती के अंदर है और अब वह उत्खनन में सामने आ रहे हैं। सिनौली में उत्खनन में मिले लकड़ी के रथ पर बड़े पैमाने पर तांबे का इस्तेमाल मिला है। इसके साथ ही मुट्ठे वाली तलवार , तांबे की कीले , कंघी काॅपर होर्ड कल्चर का प्रतिनिधित्व करती है। रथ के लकड़ी का हिस्सा तो मिट्टी हो चुका है , लेकिन तांबा जस का तस है। उत्खनन से मिला ताबूत और उसके आसपास मिला सामान प्रमाणित करता है कि यह शवाधान केंद्र किसी राज परिवार का रहा होगा। इससे पता चलता है कि अंग्रेजों द्वारा गढ़ा गया इतिहास पूरी तरह मनगढ़ंत और मिथ्या है।

वामपंथियों का गढ़ रहा है एएसआई

इतिहासकारों का कहना है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण समय-समय पर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में उत्खनन करता रहा है। इस उत्खनन में प्राचीन भारतीय सभ्यताओं के अवशेष भी मिले , लेकिन एएसआई के पुरातत्वविदों ने वामपंथी विचाराधारा के होने के कारण अपनी रिपोर्ट में वैदिक सभ्यता का उल्लेख नहीं किया। एएसआई में वामपंथी पुरातत्वविदों का वर्चस्व होने के कारण आज तक वैदिक सभ्यता के अवशेषों की अनदेखी की जाती रही और किसी भी रिपोर्ट में इसका उल्लेख नहीं किया गया। बागपत जनपद के कई स्थानों पर मिले पुरातात्विक अवशेषों की प्रारंभिक रिपोर्ट एएसआई को भेजकर उत्खनन की मांग की गई , लेकिन सिनौली और बरनावा में ही खुदाई की गई। इस खुदाई में ही वैदिक सभ्यता के अवशेष मिल गए। इतिहासकारों ने सिनौली में 2005-2007 में हुई खुदाई की समग्र रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की। वर्तमान में उत्खनन करने वाले एएसआई के पुरातत्वविद अभी भी इस संस्कृति को वैदिक सभ्यता कहने से बच रहे हैं।


 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहले भी मिल चुके हैं साक्ष्य

एएसआई को उत्खनन में पहले भी वैदिक सभ्यता के अवशेष मिले हैं। उस समय भी एएसआई ने इसे सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष कहा था। सहारनपुर में भी हड़प्पाकालीन सभ्यता के अवशेष मिले थे तो मेरठ के आलमगीरपुर उखलीना गांव में वैदिक सभ्यता के अवशेष मिले। हस्तिनापुर के प्राचीन टीले पर 1953 में वरिष्ठ पुरातत्वविद प्रो. बीबी लाल की खुदाई में महाभारत काल के अवशेष मिले थे। उस समय मिले चित्रित धूसर मृदभांडों को प्रो. बीबी लाल ने महाभारत का करार दिया था।


 

रावण से भी जुड़ा है क्षेत्र का इतिहास

बागपत के रावण उर्फ बड़ागांव का इतिहास रामायण काल से जुड़ा है। बागपत के इतिहास पर शोध करने वाले डाॅ. कुलदीप त्यागी का कहना है कि लंकापति रावण ने ही रावण उर्फ बड़ागांव की स्थापना की थी। उन्हीं के नाम पर गांव का नाम रावण पड़ा। सरकारी रिकॉर्ड में भी रावण नाम ही दर्ज है। किवदंती है कि गांव से गुजरते समय रावण इस गांव के पास रूका था और वहां एक तालाब में स्नान करके मंशा देवी मंदिर की स्थापना की थी। इस तालाब को आज रावण कुंड के नाम से जाना जाता है। मंशा देवी मंदिर के पास ही इतिहासकारों को कुषाण काल की सभ्यता के बर्तन , शवाधान केंद्र , किले की दीवार मिल चुकी है। यहां के मंशा देवी मंदिर में प्रतिहार कालीन भगवान विष्णु की दशावतार की मूर्ति मौजूद है। इस मंदिर के खंभों पर प्राचीन कला के चिन्ह मिलते हैं। इसके अलावा सिरसलगढ़ , रटौल , बामनौली , रंछाड़ आदि गांवों से भी कुषाणकाल , गुप्त काल आदि के अवशेष मिल चुके हैं।


 

                                             सिनौली में उत्खनन में मिले रथ के अवशेष  दिखाते हुए इतिहासकार 

बरनावा में निकले कई सभ्यताओं के अवशेष

एएसआई की खुदाई में बरनावा स्थित लाक्षागृह में कई सभ्यताओं के अवशेष निकले। इतिहासकार इन्हें महाभारत काल , कुषाण काल , गुप्तकालीन सभ्यता के साक्ष्य बता रहे हैं। लाक्षागृह में ही दुर्योधन ने पांडवों को जलाकर मारने का षड्यंत्र किया था।


 

                                     उत्खनन में मिली योद्धाओं की तलवार व अन्य प्राचीन हथियार  

पश्चिमी उत्तर प्रदेश को आधार बनाकर किया जा रहा शोध

2005 में सिनौली में हुई खुदाई इतिहासकारों के प्रारंभिक सर्वेक्षण का परिणाम रही। इतिहासकारों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को आधार बनाकर एक टीम का गठन किया। शहजाद राय शोध संस्थान के शोध निदेशकों की टीम जिसमें वरिष्ठ इतिहासकार अमित राय जैन , डॉ. केके शर्मा , डॉ. अमित पाठक भी शामिल थे। 2005 में सिनौली उत्खनन ने संपूर्ण विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था। विश्व के सबसे बड़े शवाधान केंद्र के रूप में सिनौली स्थल को माना गया क्योंकि वहां से ताम्रनिधि , स्वर्णनिधि के साथ अत्यंत दुर्लभ प्रकार के पुरावशेष प्राप्त हुए थे। 15 फरवरी 2018 से इतिहासकारों के प्रस्ताव पर बरनावा उत्खनन की टीम ने यहां ट्रायल ट्रेंच लगाया तो उन्हें ताम्रयुगीन सभ्यता की तलवारें आदि प्राप्त हुईं। उत्खनन का कार्य आगे बढ़ा तो वहां से करीब 5000 वर्ष पुरानी सभ्यता के शवाधान केंद्र जोकि दुर्लभतम श्रेणी में रखा जाएगा , प्राप्त हुआ।


 

अमित राय जैन ने बताया कि सिनौली उत्खनन से प्राप्त आठ मानव कंकाल एवं उन्हीं के साथ दैनिक उपयोग की खाद्य सामग्री से भरे मृदभांड , उनके अस्त्र-शस्त्र , औजार एवं बहुमूल्य मनके यह सिद्ध करते हैं कि यहां 5000 वर्ष पुरानी सभ्यता विद्यमान थी। एएसआई के निदेशक को संस्थान द्वारा प्रस्ताव बनाकर भेजा गया है कि अगले सत्र की खुदाई में यहां के काफी बड़े हिस्से को दीर्घ उत्खनन के माध्यम से सामने लाया जाए ताकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश संपूर्ण विश्व की मानव सभ्यता का सिरमौर साबित हो सके।

एक कब्र से मिला 5000 साल प्राचीन रथ

सिनौली में एक कब्रगाह से पूर्व लौह युग या कांस्य युग के एक रथ का प्रमाण मिला है। वैसे तो राखीगढ़ी , कालीबंगन और लोथल से पहले भी कई कब्रगाह खुदाई के दौरान मिले हैं , लेकिन ये पहली बार है जब कब्रगाह के साथ रथ भी मिला है। रथ मिलने के बाद विशेषज्ञों का मानना है कि इससे महाभारत काल में घोड़े के अस्तित्व को लेकर भी कई नए तथ्य सामने आ सकते हैं। पहली बार किसी कब्र से रथ मिला है। उस समय मेसोपोटामिया , जॉर्जिया और ग्रीक सभ्यता में रथ पाए जाने के प्रमाण मिलते हैं लेकिन अब भारतीय उप महाद्वीप में इसके साक्ष्य मिलने के बाद हम कह सकते हैं इन सभ्यताओं की तरह ही भारतीय उप महाद्वीप में भी लोग रथों का प्रयोग करते थे। इस रथ की बनावट बिल्कुल वैसी ही है जैसे इसके समकालीन मेसोपोटामिया आदि दूसरी सभ्यताओं में थी। इस रथ के पहिए की बनावट ठोस है इसमें तीलियां नहीं हैं। रथ के साथ पुरातत्वविदों को मुकुट भी मिला है जिसे रथ की सवारी करने वालों द्वारा पहना जाता रहा होगा। इससे पता चलता है कि वैदिक सभ्यता केवल भारत ही नहीं , बल्कि विश्व के बड़े भूभाग पर मौजूद रही है।

बेमिसाल थी 5000 साल पहले की तकनीक

पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन चुकी सिनौली साइट जिस तरह के रहस्य उगल रही है , वे सभी चैंकाने वाले तो हैं ही साथ ही नए शोध और अध्ययन किए जाने की ओर भी मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। 5000 वर्ष पहले जिस तरह से लोगों द्वारा सोने , ताम्र समेत अन्य धातुओं का प्रयोग किया जाता था , वह अपनेआप में बेहद महत्वपूर्ण हैं। धातुओं का उस समय किया जाने वाला प्रयोग और तकनीक इतनी अधिक बेहतर और शानदार है कि आज के समय में ऐसा प्रयोग केवल मशीनों के माध्यम से ही संभव है। सिनौली उत्खनन स्थल पर एक ट्रायल ट्रेंच स्थानीय इतिहासकारों की मांग पर एएसआई की महानिदेशक डॉ. ऊषा शर्मा के निर्देश पर पुराविद डॉ. संजय मंजुल व डॉ. अरविन मंजुल के निर्देशन में लगाया गया था। साढे तीन माह की अवधि के भीतर ही सिनौली उत्खनन से वह सबकुछ प्राप्त हुआ जिसने पूरी दुनिया के इतिहासकारों , पुरातत्वविदों को सोचने और फिर से शोध कार्य करने पर मजबूर कर दिया। यहां से आठ मानव कंकाल व उनके साथ तीन एंटीना शॉर्ड (तलवारें) , काफी संख्या में मृदभांड , विभिन्न दुर्लभ पत्थरों के मनकें व सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्राप्ति के रूप में 5000 वर्ष प्राचीन मानव योद्धाओं के तीन ताबूत जोकि तांबे से सुसज्जित किए गए हैं। सिनौली में मिली योद्धाओं की तलवारें , कवच और ढाल भी प्राप्त होना 5000 वर्ष प्राचीन युद्धकला का स्पष्ट उदाहरण हैं। महाभारत कालीन रथ और योद्धाओं के ताबूत के साथ ऐसी और भी दुर्लभ स्वर्ण एवं ताम्रनिधि भी प्राप्त हुई है। छोटे-छोटे औजारों की मदद से स्वर्ण की अंगूठी और मनके तैयार किए जाते थे जो कि सिनौली उत्खनन से प्राप्त भी हुए हैं। सोने की बनी इन अंगुठियों की चमक और नक्काशी ऐसी हैं कि आज के समय में भी ऐसी संभव नहीं हैं। रथ समेत अन्य वस्तुओं को तैयार करते समय ज्वाइंट्स को जोड़ने के लिए ताम्र निर्मित कीलों का प्रयोग किया जाता रहा है। ये कीलें भी उत्खनन से पहली बार प्राप्त हुई हैं।

रथ पर मौजूद है दुर्लभ कला

सिनौली उत्खनन से जो ताबूत प्राप्त हुए हैं , उनकी ऊपरी सतह पर महीन और उत्कृष्ठ ताम्र नक्काशी की गई है। एक ताबूत पर आठ मानव आकृतियां मौजूद हैं जिनमें से भगवान पशुपतिनाथ की आकृति भी शामिल हैं। उस समय के लोग निश्चित तौर पर शैव उपासक रहे होंगे तभी उनके द्वारा तैयार की गई नक्कासी में पशुपतिनाथ की आकृति भी शामिल हैं। मानव आकृतियों में उनके हाथों में आयुध (हथियार) , पीपल का पत्ता भी मौजूद हैं जो यह दर्शाता है कि 5000 साल पहले की संस्कृति कितनी विशिष्ट रही होगी।

हथियार बनाने में ताम्र धातु का अधिक होता था प्रयोग

महाभारत काल में वैसे तो स्वर्ण , ताम्र धातु का प्रयोग बहुतायत में होने के प्रमाण मिलते रहे हैं , लेकिन सिनौली साइट से प्राप्त पुरावशेषों से यह बात पुष्ट होती है कि युद्ध में प्रयोग किए जाने वाले हथियारों में ताम्र धातु का प्रयोग सबसे अधिक होता था। निश्चित तौर पर हथियार बनाने में विशेष तकनीक का प्रयोग किया जाता था क्योंकि योद्धाओं के हथियार , कवच , हेलमेट बेहद सलीके से बनाए गए हैं। सिनौली से प्राप्त पुरावशेषों को देखकर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हथियारों को तैयार करने की एक तरह की प्रयोगशाला भी उस समय रही होगी जहां पर इन हथियारों को बनाने में स्वर्ण , ताम्र धातु को गलाने का कार्य किया जाता था।