दीप-स्तम्भ की तरह चमकेगा भारत
स्रोत:    दिनांक 01-जनवरी-2019
इस देश का युवा जिस दिन विज्ञान, निर्माण और खेल के क्षेत्र में गोल्ड मेडल पाएगा, उस दिन माना जाएगा कि हमने मंदिर बनाया है।हमें राष्ट्र निर्माण का मंदिर बनाना है, तभी भारत ऊंचा उठेगा
 
युवा कुंभ में अपने विचार रखते दत्तात्रेय होसबाले 
सन 1974 -75 की बात है। आपातकाल का दौर था। देश मेें लोकतंत्र के खिलाफ आपातकाल लागू कर दिया गया था। जय प्रकाश नारायण ने युवा आन्दोलन का नेतृत्व किया था। उस समय वह युवा नहीं थे। उनकी आयु 73 वर्ष की हो चुकी थी। उस समय में भी उन्होंने युवा आन्दोलन की अगुआई की। उम्र के उस पड़ाव पर उनका स्वास्थ भी बहुत ठीक नहीं रहता था। सप्ताह में दो बार डायलिसिस होती थी। मगर लोकतंत्र के विरोधियों से देश को मुक्त कराने के लिए उन्होंने युवा आन्दोलन का नेतृत्व किया। देश भर में जगह-जगह प्रवास किया। युवाओं के साथ कार्य करके वे भी ऊर्जावान हो गए थे। उसी तरह मुझे भी युवाओं से ऊर्जा मिलती है। जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी अपना प्रबोधन दे रहे थे, उस समय मंदिर निर्माण की बात युवाओं के बीच से उठी थी। बिल्कुल ठीक बात है, मंदिर बनना चाहिए। हम चाहते हैं कि मंदिर बने और इन्हीं लोगों के हाथों से बने। मगर उसके साथ ही समूचे विश्व को समता-ममता के आधार पर पृथ्वी को एक कुटुम्ब के रूप में देखना होगा। इस काम की अगर कहीं से शुरुआत होगी तो भारत से ही होगी। हमारे जवान देश की सीमा पर सुरक्षा करते हैं। हमें उन सैनिकों का ख्याल रखना पड़ेगा। उन सैनिकों के परिवारों का सम्मान इस देश के युवाओं को करना होगा। यह विश्वास दिलाना होगा कि इस समाज में उन सैनिकों और उनके परिवारों का सम्मान किया जाता है।
आज भारत पिछड़ा नहीं है। मेडिकल, इंजीनियरिंग समेत तमाम क्षेत्रों में शोध का कार्य आगे बढ़ रहा है। भारत के नौजवान किसी से पीछे नहीं हैं। इस देश का नौजवान जिस दिन विज्ञान के क्षेत्र में, निर्माण के क्षेत्र में और खेल के क्षेत्र में गोल्ड मेडल पाएगा, उस दिन माना जाएगा कि हमने मंदिर बनाया है, मंदिर निर्माण इसको कहा जाएगा। हमें राष्ट्र निर्माण का मंदिर बनाना है। कुछ मेट्रो और सेतु बना देने को ही विकास नहीं कहते। जिनको दो समय का भोजन नहीं मिल पा रहा है, उनके लिए नौजवानों का दायित्व बनता है कि उनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाने का प्रयत्न करें। उनके लिए प्रयास करके रोजगार का अवसर पैदा करें। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि इस देश के शिक्षित लोगों ने धोखा दिया है, जो लोग शिक्षित हो गए, उन्होंने शिक्षा तो प्राप्त कर ली मगर उसके बदले में क्या दिया। इन शिक्षित लोगों को कम से कम एक व्यक्ति को साक्षर बनाना चाहिए था मगर ऐसा नही हुआ। हर शिक्षित व्यक्ति, एक व्यक्ति को शिक्षित करता तो उन लोगों का भी विकास हो चुका होता जो विकास की दौड़ में कहीं पीछे रह गए हैं, विकास से वंचित रह गए हैं।
स्वामी विवेकानंद ने इस देश के युवाओं से सवाल पूछा कि आपको क्या करना है? उन्होंने पूछा कि आपके पास अपने काम को करने के लिए क्या योजना है? उन्होंने पूछा कि अगर आपके पास कोई योजना है तो उसको पूरा कैसे करेंगे? हवा में रहने से कोई काम पूरा नहीं होता। फिर स्वामी विवेकानंद पूछते हैं-अगर तुम्हारे पास काम करने की तमन्ना है, काम को करने की योजना भी है तो उसके रास्ते मेें जो बाधाएं आएंगी, उससे संघर्ष करने के लिए तैयार हों? पथ में आने वाली बाधाओं को चीरकर आगे बढ़ने की हिम्मत है तुम्हारे अंदर। स्वामी विवेकानंद के यह सवाल युवाओं के लिये आज भी प्रासंगिक हैं। इस देश को स्वतंत्र कराने के लिए जितने क्रांतिकारी उभरकर सामने आये, पूरे विश्व में इतने क्रांतिकारी कहीं पर भी नहीं हुए। हम यहां पर संकल्प लें कि 6 साल बाद फिर कुम्भ आयेगा। उस कुम्भ के पहले सेवा, विकास, चिकित्सा, सैन्य आदि क्षेत्रों में भारत पूरे विश्व का सिरमौर बनेगा। भारत को उठना पड़ेगा। भारत किसी को दास बनाने के लिए नहीं उठेगा। भारत उठेगा एक दीप स्तम्भ के नाते, भारत उठेगा दुनिया की रक्षा के लिए भारत उठेगा जगत जननी बनने के लिए।
(रा.स्व.संघ के सह सरकार्यवाह द्वारा युवा कुंभ में दिए गए उद्बोधन के अंश)