राम सत्य हैं उनके मंदिर के लिए साक्ष्यों की कमी नहीं
स्रोत:    दिनांक 11-जनवरी-2019
- प्रो. मक्खन लाल         
अंग्रेजों ने एक व्यवस्थित प्रणाली विकसित की थी जिसके तहत समाज में हो रही गतिविधियों, आचार-विचार, रीति-रिवाजों से लेकर जीवन शैली और भौतिक बिंबों को भी अभिलिखित किया गया।उन्हीं अभिलेखों में ब्रितानी-इतालवी विद्वानों ने कहा है कि ‘बाबर ने अयोध्या में ‘रामकोट’ अर्थात् राम के महल को तोड़कर मस्जिद बनवाई थी’। कई स्रोत अगर एक ही बात करें तो संशय की गुंजाइश कहां रहती है !
1838 में ब्रिटिश सर्वेयर मोंटगोमेरी ने लिखा था कि बाबरी ढांचे में मंदिर के स्तम्भ लगाए गए थे। चित्र मे ढांचे की दीवार में ऐसा ही एक स्तम्भ दिखाई दे रहा है  
हिंदुओं में मान्यता है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश सर्वोच्च देवता हैं। हिन्दू इन्हें त्रिमूर्ति कहते हैं। प्रथम देव ब्रह्मांड निर्माता हैं, द्वितीय भरण-पोषण करने वाले और तृतीय संहारक हैं। माना जाता है कि विष्णु ने समय-समय पर विभिन्न अवतारों के रूप में इस धरती पर जन्म लिया। राम को विष्णु का सातवां अवतार माना जाता है। ‘राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद: ब्रिटिश और यूरोपीय स्रोत: अ़ विलियम फिंच की ट्रैवल रिपोर्ट (1608-11)’ के लेखक फिंच अयोध्या आए थे। उन्होंने रामकोट के खंडहरों के अस्तित्व की पुष्टि की है, जहां हिंदू मान्यता के अनुसार हजारों साल पहले राम का जन्म हुआ था। ‘हिस्ट्री ऐंड ज्योग्राफी ऑफ़ इंडिया’ के लेखक जोसेफ टेफेन्थैलर(1710-1785) अस्ट्रियाई मूल के जेसुइट पादरी थे, जो लंबे समय तक भारत में रहे। उन्होंने 1771 और 1776 के बीच अवध के कई क्षेत्रों का दौरा कर भारत के विस्तृत ऐतिहासिक और भौगोलिक विवरणों को लातीनी भाषा में अंकित किया था। इसमें अयोध्या का भी वर्णन है। प्रसिद्ध फ्रांसीसी विद्वान जोसेफ बर्नौली ने 1786 में टेफेन्थैलर की पुस्तक का फ्रेंच अनुवाद प्रकाशित किया था। इसमें प्रस्तुत तथ्य ब्रिटिश दस्तावेजों के बजाय स्वतंत्र अध्ययन पर आधारित हैं और 1838 में मोंटगोमरी मार्टिन द्वारा राम जन्मभूमि मंदिर के संबंध में पेश किए ब्योरों के मुकाबले ज्यादा प्राचीन हैं। ‘मंदिर-मस्जिद स्थल’ के बारे में टेफेन्थैलर लिखते हैं: ‘‘बादशाह औरंगजेब ने रामकोट नाम के एक किले को नष्ट कर दिया और उसी स्थान पर तीन गुंबदों वाला एक इस्लामी ढांचा बनाया। कुछ अन्य इतिहासकारों का कहना है कि इसे बाबर ने बनवाया था। किले में काले पत्थरों के करीब चार फुट ऊंचे चौदह स्तंभ मौजूद हैं जिनमें से बारह पर अब मस्जिद की भीतरी मेहराबें खड़ी हैं। बारह में से दो खंभे मूर की कब्र पर खड़े हैं। ऐसा कहा जाता है कि इन स्तंभों को श्रीलंका या सेलेनद्वीप, जिसे यूरोपवासी सीलोन कहते थे, से वानर राज हनुमान लेकर आए थे, जिन पर शिल्पकारों ने नक्काशी की थी। बाईं ओर जमीन से थोड़ा ऊपर उठा 15 X 15 का एक चबूतरा है जिस पर चूने का पलस्तर है। हिंदू इसे वेदी कहते हैं जिसका अर्थ है पालना। यह नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि इसी घर में राम के रूप में विष्णु का जन्म हुआ था और उनके बाद उनके तीन भाइयों का जन्म भी यहीं हुआ था। बाद में औरंगजेब, या कुछ अन्य लोगों के अनुसार, बाबर ने मूर्तिपूजा के इस स्थल को नष्ट कर दिया। लेकिन इन दोनों ही जगहों पर दोनों ही समुदाय अपने-अपने मत के उत्सवों का आयोजन करते रहे। राम के जन्मस्थान के तौर पर वे इसकी तीन परिक्रमा करते और जमीन पर लेटकर नमन करते। दोनों हिस्से बुर्जदार दीवारों से घिरे हैं जिनके बीच में एक छोटा-सा दरवाजा हैं जिससे प्रथम कक्ष में प्रवेश किया जा सकता है।’’
स्पष्ट है कि टेफेन्थैलर को यह बात निश्चित तौर पर पता नहीं थी कि मंदिर को नष्ट करके औरंगजेब या बाबर ने ‘मस्जिद’ का निर्माण करवाया था। लेकिन इसके बारे में एक शिलालेख स्पष्ट कहता है कि बाबर के आदेशों के तहत 1528 ईस्वी में मीर बाकी ने इसे बनवाया था जिसे बाबर ने अवध का हाकिम नियुक्त किया था। टेफेन्थैलर के वर्णन में एक छोटी सी गलती है कि प्रवेश द्वार पर अंदरूनी मेहराब को सहारा देने के लिए इस्तेमाल किए गए काले पत्थर के दो स्तंभ 12 स्तम्भों में से हैं, वास्तव में ये अतिरिक्त खंभे थे। स्वर्गद्वार, नवल राय घाट जैसे कुछ और स्थलों का वर्णन करने के बाद टेफेन्थैलर एक अन्य महत्वपूर्ण मंदिर के बारे में बताते हैं जो है सीता की रसोई-‘‘एक और स्थल भी है जो ज्यादा प्रसिद्ध है जिसे सीता की रसोई कहते हैं, जो राम की पत्नी सीता की रसोई है। यह स्थान शहर के नजदीक एक ऊंचे टीले पर स्थित है’’।
उपरोक्त स्रोतों के अलावा ऐसे अनगिनत स्रोत हैं जिनमें बार-बार अयोध्या का उल्लेख हिंदुओं के पवित्र स्थान के रूप में किया गया है, जहां राम जन्मस्थान और अन्य मंदिरों को नष्ट करके ‘मस्जिदों’ का निर्माण करवाया गया। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं: ब्रिटिश सर्वेयर मोन्टगोमेरी मार्टिन की रिपोर्ट ‘बाई मोन्टगोमेरी मार्टिन(1838)’, एडवर्ड थर्नटन का ‘ईस्ट इंडिया कंपनी गजेटियर (1854)’, पीक़ार्नेगी का ‘हिस्टोरिकल स्केच ऑफ़ फैजाबाद (1870)’, ‘गजेटियर ऑफ़ दि प्रोविन्स ऑफ़ अवध (1877)’,‘फैजाबाद सेटलमेंट रिपोर्ट, (1880)’, ‘इंपीरियल गजेटियर ऑफ़ इंडिया (1881)’, कर्नल एफ़ ई़ ए़ चमियर, जिला न्यायाधीश, फैजाबाद की ‘कोर्ट वर्डिक्ट(1886)’, ए़ फ्यूहरर की ‘आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया रिपोर्ट (1891)’, एच़ आर नेविल का ‘बाराबंकी डिस्ट्रिक गजेटियर (1902)’, एच़ आर नेविल का ‘फैजाबाद डिस्ट्रिक गजेटियर (1905)’और ‘आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया रिपोर्ट (1934)’।
मुसलमानों द्वारा दिए साक्ष्य
गैर-ब्रितानी स्रोत भी प्रामाणिक रूप से दर्शाते हैं कि मंदिर को ध्वस्त किया गया था। इसे अखिल भारतीय बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी भी मानती है। अरबी, फारसी और उर्दू के कई विद्वानों ने बड़ी संख्या में ऐसे दस्तावेजों की ओर संकेत किया है जो स्पष्ट रूप से उल्लेख करते हैं कि राम जन्मभूमि पर स्थित मंदिर को बाबर ने नष्ट करके एक ‘मस्जिद’ का निर्माण करवाया था। ऐसे कुछ दस्तावेज हैं-(क) अबुल फजल की आईने-अकबरी (1598)। यह कृति मूल रूप से अकबर के शासनकाल के प्रशासनिक और वित्तीय मामलों का ब्योरा पेश करती है। अबुल फजल भगवान राम के महलों और अन्य भवनों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि अयोध्या हिंदुओं के सबसे प्राचीन और पवित्रम स्थानों में से एक है। ‘सफिहा-ए-चहल नसीह बहादुर शाही’, जिसे औरंगजेब की पोती ने (17वीं शताब्दी के अंत में) लिखा है। यह सबसे प्राचीन मुस्लिम प्रमाण है जिसमें बाबरी ढांचे के निर्माण के लिए राम जन्मभूमि मंदिर को नष्ट करने का उल्लेख है। अगर औरंगजेब की पोती ऐसा लिख रही है तो यह सबसे प्रामाणिक साक्ष्य बनता है। वह लिखती है-‘‘मथुरा, बनारस और अवध जैसे नगरों के निवासी काफिर हिंदू (मुशरिक हिंदू) के सभी पूजा स्थलों, जिन्हें ये दुष्ट और अपात्र (कुफ्र-ए-नकबार) अपनी आस्था के तहत कन्हैया (भगवान कृष्ण) का जन्मस्थान (मौलाद गाह), सीता की रसोई (भगवान राम से संबंधित), लंका विजय के बाद रामचंद्र द्वारा स्थापित हनुमान गढ़ी के नाम से पूजते रहे थे, को ध्वस्त करके मस्जिदों का निर्माण किया गया ताकि इस्लाम मजहब को मजबूत किया जा सके।’’
मिर्जा जान लिखित ‘हदीस-ए-शोहदा (1856)’ के अनुसार मिर्जा जान 1855 में वाजिद अली शाह के शासन के दौरान अमीर अली अमेठी के नेतृत्व में हुए जिहाद का चश्मदीद गवाह होने के साथ-साथ उसमें शामिल भी था, जो बाबरी ढांचे से सौ गज की दूरी पर स्थित हनुमान गढ़ी को हिंदुओं से छीन कर उस पर पुन: कब्जा करने के लिए किया गया था। किताब जिहाद की विफलता के तुरंत बाद तैयार हुई थी और अगले साल 1856 में सामने आई। रईस अहमद जाफरी ने इसे अपनी किताब में ‘वाजिद अली शाह और उनका अहद’ (किताब मंजिल, लखनऊ, 1957) शीर्षक से अध्याय के रूप में शामिल किया है। उन्होंने अपनी ओर से इसमें कुछ नहीं जोड़ा और कुछ हिस्से जो उन्हें अनावश्यक लगे, उन्हें हटा दिया। मिर्जा जान कहता है-‘‘सैयद सलार मसऊद गाजी के आधिपत्य की स्थापना के बाद से भारत में सत्तासीन मुस्लिम शासकों ने हिंदुओं के भव्य मंदिर-स्थलों पर मस्जिदों, मठों और सरायों का निर्माण किया, मुअज्जन नियुक्त किए गए, शिक्षक और व्यापार संघों के जरिए इस्लाम का व्यापक प्रसार किया गया और काफिरों पर जीत हासिल की। इसी तरह उन्होंने फैजाबाद और अवध को भी बुतपरस्तों की गंदगी से मुक्त कर दिया, जो राम के पिता की राजधानी थी और आस्था का भव्य केंद्र थी। जहां उत्कृष्ट मंदिर (राम जन्मस्थान) थे, वहां उन्होंने एक बड़ी मस्जिद का निर्माण किया और जहां एक छोटा मण्डप था, वहां उन्होंने कनाती मस्जिद (मस्जिद-ए-मुख्तसर-ए-कनाती) बनवाई। जन्मस्थान मंदिर राम के अवतार का मुख्य स्थल है जिसके समीप सीता की रसोई है। इसलिए, शहंशाह बाबर ने 923 हिजरी (1528) में एक विशाल मस्जिद का निर्माण कराया जो मूसा आशिकान के संरक्षण में थी। दूर-दूर तक मस्जिद की ख्याति अब भी सीता की रसोई मस्जिद के रूप में ही है और मंदिर इसके बगल में मौजूद है (और बगल में दयार बाकी है)।’’(पृ़ 246)
‘पिटीशन ऑफ़ मुहम्मद असगर (1858)’: 30 नवंबर, 1858 को मुहम्मद असगर और बाबरी मस्जिद के खातिब और मुअज्जन ने बैरागिया-ए-जन्मस्थान के बारे में कानूनी कार्रवाई शुरू करने के लिए एक याचिका दायर की, जिसमें बाबरी मस्जिद को मस्जिद-ए-जन्मस्थान तथा मेहराब और चबूतरे के नजदीक स्थित आंगन को मुकाम-ए-जन्मस्थान कहकर इंगित किया गया है। वे चाहते थे कि बैरागियों ने आंगन में जो चबूतरा बना दिया है, उसे नष्ट किया जाए। उन्होंने उल्लेख किया है कि सैकड़ों वर्षों से जन्मस्थान बदहाल स्थिति में था और वहां हिंदू पूजा-अर्चना करते थे (मकाम जन्मस्थान का साद-हा-बरस से बदहाल पड़ा था और अहले हनुद पूजा करते थे)।
मिर्जा रजब अली बेग सुरूर की ‘फसाना-ए-इबारत (1787-1867)’ किताब में लिखा है-‘‘सीता की रसोई की जगह पर एक विशाल मस्जिद का निर्माण किया गया था। बाबर के शासन के दौरान हिंदुओं को इतना आक्रांत कर दिया गया था कि उनमें मुसलमानों के बराबर खड़े होने की हिम्मत भी नहीं रही थी। मस्जिद का निर्माण 923 में सैयद मीर आशिकान की देखरेख में हुआ था। औरंगजेब ने हनुमान गढ़ी पर एक मस्जिद का निर्माण कराया।...बैरागियों ने मस्जिद को ढहाकर उसके स्थान पर एक मंदिर बनवाया। उसके बाद बाबरी मस्जिद में मूर्तियों की खुलेआम पूजा होने लगी जहां सीता की रसोई स्थित है। प्रशासन (नवाबी) इसके बारे में कुछ नहीं कर सका।’’ गौर करने वाली बात है कि सुरूर ने साहूफा-ए- बहादुरशाही (1816 में जिसकी प्रतिलिपि तैयार हुई) का उल्लेख अपनी जानकारी के स्रोत के रूप में किया है।
शेख अजमत अली काकोरावी नमी(1811-1893) ने मुराक्काह-ए-खुुसरवी लिखी है जिसे तारीख-ए-अवध के रूप में भी जाना जाता है। नामी वाजिद अली शाह के शासन के दौरान हुई ज्यादातर घटनाओं के चश्मदीद गवाह रहे हैं। उनकी किताब 1869 में पूरी हो गई थी, पर करीब एक सदी बाद यह दुनिया के सामने आई। इसकी केवल एक पांडुलिपि निकाली गई है जो लखनऊ विश्वविद्यालय की टैगोर लाइब्रेरी में है। डॉ. जाकी काकोरवी को उत्तरप्रदेश के लखनऊ स्थित फखरुद्दीन अली मेमोरियल कमेटी ने इसकी प्रेस कॉपी तैयार करने के लिए वित्तीय सहायता दी थी। पर समिति ने किताब के उस अध्याय के प्रकाशन पर रोक लगा दी थी जिसमें हनुमान गढ़ी को बैरागियों से छीनकर पुन: कब्जा हासिल करने के लिए अमीर अली अमेठी के नेतृत्व में जिहाद हुआ था। दलील यह दी गई थी कि इसका प्रकाशन मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति के मद्देनजर उचित नहीं होगा। लिहाजा डॉ. काकोरवी ने जब 1986 में पहली बार किताब प्रकाशित की तो उसमें वह अध्याय शामिल नहीं था। हालांकि, एक साल बाद 1987 में उन्होंने ‘अमीर अली शाहिद और मर्काह-ए-हनुमान गढ़ी’ शीर्षक से इस अध्याय को स्वतंत्र रूप से मर्कज-ए-अदब-ए-उर्दू 137, शाहगंज, लखनऊ -3 से प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने समिति से कोई भी वित्तीय या अन्य सहायता नहीं ली थी। किताब का शुरुआती अनुच्छेद मिर्जा जान की हदीस-ए- शोहदा से ली गई उपरोक्त पंक्तियों के समान है। मैंने लेखक के शब्दों को, नाममात्र का अंश हटाते हुए, आगे उद्धृत किया है-
‘‘पुराने अभिलेखों के अनुसार मुस्लिम शासकों का पहला सिद्धान्त था, मस्जिदों, मठों और सरायों का निर्माण, इस्लाम का प्रसार और गैर-इस्लामी रीति-रिवाजों और प्रथाओं पर कड़ा अंकुश। लिहाजा जब वे मथुरा, वृंदावन आदि से गैर-इस्लामिक प्रथाओं की गंदगी दूर कर रहे थे, फैजाबाद-अवध में सैय्यद मूसा आशिकान के संरक्षण में जन्मस्थान मंदिर (बुतखाने जन्मस्थान) में 923 में बाबरी मस्जिद का निर्माण हो चुका था जहां राम के पिता की राजधानी थी और जो हिंदुओं की आस्था का ऊर्जा से भरा स्थल था। (पृ़ 9)। हिंदू इसे सीता की रसोई मानते थे।’’
अल्लामा मुहम्मद नजमुलघानी खान रामपुरी (1909) कृत ‘तारीख-ए-अवध’ को डॉ. जकी काकोरावी ने एक संक्षिप्त पुस्तक के रूप में पेश किया है। संस्करण से उद्धृत एक अंश इस प्रकार है-‘‘बाबर ने सैयद आशिकान के संरक्षण में अयोध्या में उस स्थल पर एक शानदार मस्जिद का निर्माण कराया जहां रामचंद्र के जन्मस्थान का मंदिर स्थित है और उसके बगल में है सीता की रसोई। मस्जिद के निर्माण की तारीख खैर बाकी (923 हिजरी) है। आज भी इसे सीता की रसोई के रूप में जाना जाता है। इसके बगल में वह मंदिर स्थित है। कहते हैं कि इस्लाम का आधिपत्य होने के समय भी वहां तीन मंदिर विराजमान थे-जन्मस्थान, जो रामचंद्रजी का जन्मस्थान था, स्वर्गद्वार, जो राम दरबार कहलाता था और त्रेता का ठाकुर। बाबर ने जन्मस्थान को ध्वस्त करने के बाद मस्जिद का निर्माण कराया था। संक्षेप में, अशांति (1855 ई़) ऐसी अवस्था पर पहुंच चुकी थी कि हनुमानगढ़ी में खड़ी मस्जिद के जवाब में हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद के आंगन में एक मंदिर बना दिया था जहां सीता की रसोई स्थित थी ।’’ यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि लेखक का कहना है कि उसने भारत और अवध के 17वीं-19वीं शताब्दी तक के इतिहास की परतों सहित 81 स्रोतों (पांडुलिपियां और पुस्तकें) को खंगाला है जिनमें से ज्यादातर मुस्लिम लेखकों की रचनाए थीं। उपरोक्त बातों के अलावा बड़ी संख्या में अन्य मुस्लिम स्रोत भी एक ही कहानी दोहराते हैं कि राम-जन्मस्थान सहित कई मंदिरों को ध्वस्त करके मस्जिदों का निर्माण हुआ था। ( विवरण के लिए देखें, हर्ष नारायण,1993 )।
 
राम जन्मभूमि पर उत्खनन से प्राप्त 14 स्तम्भों में से एक स्तम्भ का आधार, जो हिन्दू मंदिर के होने का स्वयं में प्रमाण है 
धर्मग्रन्थों और परंपरागत साहित्य से मिले साक्ष्य
हिंदू समाज में लगभग दो सहस्राब्दियों से राम की पूजा-अर्चना किए जाने के साक्ष्य मिलते हैं। धर्मशास्त्रों में इस संदर्भ में वर्णन तो मिलता ही है, लोकप्रिय साहित्य में भी ऐसी बातें दर्ज हैं। इसका स्पष्ट अर्थ है कि अगर राम भारतीय जनमानस की आत्मा में नहीं बसे होते तो भारतीय इतिहास में निरंतर उनका उल्लेख नहीं मिलता। धर्मग्रंथों में तो राम की महिमा का आख्यान मिलता ही है, संस्कृत साहित्य के कवि शिरोमणि या साहित्य विभूतियों में भी शायद ही कोई होगा जिसने भगवान राम की वंदना में शब्दों की माला न गूंथी हो। उन कृतियों से उद्धरण देने के बजाय मैं बस उनके नाम यहां दे रहा हूं। पहली शताब्दी से 15वीं शताब्दी के मध्य की ये कृतियां हैं:
रामपूर्वतापनीय उपनिषद, रामोत्तरतापनी उपनिषद, राम-रहस्योपनिषद, वाल्मीकि रामायण, महाभारत (वनपर्व), योग वशिष्ठ, वेदांत रामायण, विष्णु पुराण, वायु पुराण, भागवत पुराण, कूर्म पुराण, अग्नि पुराण, नारद पुराण, ब्रह्म पुराण, गरुड़ पुराण, स्कंद पुराण।
अन्य धार्मिक साहित्य में इनके नाम विशेष तौर पर लिए जा सकते हैं-जैमिनी अश्वमेध, मेलारवण चरित, सत्योपाख्यान, हनुमत-संहिता, बृहत-कोशलखंड। काव्य संकलनों में कुछ प्रमुख हैं-कालिदास का रघुवंश, प्रवरसेन की सेतुबंधु, भट्टि की रावणवध, कुमारदास की जानकीहरण, अभिनन्द कृत रामचरित, क्षेमेन्द्र की रामायणमंजरीय और दशावतार चरित, साकल्य मल की उदार राघव नाटक, भास की प्रतिमा और अभिषेक, भवभूति का महावीर चरित और उत्तररामचरित, दिक्नाग की कुंडमाला, मुरारी की अनर्धराघव, राजशेखर की बालरामायण, यशोवर्मन की रामभूदय, शक्तिभद्र कृत आश्चर्यचूड़ामणि, रामचंद्र कृत राघवभूयदय और रघुविलास, जूदेव की प्रसन्न-राघव, हस्तिमाला की मैथिकल्याण, सुभट की दुतांगड़ा, त्रिसमिस्रदेव की रामभ्युदय।
423 ई. से ही ऐसे शिलालेख मिलते हैं जिनसे राम की शाश्वत परंपरा स्थापित होती है।
इनमें से कुछ हैं:
1.विश्ववर्मन का गांधार शिलालेख-423 ई़
2. पुलकेशिन-1 के समय का चालुक्य शिलालेख-543 ई़
3. मामल्लपुरम शिलालेख-आठवीं शताब्दी
4. चंद्रदेव का अयोध्या शिलालेख-1093 ई़
5. पृथ्वीराज द्वितीय का हांसी शिलालेख-1168 ई़
6. अम्बामाता मंदिर शिलालेख-1145 ई़
अनगिनत साहित्यिक कृतियों, धर्मशास्त्रों और शिलालेखों में राम वंदना की लंबी परंपरा का वर्णन मिलता है, जिसे 12वीं/13वीं शताब्दी में अयोध्या महात्म्य के रूप में पिरोया गया, जो स्कंद पुराण का हिस्सा है जिसमें अयोध्या के विभिन्न पवित्र स्थलों की झांकी प्रस्तुत करते हुए बताया गया है कि यह तीर्थ मोक्ष प्राप्त करने का स्थान है। राम के साथ जुड़े कई अन्य पवित्र स्थल जैसे, गुप्तार घाट, स्वर्गद्वार, सहस्त्रधारा आदि आज भी मौजूद हैं। अयोध्या महात्म्य में जन्मभूमि मंदिर की भावपूर्ण स्तुति की गई है, साथ ही रामनवमी के दिन जन्मस्थान के दर्शन और उपवास की महत्ता बताई गई है।
यह सच है कि हिंदू अयोध्या में अपनी आस्था की पावन स्थली में फिर से पूजा-अर्चना करने का अधिकार प्राप्त करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं जिससे मुस्लिम समाज के कट्टर तत्वों के साथ उनका टकराव भी होता रहा है। अवध के तत्कालीन नवाब वाजिद अली शाह के 112 अगरूत 1855 को ब्रिटिश रेजिडेंट मेजर जेम्स औट्राम को लिखे एक पत्र में फैजाबाद के काजी की मुहर लगा एक दस्तावेज भी संलग्न किया गया था। यह दस्तावेज 1735 ई़ का है जिसमें उल्लेख है कि दिल्ली के सम्राट द्वारा निर्मित मस्जिद पर कब्जे को लेकर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भयंकर दंगा हुआ था (1855 में भी उसी तरह का फसाद हुआ था जिसके बारे में वाजिद अली शाह ने यह पत्र लिखा था)।
मराठा दस्तावेजों से पता चलता है कि उत्तर भारत में मराठा सैन्य गतिविधियों और नीति का मुख्य उद्देश्य अयोध्या, काशी, मथुरा और प्रयाग के पवित्र शहरों की मुक्ति भी था। 1751 में अवध के दूसरे नवाब सफदरजंग की ओर से मदद मांगने पर मल्हारराव होल्कर अपनी सेना लेकर आए और दोआब में पठानों को पराजित किया।
जीत के तुरंत बाद होल्कर ने सफदरजंग से अयोध्या, काशी, मथुरा और प्रयाग पेशवाओं को सौंपने का अनुरोध किया। फिर,जब 1756 में तीसरे नवाब शुजाउद्दौला ने अफगान आक्रमण के खिलाफ मराठा शासकों से सहायता मांगी तो अवध के दरबार में मराठा प्रतिनिधि ने अयोध्या सहित उपरोक्त चार पवित्र स्थानों के हस्तांतरण की मांग रख दी।
इस मुद्दे पर एक वर्ष से अधिक समय तक बातचीत चलती रही। अंतत: जुलाई 1757 में शुजाउद्दौला ने अयोध्या, काशी और मथुरा के पवित्र शहरों को मराठा नेता राघोबा को हस्तांतरित करने पर सहमति दे दी। लेकिन हस्तांतरण नहीं हो सका क्योंकि उस दौरान मराठा सेनाएं पंजाब को जीतने निकल पड़ी थीं, जिसमें विजय मिलने के बावजूद अंतत: पानीपत में उन्हें भयंकर हानि (1761 ई़) उठानी पड़ी।