ज्ञान का तात्पर्य केवल किताबी जानकारी नहीं''
स्रोत:    दिनांक 16-जनवरी-2019
 
                                             मंच पर उपस्थित (बाएं से तीसरे) श्री मोहनराव भागवत एवं अन्य विशिष्टजन  
''हमारे देश की भाषा, संस्कृति और समाज में विविधताएं हैं। इसलिए शिक्षा की दिशा एक समान हो कर भी पद्धतियों में भिन्नता हो सकती है। ऐसे में केंद्र से शिक्षा नीति बनना व्यवहारसम्मत नहीं होगा, इसलिए शिक्षा नीति विकेंद्रित होनी चाहिए।''
उक्त बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने कही। वे गत दिनों नागपुर के सिताबर्डी स्थित सेवासदन शिक्षा संस्थान द्वारा आयोजित रमाबाई रानडे स्मृति शिक्षा प्रबोधन पुरस्कार वितरण समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि शिक्षा सभी प्रकार के विकास एवं उन्नति का आधार है। हमारे जीवन में बहुत बार ज्ञान शब्द का प्रयोग होता है, लेकिन ज्ञान का तात्पर्य केवल किताबी बातों से नहीं है,बल्कि हमें प्राप्त शिक्षा का जीवन में उपयोग करने की विधि को ज्ञान कहते हैं। सूचना और ज्ञान में अंतर होता है। सूचनाओं के साथ जब विवेक जुड़ता है तो उसका ज्ञान बन जाता है। हम अपने जीवन में जो कुछ करते हैं, उसका एक महत्व होता है। हम जो कुछ भी हैं, उसे स्वीकार कर आगे बढ़ना चाहिए। दुनिया में कुछ भी छोटा-बड़ा नहीं होता। हम जो कुछ भी हैं, उस अस्तित्व के यथार्थ से शर्मसार होने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि समाज में से महिलाओं की उपेक्षा समाप्त होगी तभी देश सही मायनों में प्रगति करेगा। मातृशक्ति में प्रगति एवं विकास की असामान्य शक्तियां मौजूद हैं। उन्हें अपनी प्रतिभा और योग्यता का परिचय देने के लिए केवल उन पर लादी गईं बंदिशों से मुक्त करने की आवश्यकता है। हमारी प्राचीन सभ्यता में महिलाओं पर किसी भी प्रकार की पाबंदियां नहीं थीं, लेकिन मध्ययुगीन काल में घटित घटनाओं के बाद सामाजिक परिवर्तन के दौर में महिलाओं को बेडि़यों में जकड़ दिया गया, उन्हें इन बेडि़यों से मुक्ति दिलाना बेहद आवश्यक है। महिला सशक्तीकरण समय की मांग है।
उन्होंने देश में बन रही नई शिक्षा नीति पर कहा कि देश में नई शिक्षा नीति का सृजन होने की चर्चा है। लेकिन उन नीतियों पर अब तक अमल नहीं हुआ है। आगे चल कर शिक्षा नीति कौन संचालित करेगा, इस पर इन शिक्षा नीतियों का भविष्य निर्भर करता है। शिक्षा प्रणाली के तय ढांचे से बाहर निकल कर कई नए सकारात्मक प्रयोग हो रहे हैं, लेकिन इन प्रयोगों को समाज में ढालने की आवश्यकता है।