कांग्रेस ने सावरकर की सुनी होती तो नहीं बंटता देश
स्रोत:    दिनांक 16-जनवरी-2019
- उदय माहूरकर              
सावरकर ने भारत विभाजन से पूर्व ही आसन्न संकट को पहचानते हुए कांग्रेस को सचेत किया था, परन्तु कांग्रेसी नेतृत्व ने उनकी बात अनसुनी कर दी। नतीजा हुआ भारत का बंटवारा और तुष्टीकरण राजनीति की शुरुआत
सेलुलर जेल में उस कोठरी में ध्यानमग्न बैठे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जहां स्वातंत्र्यवीर सावरकर को रखा गया था
स्वातंत्र्यवीर सावरकर अगर कुछ जानते थे तो बस इतना कि राष्ट्र के लिए बलिदान कैसे करना है। उन्होंने अपने जीवन को प्रत्येक क्षण को अपनी मातृभूमि के लिए समर्पित कर दिया था। लेकिन इसके बदले एक कृतघ्न राष्ट्र ने उन्हें केवल अपमानित किया। उनके ऊपर घटिया से घटिया आरोप लगाए गए, आरोप देश को विभाजित कराने के, जेल से बाहर आने के लिए ब्रिटिशों से माफी मांगने के, और न जाने क्या-क्या। जबकि सच्चाई इसके ठीक उलट थी। अगर कांग्रेस ने उनकी सलाह पर ध्यान दिया होता और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान स्वतंत्रता-प्राप्ति की पूर्व शर्त के रूप में हिंदू-मुस्लिम एकता की रट नहीं लगाई होती, तो भारत माता अविभाजित रहतीं। उन्होंने कभी व्यक्तिगत माफी नहीं मांगी, और अगर मांगी भी हो तो वह केवल क्रांतिकारी धर्म का पालन करते हुए। एक क्रांतिकारी का अंतिम उद्देश्य अपने लक्ष्य को पाना होता है। क्या औरंगजेब को चकमा देने के लिए शिवाजी महाराज ने कई बार क्षमा नहीं मांगी थी ताकि आगे चलकर वे लगभग 5 शताब्दियों की मुगल आक्रांताओं की गुलामी के बाद, 1674 में पहली बार किसी स्वतंत्र हिंदू राज्य की स्थापना कर सकें?
इसलिए, वास्तव में हाल ही में अंदमान-निकोबार में सेलुलर जेल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का महान वीर सावरकर की कोठरी में कदम रखना स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक मर्मस्पर्शी क्षण था। सावरकर ने इसी कारावास में भीषणतम क्रूरता सहते हुए 10 साल बिताए थे। प्रधानमंत्री वहां न केवल गये बल्कि वहां के फर्श पर बैठकर प्रार्थना की और इस अनूठे स्वातंत्र्यवीर को श्रद्धांजलि अर्पित की।
सच्चे नायकों के सम्मान बिना कोई राष्ट्र पूर्ण सक्षम नहीं
कहते हैं, जो राष्ट्र अपने महापुरुषों का सम्मान नहीं करता, वह कभी अपनी पूरी क्षमता नहीं पा सकता। संभवत: यह बात सावरकर के संदर्भ में ज्यादा सच ठहरती है। सावरकर के बलिदान के बारे में लोगों को केवल आंशिक ज्ञान है। उन्हें 1937 में जब रत्नागिरी जेल से मुक्त किया जाना था तो कुछ कांग्रेसी नेताओं ने उनसे मुलाकात की और उनके जीवनीकार धनंजय कीर के अनुसार उनसे कांग्रेस में शामिल होने का आग्रह किया। लेकिन, सावरकर ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण के रास्ते पर इतनी आगे बढ़ गई है कि उसके लिए अपने कदम पीछे करना संभव नहीं है और बहुसंख्यकों के अधिकारों की कीमत पर मुस्लिम तुष्टीकरण राष्ट्र के साथ धोखा करना है।
उन्होंने अपनी यह बात इस सुप्रसिद्ध उद्घोष के साथ रखी थी-‘‘देशभक्तों की अंतिम पंक्ति में खड़ा रहना पसंद करूंगा, बजाय उन लोगों की प्रथम पंक्ति में, जो देश के साथ धोखाधड़ी कर रहे हैं।’’ कीर कहते हैं कि सावरकर ने अपने जीवन का सबसे बड़ा त्याग कांग्रेस में जाने की बजाय हिंदू महासभा का अध्यक्ष बनकर किया क्योंकि अगर उन्होंने में 1937 में कांग्रेस में प्रवेश किया होता तो उनके लिए पार्टी में किसी भी पद तक पहुंचना कठिन नहीं था।
सावरकर की नीति अपनाते तो विभाजन न होता
उस समय सावरकर ने कांग्रेस को चेतावनी दी थी कि मुस्लिम नेतृत्व उसके इस विश्वास का पूरा फायदा उठायेगा कि हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना भारत की स्वतंत्रता संभव नहीं है और वह बहुसंख्यक समुदाय के अधिकारों की कीमत पर अपने समाज के लिए रियायतें हासिल करते हुए सामाजिक ताने-बाने में खलल पैदा करेगा। उनकी बात कितनी सच थी, इसका पता इसी से लग जाता है कि भारत आज भी मुस्लिम तुष्टीकरण के अभिशाप से ग्रस्त है। उस समय सावरकर ने मुसलमानों के प्रति अपनी नीति इस वाक्य में परिभाषित की थी:‘‘तुम्हारे साथ, तुम्हारे बिना और तुम्हारे बावजूद भी।’’ इसका मतलब था कि मुसलमान अगर स्वतंत्रता के लिए साथ आते हैं तो हिंदू उनका स्वागत करेंगे, मुसलमान साथ नहीं आते, तो भी स्वतंत्रता संग्राम जारी रहेगा व अगर मुसलमान कोई और रास्ता चुनते हैं तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता।
इस्लामवादी रणनीतिकारों के झूठ
उनकी आशंका तब सही साबित हुई जब 1947 में भारत का विभाजन हुआ और कट्टरवादी मुसलमानों ने पश्चिम और पूर्वी पाकिस्तान, दोनों जगह हिंदुओं और सिखों का संहार किया। इस्लामवादी रणनीतिकार आज भी दावा करते हैं कि ‘स्वतंत्र भारत में मुसलमानों को नुकसान उठाना पड़ा है’। वे बहुत चालाकी से इस बहस की शुरुआत विभाजन के बाद हिंदू-मुस्लिम समस्या से करते हैं। वास्तव में दोनों समुदायों में से किसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है, इसकी सही तस्वीर हासिल करनी हो तो बात उस दिन से शुरू होनी चाहिए जिस दिन भारत के विभाजन की घोषणा हुई थी। यदि उस तिथि से गणना करें तो वास्तविक तस्वीर उभरती है जिससे पता चलता है कि सारा नुकसान केवल हिंदुओं, सिखों, बौद्धों और जैनियों को ही उठाना पड़ा है।
विभाजन के बाद से, आज के पाकिस्तान में हिंदू, सिख, जैन और बौद्धों की आबादी नाममात्र रह गई है। इसके विपरीत भारत में मुस्लिम आबादी लगभग पांच गुना बढ़ गई है और अगर बांग्लादेशी घुसपैठियों की भी गणना कर लें तो यह वृद्धि और अधिक है। इसके अलावा यहां वैश्विक इस्लामी योजनाओं के तहत मुस्लिम आबादी को बढ़ाकर अंतत: भारत को इस्लामी राष्ट्र में बदलने की कोशिश में जुटे हिस्से वहाबियों के प्रभाव वाले इलाकों में अपनी वास्तविक संख्या छिपाने के प्रयास करने वाला वर्ग भी है। हालांकि, राष्ट्रवादी आदर्शों से बंधे अधिकांश भारतीय रणनीतिकार लोगों के सामने यह चित्र प्रस्तुत करने में असमर्थ रहते हैं, क्योंकि उन्हें भारतीय मीडिया और बौद्धिकों में बैठे छद्म सेकुलरों ने जैसे कोई विभ्रम पैदा करने वाली घुट्टी पिला दी है। इस विभम्र को दूर करने का एकमात्र उपाय सावरकर का शुद्ध राष्ट्रवाद है।
आधुनिक भारत में सावरकर का अज्ञात योगदान
भारत को एकजुट रखने में सावरकर के कई महत्वपूर्ण योगदान लगभग अज्ञात हैं जिनके लिए आज के भारत को उनका आभारी होना चाहिए। उदाहरण के लिए जब मुस्लिम लीग ने 1940 में पाकिस्तान प्रस्ताव पारित किया तो सावरकर ने कहा था कि मुसलमानों की तुलना में भारतीय सेना में हिंदुओं का अनुपात कम है। उन्होंने पहले ही यह अनुमान लगा लिया था कि जिस तरह से कांग्रेस मुस्लिम लीग के सामने घुटने टेक रही थी, उसका अंत राष्ट्र को विभाजित करके पाकिस्तान के बनने में होगा। तब उन्होंने सोच लिया था कि विभाजन के दिन सेना में अगर हिंदू सैनिकों की संख्या कम होगी और मुस्लिमों की अधिक तो दूसरा विभाजन भी हो सकता है (जो पाकिस्तान द्वारा विभाजन के तुरंत बाद 1948 में कश्मीर में हमला करके उसके एक हिस्से पर कब्जा कर लिए जाने से सही भी साबित हुआ)।
 
परिणामस्वरूप, उन्होंने हिंदुओं का आह्वान किया कि वे दूसरे विश्व युद्ध (जिसमें अंग्रेजों को जर्मनी-जापान गठबंधन से लड़ने के लिए और अधिक भारतीय सैनिकों की आवश्यकता थी) का लाभ उठाते हुए सेना में प्रवेश करें और अपना सैन्यीकरण करें। इसलिए, विश्व युद्ध के दौरान लाखों हिंदू सेना में भर्ती हुए। वे इतनी बड़ी संख्या में शामिल हुए कि 1944 में मुस्लिम लीग ने अंग्रेजों के सामने विरोध दर्ज कराया कि इतनी बड़ी संख्या में हिंदुओं के सेना में शामिल होने से भविष्य में मुसलमानों के लिए खतरा होगा।
मुस्लिम लीग के नेताओं को अच्छी तरह से पता था कि विभाजन होना है और शायद उन्हें लग रहा था कि यदि विभाजन के दिन सेना में हिंदुओं की संख्या अधिक होगी तो पाकिस्तान के बारे में उनके विचार को खतरा होगा। इस बात के कुल तीन साल बाद ही, भारत विभाजन के मौके पर सावरकर सही साबित हुए। पाकिस्तान के साथ 1948 के युद्ध में शहीद हुए ब्रिगेडियर उस्मान जैसे कुछ अपवादों के अलावा अविभाजित भारत की सेना में मुसलमान सैनिकों और अधिकारियों का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान चला गया था। शहीद ब्रिगेडियर उस्मान को उनकी वीरता के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया और भारत उनके प्रति हमेशा कृतज्ञ रहेगा।
अगर बड़ी संख्या में शामिल होकर हिंदुओं ने सेना में मुस्लिम अनुपात न घटाया होता तो पाकिस्तान ने शायद राजस्थान, गुजरात और यहां तक कि पंजाब पर भी हमला किया होता और संभवत: आज पाक-अधिकृत कश्मीर (पीओके) के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र के अलावा भारत से कुछ और हिस्से कट गये होते। जब सावरकर ने सेना में शामिल होने के लिए हिंदुओं का आह्वान किया था तो कांग्रेस ने उन्हें बदनाम करने के लिए ‘ब्रिटिश पिट्टू’ बताया था। लेकिन सावरकर ने किसी आरोप की परवाह नहीं की। क्योंकि उन्होंने सोचा कि यदि अंतिम रूप से राष्ट्र को फायदा हो रहा है तो इसके लिए उनके नाम पर कीचड़ उछालने वालों की क्या परवाह करना। इस प्रकार सावरकर ने राष्ट्र के व्यापक हित के लिए व्यक्तिगत आरोप भी सहे।
मुस्लिम लीग और कांग्रेसी मुस्लिम नेताओं की रणनीति
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत में केवल दो नेता थे-वीर सावरकर और डॉ. बी.आर. आंबेडकर-जो मुस्लिम लीग और कांग्रेस दोनों में बैठे मुस्लिम रणनीतिकारों के खेल को समझते थे। केवल वे ही जानते थे कि अगर मुस्लिम लीग देश के बंटवारे की मांग कर रही थी तो कांग्रेस के भीतर बैठे मुस्लिम नेतृत्व का ध्यान विभाजन-विरोध के नाम पर अपने समुदाय के लिए ज्यादा से ज्यादा फायदे सुनिश्चित करने पर था। यही वह कारण है जिससे भारतीय राजनीति आज भी मुस्लिम तुष्टीकरण की बंधक बनी हुई है।
अपनाना होगा सावरकर सिद्धांत
नि:संदेह समय आ गया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के मामलों में भारत विशुद्ध राष्ट्रवाद पर आधारित सावरकर सिद्धांत को खुलकर अपनाये। इस बात का भी समय आ गया है कि राष्ट्रवादी भारतीय केवल क्रांतिकारी के रूप में सावरकर के बलिदान का गुणगान करने के बजाय सावरकर के कार्यों और विचारधारा का विशद् अध्ययन करें। भारत अगर विभाजनकारी ताकतों को हराना और आर्थिक तथा आध्यात्मिक महाशक्ति के रूप में उभर कर वसुधैव कुटुम्बकम पर आधारित वैश्विक व्यवस्था के सपने को साकार करना चाहता है तो उसके सामने केवल यही मार्ग है।
 
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और चिंतक हैं)