मजहब की दीवार, अहमदिया लाचार
स्रोत:    दिनांक 17-जनवरी-2019
- सतीश पेडणेकर  
अहमदिया मुसलमानों को अन्य मुस्लिम फिरकों द्वारा न तो स्वतंत्र रूप से बोलने का अधिकार दिया जा रहा है और न ही लिखने का। कोई दुस्साहस करता है तो उसे सजा दी जाती है। यहां तक कि अहमदियाओं को मुसलमान ही नहीं माना जा रहा
 
पाकिस्तान के सियालकोट में एक क्षतिग्रस्त अहमदिया मस्जिद। इसे वहां के कट्टरवादियों ने पिछले साल बम से उड़ा दिया था 
गत 5 जनवरी को ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ में एक छोटी-सी खबर छपी थी, जिसका शीर्षक था, ‘अहमदिया पोएट बशरत्स टॉक कैन्सल्ड इन पुणे।’ उल्लेखनीय है कि पुणें में 4 से 6 जनवरी तक मुस्लिम मराठी साहित्य सम्मेलन होने वाला था। इस सम्मेलन की समिति से जुड़े डॉ. बशरत अहमद का भी भाषण होना था, लेकिन 4 जनवरी को जुम्मे की नमाज के बाद कुछ कट्टर मुस्लिम युवाओं ने सम्मेलन स्थल पर उनके भाषण के खिलाफ नारेबाजी की। उनका कहना था, ‘‘बशरत इस्लाम विरोधी और मजहबद्रोही हैं। इसलिए उनका भाषण नहीं होना चाहिए।’’ प्रो. शम्सुद्दीन तांबोली के अनुसार कुछ मुस्लिम युवाओं ने सम्मेलन के आयोजकों से बात की और उसके बाद बशरत का भाषण रद्द कर दिया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देने वाले साहित्यकारों ने इसे चुपचाप स्वीकार भी कर लिया। किसी ने इसका विरोध नहीं किया। दरअसल, वे मुस्लिम कट्टरवादी किसी अहमदिया के ‘मुस्लिम साहित्य सम्मेलन’ से जुडेÞ होने के खिलाफ थे।
1990 के दशक में सोलापुर में मुस्लिम मराठी साहित्य सम्मेलन की स्थापना हुई। हिंदू और मुसलमानों के बीच सौहार्द बढ़ाने का मकसद लेकर चली यह संस्था कैसे कट्टरवादियों की कठपुतली बन गई, यह खोज का विषय है। हर साल मराठी साहित्य समेलन होता है, जिसमें सभी मत-पंथों के साहित्यकार हिस्सा लेते हैं। मगर इस बार एक अहमदिया लेखक को दरकिनार कर मुस्लिमों और अहमदियों के बीच का तनाव जरूर बढ़ा दिया गया। दरअसल, बशरत अहमद के भाषण को उनके अहमदिया होने के कारण रद्द करना साहित्यिक मामलों में मजहबी मान्यताओं को थोपने की कोशिश थी।
यही अहमदियाओं की त्रासदी है। वे अपने को मुसलमान मानते हैं, लेकिन मुसलमान उन्हें मुसलमान नहीं मानते। उनके मुस्लिम कहलाने और मुस्लिम समाज से जुड़ने का हरसंभव विरोध किया जाता है। मुस्लिम समाज अहमदियों को उनकी मजहबी आजादी का पालन नहीं करने देता। इस कारण कई बार दोनों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है। ऐसी स्थिति में भारत का लोकतंत्र और सेकुलरिज्म अहमदियों के साथ खड़ा नहीं हो पाता। पिछले कुछ बरसों में घटित कुछ घटनाओं से ऐसा लगता है कि जब भी अहमदियाओं और मुस्लिमों में टकराव की स्थिति होती है तो भारत का सेकुलरवाद नाकाम हो जाता है। तब सेकुलर भी चुप हो जाते हैं। नसीरुद्दीन शाह, शाहरुख खान और आमिर खान जैसे असहिष्णुता का नारा लगाने वाले कलाकार भी, क्योंकि उन्हें अपने मजहब और अपने लोगों की असहिष्णुता दिखाई नहीं देती।
बशरत अहमद के भाषण को रद्द करने का न किसी मराठी अखबार ने जिक्र किया, न किसी साहित्यकार ने। सबने इसे मुस्लिमों का अंदरूनी मामला कहकर नजरअंदाज कर दिया। यानी भारत जैसे सेकुलर देश में भी अहमदियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कोई मायनेनहीं रखती।
पहले भी इस तरह की घटनाएं हुई हैं। 2016 के दिसंबर के आखिरी हफ्ते में दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में ‘कुरान के महत्व’ पर अहमदिया मुस्लिम जमात की ओर से तीन दिन की प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था। इसमें कुरान की शिक्षा और जीवन में उसके महत्व को दिखाने वाले बैनर और विभिन्न अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में छपे लेखों और विद्वानों के विचारों को प्रदर्शित किया गया था। लेकिन बाकी मुस्लिम समाज के कुछ संगठनों और लोगों ने इस प्रदर्शनी के खिलाफ प्रदर्शन किया। पहले दिन तो पुलिस ने उन्हें समझा-बुझाकर भेज दिया, लेकिन वे दूसरे दिन फिर सुबह आ गए। इनमें इमाम बुखारी के भाई याह्या बुखारी भी थे। इसके बाद दरियागंज में भी प्रदर्शन हुआ, जहां प्रदर्शनकारियों की अगुआई कर रहे सैयद अहमद बुखारी सहित अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। विरोध करने वालों में आॅल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कमाल फारुखी और आॅल इंडिया मुस्लिम एंड दलित इंटलेक्चुअल फ्रंट के अध्यक्ष मोहम्मद हसन भी शामिल थे। टकराव की आशंका के कारण मजबूर होकर अहमदिया मुस्लिम जमात को अपना कार्यक्रम रद्द करना पड़ा।
विरोध करने वालों का कहना था, ‘‘जिन लोगों ने प्रदर्शनी का आयोजन किया था वे मुस्लिम नहीं हैं और लोगों को गुमराह कर रहे हैं। हमारा मानना है कि गैर-मुस्लिम हमें कुरान के बारे में थोड़े समझाएंगे। वे कुछ भी करें लेकिन कुरान का जिक्र न करें, यही हमारी मांग है।’’ अहमदिया और अन्य मुस्लिमों के बीच विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा यही है। मगर अहमदिया कुरान को मानें या उसका प्रचार करें या न करें, यह अहमदियाओं का अपना मजहबी मामला है और इस मामले में उन्हें मजबूर नहीं किया जा सकता, लेकिन ऐसा हो रहा है।
जून, 2008 में भी हैदराबाद में अहमदिया मुस्लिम जमात की ओर से एक सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इसका भी जमकर विरोध हुआ। सबसे पहले तो हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व में मुसलमानों ने मुख्यमंत्री वाईएसआर रेड्डी को ज्ञापन देकर मांग की कि यह सम्मेलन न होने दिया जाए। अहमदिया जमात को पहले से ही आशंका थी कि सम्मेलन का विरोध हो सकता है। इसलिए उन्होंने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी थी। उच्च न्यायालय ने पुलिस से कहा कि जमात को सम्मेलन करने की इजाजत दी जाए, लेकिन मुख्यमंत्री ने पुलिस को निर्देश दिए थे कि सम्मेलन किसी सार्वजनिक स्थान पर न होने पाए। यही नहीं, मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के नेतृत्व में लगभग एक दर्जन मुस्लिम संगठनों के कार्यकर्ता सम्मेलन स्थल के बाहर इकट्ठे हो गए थे। आखिर में कानून-व्यवस्था के बिगड़ने के डर से पुलिस ने अनुमति वापस ले ली। इन मुस्लिम संगठनों की दलील थी, ‘‘अहमदिया गैर-मुस्लिम हैं और मुसलमानों के नाम पर ऐसी गतिविधियों का संचालन करके वे मुस्लिमों की मजहबी भावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हैं। ऐसी बातों का प्रसार कर रहे हैं जो उनके मजहब के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ हैं।’’
अहमदियाओं और बाकी मुस्लिमों के बीच का झगड़ा उतना ही पुराना है जितना पुराना अहमदिया मत। पंजाब के गुरदासपुर जिले के कादियान में मिर्जा गुलाम अहमद ने 1889 में स्वयं को मुजादीद (युग सुधारक) घोषित किया। इसका मतलब था कि इस्लाम में जिन मसीहा के आने की भविष्यवाणी की गई है वह वही खुद हैं। अहमदिया समुदाय के लोग हनफी इस्लामिक कानून का पालन करते हैं। इसकी शुरुआत भारत में मिर्जा गुलाम अहमद ने की थी। मिर्जा गुलाम अहमद को एक नबी यानी खुदा का दूत माना जाता है, जबकि इस्लाम के ज्यादातर फिरके मोहम्मद को आखिरी पैगंबर मानते हैं।
इसके चलते ही अहमदिया मत के लोग बाकी मुस्लिमों के निशाने पर आ जाते हैं। वैसे अहमदिया मुस्लिमों का कहना है कि मिर्जा गुलाम अहमद ने अपनी कोई शरीयत नहीं दी है, बल्कि मोहम्मद साहब की शिक्षाओं को ही फैलाया, लेकिन वे खुद भी एक नबी का दर्जा रखते थे।
इस तरह उन्होंने अहमदिया मत की स्थापना की जिसे बाद में अहमदिया मुस्लिम जमात कहा जाने लगा। आमतौर पर अहमदिया मत की मजहबी मान्यताएं आम मुस्लिमों जैसी ही हैं, लेकिन कई मामलों में वे आम मुस्लिमों से अलग हैं। इन विवादास्पद मान्यताओं के कारण ही आम मुसलमान उन्हें मुस्लिम नहीं मानते। कई इस्लामी देशों में तो उन्हें मजहबद्रोही या गैर-मुसलमान माना जाता है। उनका कठोरता से दमन किया जाता है और उनके साथ भेदभाव बरता जाता है।
मुस्लिम देशों में फैली यह अहमदिया विरोध की बीमारी अब भारत में भी आ गई है। भारत में अहमदियाओं की अच्छी-खासी संख्या है। इनमें से ज्यादातर राजस्थान, ओडिशा, हरियाणा, बिहार, दिल्ली, उत्तर प्रदेश तथा कुछ पंजाब के कादियान इलाके में रहते हैं। भारत सरकार उन्हें मुस्लिम मानती है। उन्हें गैर मुस्लिम घोषित करने या उनकी गतिविधियों पर पाबंदी लगाने का कोई कानून नहीं है। लेकिन दारुल उलूम देवबंद अहमदियाओं को गैर-मुसलमान मानता है और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में कोई अहमदियाओं सदस्य नहीं हो सकता। लंबे समय से अहमदियाओं के खिलाफ मुसलमानों का अभियान चल रहा है। 1993 में भारत में अहमदियाओं के खिलाफ किताबें बांटी गईं। उन किताबों में अहमदियों को वाजिब-उल-कत्ल कहा गया। यानी उनका कत्ल कर सकते हैं और कोई गुनाह नहीं होगा। 14 जून,1997 को दिल्ली में आॅल इंडिया मजलिस-ए-तहफ्फुज खत्म-ए-नबूव्वत के बैनर तले एक कॉन्फ्रेंस हुई और अहमदियों का बहिष्कार करने का ऐलान हुआ। देवबंद के दारुल-उलूम ने अहमदियों को काफिर कहे जाने वाले उस फतवे की हिमायत की, जो मौलाना अहमद रजा ने 1893 में जारी करवाया था।
अहमदियाओं और बाकी मुस्लिम समाज के बीच बढ़ता झगड़ा एक बार अल्पसंख्यक आयोग की देहरी तक जा पहुंचा। आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष वजाहत हबीबुल्लाह ने दिल्ली की घटना पर टिप्पणी की, ‘‘अहमदियाओं की स्वतंत्रता पर हमला स्पष्ट रूप से हमारे अधिकार क्षेत्र में आता है।’’ लेकिन आयोग की इस घोषणा से अहमदियाओं को बहुत लाभ नहीं हुआ, क्योंकि दुनियाभर की मुस्लिम मजहबी संस्थाएं उनके खिलाफ फतवा जारी कर चुकी हैं।
अहमद बुखारी ने कहा कि आयोग को 15 करोड़ मुसलमानों को नोटिस जारी करने पड़ेंगे, क्योंकि वे कभी अहमदियाओं को मुसलमान नहीं कहने देंगे। अहमदियों को लगता है कि भारत के एक सेकुलर देश होने के कारण उन्हें पूरी मजहबी आजादी मिल सकती है। मुसलमानों की तरफ से विरोध उग्र होता जा रहा है। ऐसे में टकराव होना लाजिमी है, लेकिन इस टकराव में सरकार करोड़ों की आबादी वाले मुस्लिम समाज का साथ देगी या चंद लाख आबादी वाले अहमदियाओं की मजहबी स्वतंत्रता की रक्षा करेगी, यह वक्त ही बताएगा। लेकिन अब तक का अनुभव तो यही बताता है कि सरकार इस कसौटी पर खरी नहीं उतरी। अहमदियाओं को हर बार अपने कार्यक्रम रद्द करने पड़े हैं। क्या यह छद्म सेकुलरवाद नहीं है?
पाकिस्तान जैसे इस्लामी देश में तो अहमदियाओं के साथ भेदभाव सारी हदें पार कर चुका है। 1953 में जमात ने अहमदिया मुसलमानों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया, जिसमें लगभग 2000 अहमदिया मारे गए। पंजाब में मार्शल लॉ लगा तथा गुलाम मोहम्मद के मंत्रिमंडल को इस्तीफा देना पड़ा।
पाकिस्तान में लगभग 40,0000 अहमदिया रहते हैं, लेकिन 1978 में पाकिस्तान की संसद ने प्रस्ताव पारित कर घोषणा की कि अहमदिया गैर-मुस्लिम हैं। और देश के संविधान में संशोधन कर कहा गया कि मुस्लिम केवल वही है जो मोहम्मद को आखिरी पैगंबर मानता है। 1984 में जनरल जिया उल हक ने गैर-मुस्लिम गतिविधियों को रोकने के नाम पर अध्यादेश जारी किया जिससे अहमदियाओं के स्वयं को मुस्लिम कहलाने पर रोक लगाई गई। इसके अलावा, वे अपने इबादत स्थल को मस्जिद नहीं कह सकते हैं, न ही सार्वजनिक तौर पर अपने मजहब का प्रसार कर सकते हैं, न ही गैर-अहमदी मस्जिदों में नमाज पढ़ सकते हैं, न ही अपनी मजहबी सामग्री प्रकाशित कर सकते हैं। पाकिस्तान में इस अहमदिया विरोधी माहौल के कारण देशभर में अहमदियों पर हमले होने और उन्हें परेशान किए जाने की खबरें आती रही हैं। 28 मई, 2010 को लाहौर की अहमदिया मस्जिद पर पंजाब की तहरीक-ए-तालिबान द्वारा किए गए हमले में 95 लोग मारे गए और 100 लोग घायल हो गए थे।
इमरान खान ‘नया पाकिस्तान’ का नारा देकर प्रधानमंत्री बने हैं, लेकिन उनकी सरकार ने भी कट्टरवादियों के आगे घुटने टेक दिए हैं। उनके दबाव में जाने-माने अर्थशास्त्री आतिफ मियां की नियुक्ति रद्द कर दी गई। आतिफ को आर्थिक सलाहकार परिषद में जगह दी गई थी। कट्टरवादी इस्लामिक पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) समेत कई लोगों और समूहों ने उनकी नियुक्ति का विरोध किया था। मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलाजी से पढ़ाई करने वाले 43 वर्षीय आतिफ अमेरिका के प्रतिष्ठित प्रिंसटन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। वे इकलौते पाकिस्तानी हैं जिनका नाम अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के शीर्ष 25 प्रतिभाशाली युवा अर्थशास्त्रियों की सूची में शामिल है। अतीफ मियां का कसूर इतना था कि वे अहमदिया हैं, जो अपने को मुसलमान मानते हैं मगर मुसलमान उन्हें मुसलमान नहीं मानते।
पाकिस्तानी संविधान में इस समुदाय का जिक्र गैर-मुस्लिम के तौर पर है। पाकिस्तान में कट्टरवादी आए दिन इस समुदाय के लोगों को निशाना बनाते रहते हैं। वहां अहमदिया विरोध कितना आगे तक चला गया है इसकी मिसाल है अब्दुस सलाम। वे भले ही पाकिस्तान के पहले और इकलौते नोबेल पुरस्कार विजेता थे, लेकिन वे एक अहमदिया थे और सिर्फ इसी वजह से उनकी कब्र पर लिखी गई इबारतों में से ‘मुस्लिम’ शब्द मिटा दिया गया। अब्दुस सलाम को भौतिक विज्ञान में उनके योगदान के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था।
पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय पर हो रहे जुल्म का अंदाज इस बात से लगता है कि अगर कोई अहमदिया ‘वालेकुम अस्सलाम’ कहता है तो उसे जेल में डाल दिया जाता है, जबकि भारत में तो गैर-मुस्लिम भी सलाम कर लेते हैं। जुल्म की इंतिहा होने पर काफी अहमदिया पाकिस्तान से पलायन कर नॉर्थ इंग्लैंड में बस गए हैं। यहां सबसे ज्यादा अहमदी हैं। मौजूदा दौर में 206 देशों में कई करोड़ अहमदी बताए जाते हैं। सबसे ज्यादा तादाद पाकिस्तान में है। वहीं भारत में करीब 10,00,000 अहमदिया रहते हैं। नाइजीरिया में 25,00,000 से ज्यादा हैं तो इंडोनेशिया में करीब 4,00000। इन अहमदियाओं के साथ हो रहे जुल्मों को हर देश देख रहा है, पर कोई उनके पक्ष में खुलकर नहीं आ रहा है, इन मजहबी अल्पसंख्यकों को यह बात चुभती है।