महापर्व मकर संक्रांति के बारे मेें जाने सबकुछ
स्रोत:    दिनांक 15-जनवरी-2019

महाभारत का वह प्रसंग सबको पता है..जिसमें कुरू वंश के सबसे ज्येष्ठ भीष्म पितामह शरशैय्या पर पड़े हुए थे। बाणों से बिंधा शरीर पीड़ा से आक्रांत था। उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान था। फिर उन्होंने मृत्यु को चुनने में देर लगाई थी। वे सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार करते रहे। जब सूर्य उत्तरायण हुए, तभी उन्होंने प्राण त्यागे। ऐसी मान्यता है कि उत्तरायण सूर्य के दौरान जो व्यक्ति या जीव संसार को छोड़ता है, वह जन्म, जरा और मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। यानी किसी भी जीव के रूप में उसका दोबारा जन्म नहीं होता। यानी उत्तरायण सूर्य की दशा मुक्तिदायी होती है। जिस उत्तरायण पर्व को शास्त्रों में इतनी महत्ता दी गई हो, वह मकर संक्रांति के ही दिन उत्तर मुखी होना शुरू होता है।
हमारा कैलेंडर चंद्रमा के परिक्रमण पर निर्भर करता है, जो 27.3 दिन में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करता है। जबकि पृथ्वी 23 घंटे, 56 मिनट और 4.09 सेकेंड यानी करीब एक दिन में अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करती है। इसी वजह से हिंदू कैलेंडरों की तिथियों में उलटफेर होता रहता है। यानी कोई तिथि सूर्योदय के साथ शुरू होती है तो कोई दिन में दोपहर के बाद शुरू होता है। लेकिन आप देखेंगे कि मकर संक्रांति का 14 जनवरी को पड़ता है या फिर लीप वर्ष होने के चलते पंद्रह जनवरी को आता है। इसमें ज्यादा हेर-फेर नहीं होता। इस लिहाज से देखें तो मकर संक्रांति हमारे चंद्र आधारित कैलेंडर में सूर्य के प्रभाव का विस्तार भी लेकर आता है।
दरअसल पृथ्वी अपनी धुरी पर करीब 23.5 अंश झुकी हुई है। इस वजह से उसका उपरी हिस्सा जिसे आप उत्तरार्ध कहते हैं, वह जाड़े के दिनों में सूर्य से दूर होता है, जबकि गर्मियों में सूर्य से इस हिस्से की दूरी घटने लगती है। इसकी वजह से गर्मियों में इस हिस्से पर देर तक सूर्य की किरणें रहती हैं और वे अपेक्षाकृत सीधी पड़ती हैं, इसलिए जहां दिन बड़े होने लगते हैं, वहीं मौसम की तासीर भी गरम होने लगती है। संक्रांति शब्द संक्रमण से बना है। जो मिलन या बदलाव का वक्त होता है, उसे संक्रांति काल कहा जाता है। पृथ्वी पर एक खगोलविदों ने मकर रेखा की भी कल्पना कर रखी है। जिस दिन सूर्य की किरणों की तासीर पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में तीखी होने लगती है, दरअसल वह दिन मकर संक्रांति ही होता है। इसी दिन मकर रेखा पर सूर्य की किरणें लंबवत पड़ने लगती हैं। इसे पुण्य का काल इसीलिए माना गया है।
वैसे भी हिंदू शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक कार्यों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर व्यक्ति को फिर से प्राप्त होता है। इस दिन घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति कराता है। इस श्लोक में इसकी महत्ता ऐसे ही दी गई है-
माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम।
स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥
मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इसी वजह से इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त फलदायक है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अन्तराल पर होती है।
भारत शस्य यानी कृषि संस्कृति वाला देश है। यही वह वक्त होता है, जब रबी की फसलें तैयार होने लगती हैं। इस दिन पूरे देश में पहले अपने खेतों से नवान्न लाने की परंपरा थी। चूंकि इस दिन ऋतुओं का मिलन है, इसलिए इस दिन मिलन के प्रतीक स्वरूप खिचड़ी बनाने और खाने की परंपरा है। खिचड़ी या संक्रांति का यह त्योहार पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में किसी न किसी नाम से मनाया जाता है। जैसे दक्षिण में यह पोंगल है, तो पश्चिम के गुजरात -राजस्थान में उत्तरायण, पुराने पांचाल (पंजाब,हरियाणा,हिमाचल ) में यह माघी है , तो पूरब के असम में भोगली - बिहू, कश्मीर में शिशुर - संक्रांत तो पूर्वी उत्तर प्रदेश-बिहार में खिचड़ी, बंगाल में पौष -संक्रांति तो मिथिला में तिला-संक्रांति के रूप में यह मशहूर है।