रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण को लेकर सेकुलर वर्ग के पाखंड का पर्दाफाश
स्रोत:    दिनांक 16-जनवरी-2019
- प्रो. मक्खन लाल
दोहरे मानदंडों पर गढ़ी दलीलों और विरोधाभासी मानकों के आधार पर सेकुलर वर्ग अयोध्या में राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का विरोध करता है। वे अंग्रेजों के प्रमाण को मान्यता नहीं देते, लेकिन अपनी दलीलों का आधार तैयार करने के लिए ब्रितानी अभिलेखों को विश्वसनीय मानने से उन्हें गुरेज नहीं। वे हमारे धार्मिक ग्रंथों से उद्धृत प्रमाणों को मान्यता नहीं देते, लेकिन अपने मजहबी ग्रंथों को अक्षरश: सत्य मानते हैं। यह कैसा पाखंड है?
 
                                                                       उत्खनन स्थल से मिले प्राचीन भग्नावशेष 
जनमानस में प्रचलित मान्यता और जन्मभूमि पर राम मंदिर के पुनर्निर्माण का विरोध करने वालों का कहना है कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि अयोध्या हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल है और यहां राम का जन्म हुआ था। वे यह भी कहते हैंकि इस बात का भी कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि यहां कभी कोई मंदिर था जिसे ध्वस्त करके ढांचा खड़ा किया गया। अंत में वे यह भी कहते हैं कि अगर यह साबित हो गया कि ढांचे का निर्माण जन्मस्थान पर स्थित एक मंदिर को ध्वस्त करने के बाद हुआ था, तो मुसलमान खुशी-खुशी हिंदुओं को जमीन दे देंगे। (जब ढांचा दुरुस्त खड़ा था तो कई मुस्लिम नेताओं और बुद्धिजीवियों ने खुद कहा था कि मंदिर बनाने के लिए वे खुद ढांचे को ढहा देंगे।)
इस मुद्दे के विश्लेषण की शुरुआत हम ‘एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ में अयोध्या मामले पर प्रस्तुत जानकारी के परिप्रेक्ष्य में करेंगे, जो इस प्रकार है- ‘‘उत्तर प्रदेश के फैजाबाद के पास घाघरा नदी के तट पर भारत का एक प्राचीन शहर अयोध्या (अजोध्या) स्थित है जो हिंदुओं के सात पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है, क्योंकि पौराणिक काल में यह कौशल नरेश दशरथ की राजधानी (जिसकी परिधि 96 मील थी) थी, जो राम के पिता थे, जिनके नाम पर रामायण नाम के अद्भुत महाकाव्य की रचना हुई। राम के जन्मस्थल पर बने मंदिर पर मुगल सम्राट बाबर ने ढांचा खड़ा करवा दिया था। हालांकि, हनुमानगढ़ी और कनक भवन मंदिरों में राम के अनुयायी वैष्णव पूजा-अर्चना करते रहे थे। कई घाट राम कथा से जुड़े हैं ...’’
एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ का सशक्त दावा है कि उसमें शामिल प्रविष्टियां संबंधित क्षेत्रों के प्रमुख अधिकारियों ने उपलब्ध कराई हैं जो गहन शोध और यथासंभव विभिन्न स्रोतों से तथ्यों के सत्यापन के बाद ही प्रस्तुत की गई हैं। यह बात भी गौर करने योग्य है कि भारत की अदालतों ने भी अपने निर्णयों में दी गई दलीलों को मजबूत करने के लिए ‘एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ का उद्धरण दिया है। अवध गजेटियर की प्रविष्टियां, ‘दि गजेटियर आॅफ फैजाबाद डिस्ट्रिक्ट’ और भारतीय इतिहास के ब्रिटिश काल से संबंधित कई स्रोतों से मिले तथ्य एक ही बात दर्शाते हैं कि बाबर ने भगवान राम के जन्मभूमि मंदिर को नष्ट करके ढांचा बनवाया था।
हिंदुओं के पक्ष का विरोध करने वाले कई विद्वानों, राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं ने दलील रखी, ‘‘ये प्रमाण ब्रिटिश स्रोतों से निकाले गए हैं जो तथ्यपरक नहीं माने जा सकते, क्योंकि उन्हें अंग्रेजों ने भारतीयों को बांटने और उन पर शासन करने की नीति के तहत गढ़ा था।’’ मुस्लिम नेताओं, बुद्धिजीवियों और उनके समर्थकों ने अपनी व्यूहरचना के उद्देश्य से कहा,‘‘हमें ब्रिटिश स्रोतों से अलग और पूर्व-ब्रिटिश काल के प्रमाण दिखाएं।’’ सैय्यद शहाबुद्दीन ने कहा, ‘‘सभी ऐतिहासिक साक्ष्य ब्रिटिश स्रोतों से मिले हैं। वास्तविकता यह है कि ब्रिटिश काल से पहले के इतिहासकार भी इसका विवाद के तौर पर उल्लेख नहीं करते।’’(द वीक, 25 फरवरी,1990)
इस विश्वास के साथ कि शहाबुद्दीन और उनके साथियों ने ये गंभीरता से वक्तव्य दिए होंगे, विभिन्न विषयों के कई विद्वानों ने बड़ी संख्या में मुस्लिम स्रोतों/प्रमाणों को उद्धृत किया जिनमें स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है कि राम के जन्मस्थान पर स्थित मंदिर को ध्वस्त करके ढांचे का निर्माण किया गया था।
हालांकि, जब मुस्लिम साक्ष्य प्रस्तुत किए गए, वह भी औरंगजेब की पोती और सुप्रसिद्ध विद्वानों के, तो शहाबुद्दीन और उनके जैसे लोगों ने उन्हें साफ नकारते हुए कहा कि मुस्लिम प्रमाणों से कुछ भी साबित नहीं होता। हालांकि, इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को सिरे से खारिज करते समय उन्होंने अपनी ओर से तथ्य प्रस्तुत करने की जरूरत भी नहीं समझी। बस कहने के लिए कह दिया कि ये प्रमाण कुछ साबित नहीं करते। उन्होंने ब्रिटिश साक्ष्यों से स्वतंत्र साक्ष्य प्रदान करने की पुरजोर वकालत से पाला बदल कर उस स्थान पर 14वीं से 16वीं सदी तक मंदिर के अस्तित्व संबंधी साक्ष्य प्रस्तुत करने और बाबर द्वारा मंदिर ध्वस्त करने के समकालीन साक्ष्य प्रदान करने की जिद पकड़ ली। अपनी मांग में उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि इस बात का प्रमाण भी देना होगा कि राम का जन्म ठीक उसी स्थल पर हुआ था जहां हिंदू दावा कर रहे हैं। (इंडियन एक्सप्रेस 6 अप्रैल, 1990) इसके अतिरिक्त, मुस्लिम शासकों द्वारा मंदिरों को नष्ट करने के साक्ष्य के बारे में उनका जवाब था, ‘‘यह सवाल बार-बार पूछा जाता है कि मुस्लिम शासकों ने अपनी हुकूमत के तहत मंदिरों को उजाड़ कर मस्जिद बनवाई या नहीं, जिसका जवाब कई बार दिया जा चुका है, फिर भी लोग इतना बड़ा आरोप लगाते रहते हैं। यह उनकी बीमार मानसिकता दर्शाती है।’’(इंडियन एक्सप्रेस, 6 अप्रैल,1990)
जन्मभूमि पर मंदिर का अस्तित्व नकारने वाला समूह यह देखने के लिए तैयार नहीं कि अगर किसी ने बड़ा आरोप लगाया तो वह थी औरंगजेब की पोती मिर्जा जान, शेख मुहम्मद अजमत अली काकोरवी नामी और मिर्जा रजब अली बेग सुरूर जैसे लोग, न कि हिन्दू वे इन साक्ष्यों का सामना नहीं कर सकते, इसलिए राम जन्मस्थान मंदिर के अस्तित्व और विध्वंस संबंधी मुस्लिम प्रमाणों में निहित साक्ष्य को अस्वीकार करने की दलील गढ़ ली। इस बदलते रवैये से स्थिति और बिगड़ गई। लिहाजा, फिर नए सिरे से खोज शुरू हुई और बड़ी संख्या में साहित्यिक, पुरातात्विक साक्ष्यों और शिलालेखों में दर्ज प्रमाणों को प्रस्तुत करने का सिलसिला आरंभ हुआ, जो स्पष्ट दिखा रहे थे कि अयोध्या एक पौराणिक नगरी है और राम की गाथा की पौराणिकता ढांचे के नायक के मुकाबले अनिर्वचनीय है। वास्तव में यह करीब पिछले 3,000 वर्ष से हिंदुओं की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं और विश्वास में गुंथी आस्था-यात्रा है। ब्रह्म पुराण (4.40.91) में अयोध्या का उल्लेख सात शहरों के समूह में किया गया है, जो अत्यंत पवित्र और मोक्षदायी हैं। ये सात शहर हैं- अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, द्वारिका, कांची और उज्जयनी।
रामनवमी के दिन व्रत (उपवास) का पालन करने वाले भक्तों का राम जन्मस्थान में पहुंचना बहुत ही शुभ माना गया है। अयोध्या महात्म्य (13वीं शताब्दी का ग्रंथ) में निम्नलिखित शब्दों में इसका वर्णन है, ‘‘जो व्यक्ति जन्मस्थान का दर्शन करता है, वह अगर भेंट न भी चढ़ाए, या तपस्या, तीर्थयात्रा या यज्ञ-हवन न करे, फिर भी उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। नवमी के दिन व्रत रखने वाला व्यक्ति जन्मस्थान पहुंचने पर स्नान और भेंट अर्पण करने से मिली अलौकिक शुभता के प्रभाव से जन्म-जन्मांतर के बंधन से मुक्त हो जाता है। राम जन्मभूमि के दर्शन मात्र से उसे प्रतिदिन हजार गाय के दान से मिलने वाला पुण्य प्राप्त होता है।’’ कई अन्य ऐतिहासिक स्रोतों से स्पष्ट होता है कि हिंदू राजाओं और शासकों ने भी राम जन्मभूमि के पवित्र स्थल पर अपना अधिकार बरकरार रखा। अयोध्या और हिंदुओं के अन्य पवित्र स्थानों पर पुन: नियंत्रण हासिल करने के लिए 17वीं और 19वीं शताब्दी के दौरान लड़ाइयां, समझौते, आक्रमण की धमकी और वार्ताओं आदि जैसे सभी दांवपेच आजमाए गए। अकबर ने हिंदुओं के दावों को मान्यता देते हुए भगवान राम के जन्मस्थान के प्रतीक के तौर पर ढांचे के आंगन में एक चबूतरा बनाने और हिंदुओं को ढांचे के आंगन में पूजा करने की अनुमति दी थी।
 
                                                            उत्खनन से मिला कुषाण कालीन ढांचा और बर्तन 
बाबरी ढांचे के भग्नावशेषों के पुरातात्विक साक्ष्यों तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा कराए गए उत्खनन से प्राप्त सामग्रियों को प्रस्तुत करने का सिलसिला शुरू हुआ। अयोध्या में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा कराए गए उत्खनन में बतौर छात्र शामिल के़ के.मोहम्मद, जिन्होंने खुदाई के दौरान मंदिर जैसी संरचना की उपस्थिति को सत्यापित किया था, लिखते हैं, ‘‘मैं ज्यादा अधिकार से इस बात को दोहरा सकता हूं, क्योंकि मैं अकेला मुस्लिम था, जिसने 1976-77 में प्रो़ लाल के अधीन स्कूल आॅफ आर्कियोलॉजी के प्रशिक्षु के रूप में अयोध्या की खुदाई में भाग लिया था। मैं हनुमानगढ़ी स्थल पर था, लेकिन मैं बाबरी ढांचे के पास हो रही खुदाई वाले हिस्से में भी गया था और खुदाई में निकले आधार स्तंभों को देखा था। जेएनयू के इतिहासकारों ने खुदाई में प्राप्त निष्कर्षों के एक हिस्से पर रोशनी डाली, बाकी को दबा दिया। मैं अक्सर सोचता था कि प्रो़ लाल इस मुद्दे पर मौन क्यों रहे, जबकि जेएनयू समूह उन निष्कर्षों को धड़ाधड़ प्रकाशित करवा रहा था। अयोध्या हिंदुओं के लिए उतना ही पवित्र है जितना मक्का मुसलमानों के लिए। मुसलमानों को अपने लाखों हिंदू भाइयों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए और स्वेच्छा से उस ढ़ाचे को राम मंदिर के निर्माण के लिए सौंप देना चाहिए।’’ इंडियन एक्सप्रेस, 15 दिसंबर, 1990)
के.के. मोहम्मद जैसे कई मुस्लिम नेताओं और बुद्धिजीवियों ने अपने समुदाय को मंदिर के निर्माण हेतु ढांचा सौंप देने के लिए मनाने की पूरी कोशिश की। हालांकि जो लोग बुद्धिजीवी का मुखौटा लगाए चुनावी राजनीति और मजहबी अशांति की शतरंज सजाने में अधिक दिलचस्पी रखते थे, उन्होंने दोयम प्रवृत्ति बनाए रखी। एक ओर वे जनता के सामने उदार विचारधारा का नाटक रच समस्या के समाधान की खोज करते नजर आते, वहीं दूसरी ओर उनकी विषाक्त दृष्टि शांतिपूर्ण समाधान के सभी रास्तों को झुलसाती रही। इसकी स्पष्ट झलक कलकत्ता में अवध महाराज के ट्रस्ट के चेयरमैन और लखनऊ में अखिल भारतीय शिया सम्मेलन के अध्यक्ष अंजुम कादरी को लिखे शहाबुद्दीन के पत्र (4 जुलाई, 1987) में दिखती है। कादरी एक प्रतिष्ठित मजहबी नेता हैं जो ईमानदारी से समस्या का समाधान करना चाहते थे। वे ढांचे को हटाने और उस स्थल को मंदिर निर्माण के लिए हिंदुओं को सौंपने के पक्षधर हैं। शहाबुद्दीन ने कादरी को लिखा, ‘‘भले ही किसी फिरके की सोच में ढांचा हटाने की इजाजत दी गई हो, लेकिन हटाने का विकल्प चुनने की कोई वजह नहीं है। दरअसल, इसे हटाने से समस्याओं का अंबार खड़ा हो जाएगा। कृपया इस राह पर आगे न बढ़ें। मैं आरएसएस द्वारा प्रस्तावित इसे हटाने के विचार की पुरजोर खिलाफत करता हूं जिसे आप स्वीकार करने के लिए तैयार दिखते हैं। कृपया पुनर्विचार करें ।’’
साफ है कि राम जन्मभूमि मंदिर को ढहाने के साक्ष्य जैसे-जैसे सामने आते गए, वैसे-वैसे शहाबुद्दीन और मार्क्सवादी इतिहासकार और अन्य लोग अपने-अपने मोर्चे बदलते गए और मंदिर नष्ट करने से संबंधित समकालीन साक्ष्यों की मांग करने लगे और कहा कि रामकोट या निवासस्थान के बजाय उस विशिष्ट स्थल से जुड़े प्रमाण प्रस्तुत किए जाएं, जहां राम ने वास्तव में जन्म लिया था। शहाबुद्दीन ने अंत में लिखा, ‘‘मंदिर निर्माण के समकालीन साक्ष्य को ही ऐतिहासिक रूप से एकमात्र संतोषजनक साक्ष्य माना जाएगा कि कब इसका निर्माण किया गया और किस अवधि के दौरान उसका अस्तित्व मौजूद था (ई़पू़ चौथी शताब्दी से सन् 1528 के बीच) और कब कथित तौर पर इसे ध्वस्त कर दिया गया था।’’ उस विशिष्ट स्थान को इंगित करने की बात कहते हुए वे एक या दो वर्ग फुट जमीन के उस टुकड़े का साक्ष्य प्रस्तुत करने की मांग करने लगे, जहां भगवान राम का जन्म हुआ था, क्योंकि उनके अनुसार राम भगवान हो सकते हैं पर उनका जन्म अलौकिक नहीं। ए. के़ चटर्जी द्वारा ‘कुरान की दिव्यता’ पर सवाल करने पर तीखी प्रतिक्रिया जताते हुए शहाबुद्दीन एक जगह लिखते हैं, ‘‘वे राम को दिव्य नहीं मानते। श्री चटर्जी के पवित्र कुरान का संदर्भ उठाने के जवाब में मैं कहूंगा कि वे प्राकट्य की आध्यात्मिक प्रक्रिया और मानव जन्म की शारीरिक प्रक्रिया के बीच अंतर को देखने में विफल रहे। इन दोनों की भिन्न प्रकृति के आधार पर ही भिन्न ऐतिहासिक साक्ष्यों की मांग रखी गई है।’’इस प्रकार, शहाबुद्दीन ने स्पष्ट किया कि पवित्र कुरान पर चर्चा नहीं हो सकती, क्योंकि यह ईश्वरीय है, जबकि भगवान राम के जन्म पर बहस होनी चाहिए, क्योंकि यह मानव जन्म की प्रक्रिया थी।
मुझे नहीं पता कि गांधीजी, जिन्ना, मौलाना आजाद, सर सैयद अहमद खां, जवाहरलाल नेहरू और कई अन्य आधुनिक युग की विभूतियों के अस्तित्व के प्रमाण को प्रस्तुत करने के लिए दो-दो फुट जमीन के टुकड़े को अकाट्य दस्तावेजों के तौर पर सीमांकित किया जा सकता है या नहीं। लेकिन शहाबुद्दीन या प्रो़ आर.एस. शर्मा, रोमिला थापर, सूरजभान, इरफान हबीब, एस. गोपाल आदि सभी मार्क्सवादी इतिहासकार इसी तर्ज पर एक या दो वर्ग फुट जमीन या अस्पताल की मेज के दायरे के अंदर खुद के जन्म-स्थान के अकाट्य सबूत प्रदान कर सकते हैं?
मैं यह सोचकर कांप जाता हूं कि अगर किसी अन्य मत के संदर्भ में ऐसी मांग की जाए तो क्या होगा? इसकी झलक के लिए सिर्फ एक उदाहरण ही पर्याप्त है। सलमान रुश्दी की पुस्तक ‘द सैटेनिक वर्सेज’ में कहा गया है, ‘‘हो सकता है कि कुरान वास्तव में अल्लाह द्वारा कहे शब्द नहीं’’ और उस पर दावानल की तरह उभरा रोष और प्रतिरोध भी हमने देखा जो मुसलमानों ने दुनियाभर में व्यक्त किया। जबकि वह एक भ्रम मात्र था जो स्वप्न में घटित होता है और कल्पना की दुनिया का एक काल्पनिक दृश्य कहानी बनकर कागज पर उतरा था।
अंतत: परिणाम क्या हुआ? मुझे इसके बारे में फिर से बताने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि शायद ही कोई ऐसा खुशकिस्मत इनसान होगा जो ‘सैटेनिक वर्सेज’ के प्रकाशन के बाद उभरे घटनाक्रमों से अनभिज्ञ हो। इसलिए राम जन्म को लेकर और स्थान के बारे में विवाद खड़े करके सेकुलर अपने पाखंड से ही परिचित कराते हैं जिसकी कोई हद नहीं है