केरल में जो हुआ वही चर्च का असल चेहरा है
स्रोत:    दिनांक 18-सितंबर-2018
                                                                                                                                              - आशीष कुमार 'अंशु'
द बोस्टन ग्लोब अखबार की खोजी पत्रकारिता पर बनी ऑस्कर विजेता फिल्म 'स्पॉटलाइट' में पादरियों द्वारा किए जाने वाले बाल यौन शोषण को उजागर किया गया है। और यह हो पाया अखबार द्वारा गठित स्पॉटलाइट टीम की खोजी पत्रकारिता की मदद से। कहानी शुरू होती है जॉन गेगन नाम के एक पादरी पर लगे 80 से अधिक कानूनी मामलों के आरोप से। ये सारे मामले सीलबंद थे और सार्वजनिक पहुंच से दूर।
 
 बलात्कार के आरोपी बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ कार्रवाई का लेकर सड़कों पर विरोध प्रदर्शन नन
माइकल स्पॉटलाइट टीम के प्रमुख पत्रकार थे। खोजी पत्रकारों की टीम जब मामले की जांच में जुटी तो एक के बाद एक बलात्कारी पादरियों की संख्या बढ़ती गई और जिन बच्चों का शोषण हुआ, उनकी भी संख्या सैकड़ों में पहुंची। 'स्पॉटलाइट' फिल्म का एक पात्र चर्च में अपने यौन शोषण का वर्णन करता है। वाकया कुछ इस तरह है— ''जब ग्यारह साल का था तो फादर डेविड हॉली ने मेरा यौन शोषण किया। पहले-पहल पादरी हम बच्चों को बड़ा ख्याल रखते थे। लेकिन एक दिन वही पादरी अश्लील बातें करने लगा, तो अजीब लगा। इस घटना को मैंने किसी से साझा नहीं किया। मैं डरा था। मन में डर था कि मेरी बात पर कोई विश्वास नहीं करेगा। एक दिन वही पादरी हमारे सामने अश्लील पत्रिका रख देता है। तब भी मैं किसी को कुछ नहीं कह पाता। एक दिन वही पादरी मेरे सामने बिना कपड़ों के होता है और गलत काम करने के लिए कहता है।'' यह पात्र फिल्म में बताता है कि चर्च के अंदर बच्चों का इस तरह सिर्फ शारीरिक शोषण नहीं होता बल्कि आध्यात्मिक शोषण भी किया जाता है।
अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए द बोस्टन ग्लोब की स्पॉटलाइट टीम को पुलित्जर सम्मान मिला। वर्ष 2015 में ''स्पॉटलाइट'' फिल्म आने के तीन साल बाद केरल नन बलात्कार कांड को देखकर लगता है कि यह पूरा प्रकरण 'स्पॉटलाइट' का ही भारतीय संस्करण है। दशकों से किसी कालीन के नीचे बजबजाती गंदगी के ऊपर से मानों वर्ष 2018 में किसी ने कालीन खींच लिया हो। चर्च के 'सफेदपोश फादर' और 'ब्रदर' के दमकते व्यक्तित्व के पीछे यही कुंठा और सेक्स की भूख छिपी है, जिसे कन्वर्जन के शिकारी वनवासी और वंचित समाज की सेवा के बाने में छिपाए हुए हैं।
इस बात को ढाई महीने से अधिक हुआ जब एक चर्च की नन ने पुलिस के पास शिकायत की, कि उसके साथ जालंधर का रोमन कैथोलिक पादरी बिशप फ्रैंको मुलक्कल दो साल में एक दर्जन से अधिक बार बलात्कार कर चुका है। इस मामले में 29 जून को प्राथमिकी भी दर्ज हुई। मामले के प्रकाश में आते ही कई और नन सामने आईं और उन्होंने भी पादरी मुलक्कल पर शोषण और दुर्व्यवहार का आरोप लगाया। पादरी की घिनौनी हरकत को उजागर होते ही चर्च ने अपनी ताकत का इस्तेमाल किया और मामला दर्ज हो जाने के बावजूद पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। लेकिन मामला फिर भी ठंडा नहीं पड़ा। चर्च के लिए काम करने वाली युवतियों के एक समूह ने बलात्कार पीडि़ता के पक्ष में विरोध प्रदर्शन किया और मामले को न्यायालय ले गई। तब जाकर केरल उच्च न्यायालय ने पुलिस को कार्रवाई करने का निर्देश दिया और पुलिस हरकत में आई। अब तक की यह लड़ाई उस नन के लिए आसान नहीं थी। शिकायत करने के बाद पीडि़ता को धमकियां आने लगीं। उलटे पुलिस ने नन से दस बार से अधिक बार पूछताछ की जबकि पादरी से सिर्फ औपचारिक बात कर खानापूर्ति की गई। यह चर्च की ताकत ही थी कि मामले के इतना तूल पकड़ने के बाद भी एक अजीब तरह की जड़ता देखने को मिली। दूसरी तरफ चर्च की व्यवस्था में नन की जगह बेहद मामूली होने की वजह से चर्च बिशप के साथ खड़ा दिख रहा था। चर्च ने ज्यादती करते हुए पीडि़त नन का खाना-पीना रोक दिया। प्रमुख नन ने बात करना बंद कर दिया। चर्च की तरफ से पीडि़त नन को सभी तरह की मदद रोक दी गई। ऐसी परिस्थिति में राष्ट्रीय महिला आयोग जरूर एक उम्मीद की तरह उसके साथ खड़ा नजर आया। आयोग ने मामले की छानबीन की और एक रिपोर्ट बनाकर केरल सरकार से कार्रवाई करने की मांग की।
न्याय की आस में पीडि़त
केरल में ननों के उत्पीड़न से जुड़े बहुत से ऐसे मामले हैं, जो वर्षों से चर्च के दबाव में दबे पड़े हैं। ठीक से छानबीन होने पर इनकी सचाई देश के सामने आ सकती है। बीते 9 सितम्बर को कोल्लम जिले के पठनपुरम में 55 वर्षीया नन सुसन का शव कुएं से बरामद किया गया। कुएं से पचास मीटर दूर स्थित उनके घर में भी खून के कतरे मिले। लेकिन चर्च के दबाव में पुलिस मामले को दबाने में लगी है।
गौरतलब है कि जब ननों के एक समूह ने कोच्चि में चर्च और पादरी पर कार्रवाई के लिए सड़क पर विरोध प्रदर्शन किया तो ननों के खिलाफ 'मिशनरी ऑफ जीसस' ने विरोध प्रदर्शन किया। यह वही समूह है जिससे पीडि़त नन जुड़ी है। इस समूह का कहना है कि बिशप के खिलाफ झूठ फैलाया जा रहा है। साथ ही नन के चरित्र पर सवाल उठाते हुए यह कहानी फैलाई जा रही है कि उसके अपने एक रिश्तेदार के साथ अवैध संबंध थे। लेकिन क्या इस आरोप के आधार पर नन के साथ बलात्कार को सही ठहराया जा सकता है?
दूसरी तरफ रोमन कैथोलिक बिशप पर दुष्कर्म का आरोप लगाने वाली नन ने इस मामले में वेटिकन को पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई है। उसने भारत में वेटिकन के प्रतिनिधि के समक्ष याचिका दायर कर कहा है,''डर और बदनामी के चलते इस बारे में किसी को नहीं बताया। वह न्याय के लिए वेटिकन के पास इसलिए आई है क्योंकि भारत में 'पवित्र कामों' में चर्च का प्रतिनिधित्व वह ही करते हैं। इसलिए राजदूत मामले में तुरंत दखल दें। जालंधर के बिशप फ्रैंको मुलक्कल और उनके करीबी अपने रसूख का इस्तेमाल कर मामले को भटका रहे हैं। ये लोग पुलिस की जांच को प्रभावित कर रहे हैं। केरल सरकार भी मामले को दबाने का प्रयास कर रही है।''
जिस नन ने अपनी जिन्दगी जीसिस की सेवा में समर्पित कर दी, उसके कौमार्य पर चर्च के प्रतिनिधियों द्वारा सवाल खड़ा करना और उसे 'वेश्या' बताना, क्या 'जीसिस' का अपमान नहीं है? यदि चर्च के अंदर इस तरह युवतियों का उत्पीड़न होता रहेगा तो वह दिन दूर नहीं जब भारत से कन्वर्जन की सिमटती दुकान के साथ—साथ चर्च में सिर्फ पादरी रह जाएंगे, नन एक भी नहीं मिलेगी।
 'कन्फेशन' पर लगे प्रतिबंध
ईसाई समाज के बीच इन दिनों एक नई तरह की बहस चल रही है, जिसमें चर्च और पादरी केन्द्र में हैं। बहस चर्च के अंदर होने वाली कन्फेशन की पुरानी परंपरा पर प्रतिबंध लगाने को लेकर है। कन्फेशन में ईसाई पुरुष-स्त्री अपनी उन बातों को पादरी के सामने स्वीकार करते हैं, जिसे समाज के सामने स्वीकार करना उनके लिए कठिन हो। कन्फेशन पर प्रतिबंध की बहस पिछले दिनों केरल में एक ऑडियो क्लिप के वायरल होने बाद शुरू हुई। जिसमें एक महिला का पति उस घटना के बारे में बता रहा है, जिसके बाद केरल के पादरी समाज में हड़कंप मच गया। इस आडियो में पति बता रहा है कि आरोपियों में से एक पादरी ने शादी के पहले उसकी पत्नी का यौन उत्पीड़न किया, जिसे शादी के बाद भी उसने जारी रखा। ऑडियो में उसने बताया कि बेटी के बपतिस्मा के दौरान उसकी पत्नी ने एक पादरी को यौन उत्पीड़न के बारे में बताया। इस समस्या के समाधान की बजाय पादरी ने पत्नी को गाली देना शुरू कर दिया। दूसरे पादरी ने यौन उत्पीड़न की बात को तीन अन्य पादरियों को बता दिया और उन्होंने भी कथित तौर पर उसकी पत्नी का उत्पीड़न किया।
ऑडियो में मांग की गई है कि सभी आरोपियों को उनके पद से हटा दिया जाए और पीडि़ता की पहचान उजागर न की जाए। इस मामले की शिकायत पिछले दिनों चर्च के अंदर दर्ज कराई गई। पीडि़त महिला के पति ने दावा किया कि उनके पास पांचों पादरियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए पर्याप्त सबूत हैं। शिकायत के बाद मलंकरा ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च ने इन पादरियों को चर्च से निकाल दिया है और कोट्टयम पुलिस ने इनके खिलाफ बलात्कार और छेड़छाड़ का मामला दर्ज कर लिया है। एक राष्ट्रीय अखबार ने पांच पादरियों द्वारा किए गए बलात्कार की संख्या 380 लिखी है। यह पढ़कर पादरियों के प्रति एक आम ईसाई घृणा से ना भर जाए तो क्या करे? उल्लेखनीय है कि कन्फेशन को प्रतिबंधित करने का सुझाव राष्ट्रीय महिला आयोग ने पिछले दिनों दिया जिसके बाद मलांकारा ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च की ओर से यह कहकर इसका विरोध किया गया कि आयोग ईसाई समाज के पांथिक कामों में दखल देने की कोशिश कर रहा है। इस संबंध में केरल के सभी ऑर्थोडॉक्स चर्च में एक पत्र पढ़ा गया, जिसमें आयोग के प्रस्ताव को रद्द करने की मांग की गई।
 
नन से दुष्कर्म का आरोपी बिशप फ्रैंको मुलक्कल 
पादरियों का काला चेहरा
अकेले भारत में ही नहीं, विश्व के कई देशों में पादरियों का काला चेहरा उजागर हुआ है। जर्मन केथोलिक चर्च में 1946 से 2014 के बीच यौन उत्पीड़न के 3677 मामले दर्ज हुए। दर्ज हुए मामलों में प्रत्येक छठा मामला बलात्कार का था। ३३स्र://६६६.२स्र्रीॅी' में प्रकाशित रपट के अनुसार इसमें आधे से अधिक 13 साल से छोटी उम्र के बच्चे हैं। रिपोर्ट तैयार करने में शामिल विशेषज्ञों की राय है कि यौन उत्पीड़न के शिकारों की संख्या जितनी दर्ज हुई है, उससे कहीं अधिक होगी। ऐसे मामले अधिक होंगे जिनका दस्तावेजीकरण नहीं हो पाया है। चर्च ने विशेषज्ञों को दस्तावेजों की मूल प्रति उपलब्ध नहीं कराई। जिन दस्तावेजों तक विशेषज्ञों की पहुंच थी, उनमें 38,000 दस्तावेजों से गुजरने के बाद 1670 पादरियों के नाम सामने आए। आधे से अधिक मामलों की पहचान इसलिए हो पाई क्योंकि पीडि़त ने क्षतिपूर्ति के लिए चर्च को पत्र लिखा था। विशेषज्ञों ने माना है कि इस बात को मानने की अब तक कोई वजह नहीं है कि यौन उत्पीड़न का सिलसिला अब रुक गया है। इसी तरह इस साल एक जांच के दौरान संयुक्त राष्ट्र ने पाया कि लगभग 300 कैथोलिक पादरियों ने पेनसिलवेनिया में 1000 से अधिक बच्चों को अपनी हवस का शिकार बनाया।
बेनकाब हुआ चेहरा
कैथोलिक चर्च की साप्ताहिक पत्रिका 'द इंडियन करेंट' जालंधर के बिशप फ्रैंको मुलक्कल और केरल में कन्फेशन के नाम पर बलात्कार मामले में फंसे पादरियों के पक्ष में खुल कर सामने आ गई है। ए.जे. फिलिप ने 'विलेन एज विक्टिम: व्हाय कॉल सेक्स रेप' शीर्षक से अपने लेख में जो लिखा है, वह पूरे कैथोलिक समाज को शर्मिन्दा करता है। फिलिप ने लिखा है—
''पीडि़त नन ने 13 बार बलात्कार की बात की है, उसने पहले, दूसरे, तीसरे बलात्कार के बाद शिकायत की? इन सबको भूल जाइए। फिलिप के अनुसार यह सब उसने अच्छे पद के लिए किया। दूसरी तरफ फिलिप यह भी लिखते हैं कि 13 बार बलात्कार हुआ है या नहीं, वे कह नहीं सकते, लेकिन सेक्स कभी एक तरफ से बनने वाला संबंध नहीं है। ''
मतलब पूरे आलेख को पढ़कर लगता है कि लेखक तय नहीं कर पा रहा कि पीडि़ता का दावा सही है या नहीं लेकिन वह आरोपी महिला के चरित्र हनन का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहता। एजे फिलिप यह नहीं समझ रहे कि कैथोलिक पत्रिका में अपने लेखन के माध्यम से वे गाहेबगाहे भारतीय समाज को चरित्र का परिचय कैथोलिक चर्च के दे रहे हैं।