किसका लिखा संवाद पढ़ रहे नसीरुद्दीन?
स्रोत:    दिनांक 17-जनवरी-2019
नसीरुद्दीन शाह को भारत का माहौल अचानक नफरत और घृणा से भरा दिखने लगा है। वे जिन गैर सरकारी संगठनों के लाइसेंस रद्द होने की दुहाई दे रहे हैं, उनकी वास्तविकता देश के सामने आ चुकी है। अगर उनका विवादित बयान आसन्न चुनावों के मद्देनजर है तो यकीनन उन्होंने अपना कद बहुत नीचे गिरा लिया है
नसीरुद्दीन शाह और उनकी पत्नी रत्ना पाठक वामपंथी विचारधारा से प्रभावित ‘इप्टा’ से जुड़े हुए हैं 
कहावत है-नुक्ते के हेरफेर से खुदा भी जुदा हो गया। जैसे कोई गलत नुक्ता बात का अर्थ बदल देता है, उसी तरह इनसान का व्यवहार उसकी छवि बनाता-बिगाड़ता है जिससे शाह भी स्याह दिखने लगते हैं। निर्विवाद रूप से कलात्मक चलचित्रों से लेकर मसाला फिल्मों और रंगमंच तक पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले नसीरुद्दीन शाह इस युग के महानतम कलाकारों में से एक हैं। उन्हें कई फिल्म फेयर पुरस्कारों के साथ 1987 में पद्मश्री और 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया जा चुका है, लेकिन अब वे शाह से स्याह भूमिका निभाते दिखने लगे हैं।
भारत में अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर बयान देने के बाद नसीरुद्दीन शाह ने एक बार फिर देश में नफरत और घृणा फैलने का आरोप लगाया। एमनेस्टी इंडिया ने अपने ट्वीटर हैंडल पर 2.14 मिनट का एक वीडियो डाला है, जिसमें नसीरुद्दीन शाह कहते दिख रहे हैं, ‘‘देश में अब कलाकारों को दबाया जा रहा है और पत्रकारों की आवाज को शांत किया जा रहा है। अन्याय के खिलाफ जो भी खड़ा होता है, उनके दफ्तरों में छापे मारे जाते हैं, लाइसेंस रद्द कर दिए जाते हैं। बैंक खाते फ्रीज कर दिए जाते हैं।’’ एमनेस्टी इंडिया ने इस वीडियो के साथ ट्वीट किया है, ‘‘2018 में भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व मानवाधिकारों के साथ खड़े रहने वालों का तेजी से दमन किया गया। नए साल पर, चलिए हम सब संवैधानिक मूल्यों के लिए खड़े हों और भारत सरकार को कहें कि दमन बंद हो।’’ इससेपहले नसीरुद्दीन शाह ने कहा था कि वे अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। यहां गाय की हत्या को पुलिस इंस्पेक्टर के कत्ल से बड़ा माना जा रहा है। उनके इस बयान के बाद देश में राजनीतिक मंच के साथ-साथ मीडिया व सोशल मीडिया में खूब कोहराम मचा और अवार्ड वापसी जमात वाले फिर से भवैं तरेरते नजर आने लगे। जो लोग शाह के इस दर्द को गैर राजनीतिक और स्वस्थ बहस बता रहे हैं, वे अपने मत पर पुनर्विचार करें। शाह न तो अराजनीतिक व्यक्ति हैं और न ही उनकी बहस स्वस्थ है। दरअसल, शाह एमनेस्टी इंटरनेशनल के मंच पर उनके लिखे संवाद पढ़ते नजर आए। सभी जानते हैं कि प्रवर्तन निदेशालय ने गत वर्ष 25 अक्तूबर को विदेशी वित्तपोषण की जांच के दौरान बेंगलुरु स्थित एमनेस्टी इंटरनेशनल के कार्यालय में छापा मारा और खाते सील कर दिए। निदेशालय विदेशी सहयोग (नियंत्रण) अधिनियम के तहत इस संस्था को मिले 36 करोड़ रुपये के विदेशी चंदे की जांच कर रहा है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल एक अंतरराष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्था होने का दावा करती है, जिसका उद्देश्य कथित तौर पर मानवीय मूल्यों, मानवीय स्वतंत्रता की रक्षा, भेदभाव मिटाने के लिए शोध एवं प्रतिरोध करना व मानवाधिकारों के लिए लड़ना है। इसकी स्थापना ब्रिटेन में 1961 में हुई थी। इस संस्था पर विकासशील देशों में विकसित देशों के लिए हितों के लिए काम करने और उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के आरोप भी लगते रहे हैं। आतंकवाद के मोर्चे पर लड़ते हुए भारत को कई बार इस एजेंसी के कथित पक्षपाती रवैये के चलते अंतरराष्ट्रीय समुदाय में आलोचना का सामना भी करना पड़ा।
 
दूसरी ओर, नसीरुद्दीन शाह जिन गैर सामाजिक संगठनों के लाइसेंस रद्द होने की दुहाई दे रहे हैं, उनकी वास्तविकता भी देश के सामने आ चुकी है। 27 दिसंबर, 2016 को केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि केंद्र सरकार विदेशी सहयोग (नियंत्रण) अधिनियम के उल्लंघन पर देश में चल रहे 33,000 गैर सरकारी संगठनों में से 20,000 के लाइसेंस रद्द कर चुकी है। शेष 13,000 गैर सरकारी संगठनों में से 3,000 ने लाइसेंस नवीनीकरण और 2,000 ने पंजीकरण के लिए आवेदन किए। यानी ये संगठन अभी तक बिना लाइसेंस व मंजूरी के चल रहे थे। इन संगठनों पर विदेशी ताकतें कितनी मेहरबान रहीं इसका अनुमान इस आंकड़े से लगाया जा सकता है कि केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरेन रिजिजू ने 20 दिसंबर, 2017 को राज्यसभा में बताया कि इन संगठनों को 2015-16 में 17,773 करोड़ और अगले वित्त वर्ष में 6,499 करोड़ रुपये मिले। यह वह राशि है जो एक प्रामाणिक प्रक्रिया के तहत इन संगठनों को मिली। इन्हें अवैध तरीके से मिले धन के बारे अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है। 
हालांकि सभी गैर सरकारी संगठनों को गलत नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन इसमें भी शक नहीं कि अधिकतर की गतिविधियां संदिग्ध रही हैं। इसका जीवंत उदाहरण 24 फरवरी, 2012 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का बयान है, जिसमें उन्होंने कहा था कि तमिलनाडु के कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के खिलाफ चल रहे गैर सरकारी संगठनों के आंदोलन के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है। ऐसी स्थिति में नसीरुद्दीन शाह इस तरह की संदिग्ध एजेंसी और गैर सरकारी संगठनों की वकालत करते हैं तो इसे अवश्य ही उनके चरित्र का स्याह पक्ष कहा जाना चाहिए।
यह बात अलग है कि नसीरुद्दीन शाह किसी राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा नहीं लेते, लेकिन वे पूरी तरह गैर राजनीतिक हैं, यह कहना अर्धसत्य होगा। शाह वामपंथी विचारधारा से प्रभावित भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से जुड़े हैं। बीबीसी लंदन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, उनकी पत्नी रत्ना पाठक शाह इप्टा के संस्थापकों में एक दीना पाठक की बेटी हैं। दीना पाठक हिंदी फिल्मों की उम्दा कलाकार रही हैं। फिल्मों में संघर्ष के शुरुआती दिनों में शाह इप्टा से जुड़े। 1975 में इप्टा के नाटक ‘संभोग से संन्यास’ तक में शाह और रत्ना पाठक ने अभिनय किया। इप्टा शुरू से ही वामपंथी विचारधारा से प्रभावित है और उसके लिए एक मंच के रूप में काम करती रही है। इप्टा की स्थापना उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद और फासीवाद के विरोध में 25 मई, 1943 को की गई।
‘इप्टा’ का नामकरण सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा ने किया था। ऐसे कलाकार जो सामाजिक सरोकारों से जुड़े हुए थे और कला के विविध रूपों यथा संगीत, नृत्य, फिल्म व रंगकर्म आदि को वृहद् मानव कल्याण के परिप्रेक्ष्य में देखते थे, एक-एक कर इप्टा से जुड़ते गए। इनमें बलराज साहनी, ए.के. हंगल, शबाना आजमी, संजीव कुमार, ओमपुरी, गीतकार कैफी आजमी, पृथ्वीराज कपूर सहित कई हस्तियों के नाम शामिल हैं। इसमें वामपंथी विचारधारा से जुड़े 60 लोग जिनमें इम्तियाज अली, विशाल भारद्वाज, नंदिता दास, गोविंद निहलानी, सईद मिर्जा, जोया अख्तर, कबीर खान, महेश भट्ट इत्यादि ने 2014 में लोकसभा चुनाव से पहले लोगों से नरेंद्र मोदी का विरोध करने करने की अपील की थी। इनमें से कई लोगों ने तो यह धमकी भी दी थी कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बने तो वे भारत छोड़ देंगे। 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान इन्हीं कथित बुद्धिजीवियों ने देश में असहिष्णुता की दुहाई देकर पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया, जिससे वैश्विक स्तर पर मोदी सरकार और भाजपा को असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। एक बार फिर चुनाव सामने है।
अगर शाह ने चुनावों के मद्देनजर विवादित बयान दिए हैं तो यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि उन्होंने अपना स्तर काफी नीचे गिरा लिया है। देश में अभी ऐसे हालात नहीं हैं कि किसी को भयभीत होना पड़े या ऐसा कहीं भी नहीं दिखता कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाया जा रहा है।