संस्कृति जीवंत रखने के लिए सेवा भाव जरूरी
स्रोत:    दिनांक 01-जनवरी-2019
पद, प्रतिष्ठा, पैसा, पुरस्कार, इस उद्देश्य से किया गया कार्य, कर्म हो सकता है मगर सेवा नहीं। सेवा का तात्पर्य, ईश्वर को समर्पित किया गया कार्य होता है।
युवाओं को सेवा के रास्ते पर चलने की सीख देते श्री आशीष गौतम
प्रख्यात लेखक जार्ज बर्नार्ड शॉ ट्रेन में यात्रा कर रहे थे। टी.टी.ई को देखकर वह टिकट तलाशने लगे। टी.टी.ई ने कहा कि मुझे विश्वास है कि आप बिना टिकट नहीं चल सकते। बर्नार्ड शॉ ने कहा कि टिकट मैं तुम्हारे लिए नहीं, अपने लिए ढूंढ रहा हूं, मुझे भी तो पता चले कि मुझे जाना कहां है। इसी तरह समाज सेवा से जुड़े लोगों को यह तय करना होगा कि उन्हें जाना कहां है, उनका पथ क्या है? यह युवा कुम्भ भारत की संस्कृति को जोड़ने के उपक्रम से संबंधित है। दूसरी बात यह कि भारत का प्रत्येक युवा और प्रत्येक नागरिक राष्ट्र के लिए कुछ करना चाहता है, मगर वह उद्देश्य विहीन कार्य कर रहा है। जैसे मेरे पिता जी कम उम्र में दिवंगत हो गए क्योंकि उनका लीवर और किडनी का इलाज चल रहा था लेकिन वह ह्रदय के रोगी थे। यानी बीमारी कुछ और थी, इलाज कुछ और चल रहा था। हम सेवा तो करना चाहते हैं लेकिन जरूरत के हिसाब से अध्ययन करके ही इसे पूरा कर सकते हैं।
तीसरी बात, वनस्पति विज्ञानी मार्टिन लूथर जब बगीचे से निकलते थे तो कलियों को देखकर यह अनुमान लगा लेते थे कि कल बगीचे में फूल खिलने वाले हैं और इसी प्रकार किसी मुरझाये फूल या पत्ती को देखकर उन्हें अश्रुपात होता था कि कल उनके घर का कोई सदस्य जैसे मरने वाला हो। उनमें इतनी आत्मीयता थी कि कभी फूल नहीं तोड़ते थे। जब कभी उन्हें फूल की जरूरत होती थी, फूल के सामने हाथ फैलाकर खड़े हो जाते थे। फूल स्वयं टूटकर उनकी अंजुलि में गिर जाते थे। फूल खिले रहें, इसके लिए वे प्रयासरत रहते थे। उनमें आत्मीयता और सेवा का भाव था। अपने समाज और संस्कृति को जीवंत रखने के लिए यह भाव जरूरी है।
चौथी बात, एक समाजशास्त्र के प्रोफेसर ने अपने बी.एड. के छात्रों को एक विद्यालय की वास्तविक स्थिति का अध्ययन करके रिपोर्ट देने को कहा। उनके छात्रों ने उस विद्यालय की स्थिति का अध्ययन करके रिपोर्ट सौंपी कि वहां की स्थिति बहुत खराब है और विद्यालय के छात्रों द्वारा कोई परिणाम सकारात्मक नहीं आयेगा। 25 वर्ष बाद एक दूसरे प्रोफेसर ने आकर उस पुरानी रिपोर्ट को निकलवाया और उस रिपोर्ट को अपने नए छात्रों को दिया और कहा कि इस विद्यालय का फिर सर्वे करके आओ। सर्वे में छात्रों ने रिपोर्ट दी कि विद्यालय के अधिकतम छात्र अपने लक्ष्य को प्राप्त कर चुके हैं। अर्थात विद्यालय का परिणाम सकारात्मक रहा। उस विद्यालय के छात्र अच्छा नाम कमा रहे हैं, अच्छा काम कर रहे हैं।
उसके बाद उस प्रोफेसर ने अपने छात्रों को विद्यालय के पुराने अध्यापकों के पास भेजा ताकि यह पता लग सके कि जो बेकार छात्र इतने कमजोर थे वे इतना सफल कैसे हो गए! इस परिणाम के पीछे का रहस्य क्या है? जब वे पुराने अध्यापकों के पास पहुंचें तो उन अध्यापकों ने बताया कि उन्होंने अपने छात्रों पर विश्वास किया। पद, प्रतिष्ठा, पैसा, पुरस्कार इस उद्देश्य से किया गया कार्य, कर्म हो सकता है मगर सेवा नहीं। अर्थात आकांक्षा युक्त किया गया कार्य, सेवा नहीं हो सकता है। सेवा का तात्पर्य, ईश्वर को समर्पित किया गया कार्य होता है। एक एम.बी.बी.एस. की हुई संन्यासिनी को अरुणाचल प्रदेश के एक अनाथ बच्चों के छात्रावास में देखभाल करने का कार्य मिला। वे रोज रात को बच्चों को कम्बल ओढ़ाती थीं, मगर बच्चे फेंक देते थे। एक दिन बच्चों की हरकतों से तंग आकर वह सोने चली गर्इं। सोने पर उनके स्वप्न में रामकृष्ण परमहंस आये। रामकृष्ण परमहंस ठण्ड से ठिठुरते हुए उनसे कहते हैं-मुझे ठण्ड लग रही है, कम्बल डालो। तभी उनकी आंख खुलती है और वह जाकर देखती है कि ठण्ड से बच्चे ठिठुर रहे हैं। उन्हें कम्बल से ढकती है और संकल्प लेती है कि कभी रात्रि में विश्राम नहीं करेंगी। यह एक ऐसा सेवा भाव होता है जो ईश्वर को समर्पित होता है।
(युवा कुंभ में दिव्य प्रेम सेवा मिशन के संस्थापक द्वारा दिए गए उद्बोधन के अंश)