सार्थक बहस से कतराता मीडिया
स्रोत:    दिनांक 17-जनवरी-2019
 
राष्ट्रीय एकता और अखंडता के सवाल पर सभी मीडिया समूह अमूमन एक स्वर में बोलते रहे हैं। ऐसा वे अब भी करते हैं, लेकिन इस प्रतिबद्धता में काफी हद तक कमी महसूूस की जा रही है। बीते सप्ताह दो ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्हें लेकर मीडिया से एक सार्थक बहस की उम्मीद थी, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। असम के वित्त मंत्री हेमंत बिस्व शर्मा ने कहा कि 'नागरिकता संशोधन विधेयक को अगर अनुमति नहीं मिलती तो असम जिन्ना के हाथ में चला जाता'। लेकिन कई चैनलों और अखबारों ने इसे 'विवादित' बयान बताया। मानो भारत का बंटवारा करवाने वाले जिन्ना की विचारधारा वालों से अपने देश के बचाव की बात करना गलत है। देश की एकता और अखंडता की शपथ लेने वाला एक जिम्मेदार मंत्री अगर यह बात कहता है तो उसके निहितार्थ समझने और विश्लेषण करने के बजाय उसे विवादित बताकर खारिज करने की यह प्रवृत्ति मीडिया में कैसे आई, यह शोध का विषय है।
दूसरा प्रकरण राजस्थान के पूर्व गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया के वक्तव्य से जुड़ा है। उदयपुर में एक कार्यक्रम में उन्होंने पुराने जयपुर के एक इलाके की हालत के बारे में बताया कि कैसे वहां पर मुस्लिम जनसंख्या का ऐसा विस्फोट हुआ है कि हिंदुओं को घर-बार छोड़कर जाना पड़ा है। वे मंदिरों में पूजा नहीं कर सकते क्योंकि वहां पर मांस और हड्डियां फेंकी जाती हैं। मीडिया के मुताबिक यह भी आपत्तिजनक बयान है। लेकिन किसी भी चैनल ने अपना संवाददाता भेजकर यह जांच कराने की जरूरत नहीं समझी कि उनका बयान सही है या गलत। अगर बयान गलत है तो जरूर इसे आपत्तिजनक कहा जा सकता है, लेकिन सही है तो मीडिया इस गंभीर मुद्दे को इस तरह से खारिज क्यों कर रहा है? केरल में हिंदुओं के दमन पर मीडिया का वामपंथी चरित्र खुलकर सामने आ गया है। अंग्रेजी चैनलों ने सत्तारूढ़ माकपा के दफ्तरों पर कथित हमलों को खूब तूल दिया लेकिन भाजपा के राज्यसभा सांसद वी. मुरलीधरन के घर पर हमला हुआ तो कहीं कोई चर्चा तक नहीं हुई। कोझीकोड में एक मस्जिद पर पथराव हुआ तो स्थानीय और राष्ट्रीय सभी चैनलों ने इसके लिए सीधे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा कार्यकर्ताओं को दोषी ठहरा दिया। फिर जैसे ही इस मामले में वामपंथी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की जानकारी आई, यह खबर सुर्खियों से गायब हो गई।
इस सबके बीच, पत्रकारीय संस्थाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले जिम्मेदार लोग ही फर्जी खबरें फैलाने में दिन-रात जुटे हुए हैं। इनमें शेखर गुप्ता का नाम सबसे आगे है जिनकी न्यूज वेबसाइट ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय की एक सामान्य जिम्मेदारी को '2019 के लिए जासूसी' बता डाला। जाहिर है यह बुरी मंशा से फैलाई गई फेक न्यूज थी। विभाग के मंत्री राज्यवर्धन राठौड़ को वीडियो संदेश जारी कर इसका खंडन करना पड़ा। भारत दौरे पर आईं नॉर्वे की प्रधानमंत्री का एनडीटीवी ने साक्षात्कार किया और दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता का प्रस्ताव किया है। नॉर्वे के राजदूत को बयान जारी करके इस झूठ का खंडन करना पड़ा। राफेल विमान सौदे पर संसद में अपने भाषण में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को दिए जा रहे ऑर्डर का जिक्र किया। उन्होंने इसके लिए 'पाइपलाइन' शब्द का प्रयोग किया। मतलब यह कि प्रक्रिया जारी है। पर टाइम्स ऑफ इंडिया ने फेक न्यूज छापकर इसे झूठ ठहरा दिया।
उधर, कांग्रेस शासित राज्यों में किसानों पर अत्याचार के समाचार लगातार आ रहे हैं। लेकिन मीडिया पूरी निष्ठा के साथ इन्हें सेंसर करने में जुटा है। मध्य प्रदेश के छतरपुर में एक किसान की थाने में बंद करके पिटाई की गई। यह छोटी सी खबर अपराध के पन्ने पर छपी। कुछ दिन पहले तक ऐसी खबरें राजनीति के पन्नों पर होती थीं। कर्नाटक में एक किसान परिवार के छह लोगों ने आत्महत्या कर ली। यह समाचार छपी तो हर जगह लेकिन ऐसे मानो किसी प्राकृतिक आपदा में उनकी मृत्यु हो गई हो।