कट्टर मजहबी ताकतों का समूह है पीएफआई
स्रोत:    दिनांक 18-जनवरी-2019
- बिनय कुमार सिंह   
पीएफआई को केवल एक संगठन या सिमी का उत्तराधिकारी समझना बहुत बड़ी भूल होगी। वास्तव में यह एक संगठन होने के साथ—साथ कई कट्टरवादी संगठनों का पोषण भी करता है। इसके पास नए—नए रास्तों से अकूत धन आता रहता है।
 
इस्लामी गुट पीएफआई को कई संगठनों से धन उपलब्ध होता है। ऐसा माना जाता है कि पीएफआई के अखबार 'तेजस' को चलाने के लिए खाड़ी देशों से पैसा मिलता है। यह पैसा केरल के उन मुसलमान कामगारों से आता है, जो खाड़ी में काम करते हैं और पीएफआई के समर्थक हैं। उल्लेखनीय है कि खाड़ी के देशों में केरल के लाखों कामगार हैं। इनमें आधे से अधिक मुसलमान हैं। ये लोग वहां से हर वर्ष अरबों रुपए भारत भेजते हैं। कहा जाता है कि इस पैसे से ज्यादातर मुसलमान केरल में जमीन खरीदते हैं। कुछ इस्लामी संगठन भी छद्म नाम से जमीन खरीद रहे हैं। लोगों का मानना है कि यह सब पीएफआई की रणनीति के तहत हो रहा है। केरल के लोग इसे 'जमीन जिहाद' कहते हैं। इसी जिहाद का असर है कि केरल के कई जिलों में लगभग 70 प्रतिशत भूमि का स्वामित्व मुसलमानों के पास आ गया है। केरल के पूर्व पुलिस महानिदेशक डॉ. सिबी मैथ्यू ने एक बार कहा था, ''हमारे पास इन गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कोई तंत्र नहीं है। भारत को आश्चर्यजनक रूप से कब्जे में लिया जा रहा है।'' केरल के कट्टरवादियों और मजहबी संगठनों के लिए धन की एक बड़ी राशि जकात यानी दान के माध्यम से आती है। गृह मंत्रालय की एक खुफिया रपट के अनुसार, ''भारत और विदेशों में रह रहे धनी मुस्लिम व्यापारी कट्टर मजहबी गतिविधियों के लिए धन देते हैं। कट्टरवादियों और मजहबी संगठनों के वित्तपोषण की एक महत्वपूर्ण राशि समृद्ध समर्थकों से जकात संग्रह के रूप में आती है।''
यह धन हवाला के जरिए आता है। पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जी.के. पिल्लै ने केरल में कोल्लम के दौरे में कहा था, ''केरल को स्थानीय के बजाय बाहरी मजहबी कट्टरवाद के बारे में अधिक चिंता करनी चाहिए।'' यह भी कहा जाता है कि हवाला के जरिए मिली रकम को वर्ल्ड असेम्बली ऑफ मुस्लिम यूथ (डब्ल्यूएएमवाई) और मुस्लिम वर्ल्ड लीग (एमडब्ल्यूएल) के स्थानीय प्रतिनिधि मस्जिदों और स्थानीय मुस्लिम सामुदायिक संगठनों के बीच बांट लेते हैं। इन संगठनों का कहना है कि यह धन मजहबी प्रसार, राहत गतिविधियों को चलाने और शिक्षा के लिए इस्तेमाल होता है, लेकिन वास्तविकता बिल्कुल अलग है। लोगों का मानना है कि इस धन का इस्तेमाल मजहबी कट्टरता बढ़ाने और विचार परिवर्तन के लिए किया जाता है।
डब्ल्यूएएमवाई खुद को एक सामाजिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है, जो आधुनिक इस्लाम के लिए कार्यरत है। लेकिन सूत्रों के अनुसार असल में वह सऊदी अरब के शाही परिवार के साथ मिलकर काम करता है। इसी प्रकार मुस्लिम वर्ल्ड लीग, अल-हरामीयन इस्लामिक फाउंडेशन और बेनेवोलेंस इंटरनेशनल फाउंडेशन जैसी संस्थाएं भी काम कर रही हैं। भारत सरकार के साथ-साथ फिलिपींस की सेना ने भी माना है कि वर्ल्ड असेम्बली ऑफ मुस्लिम यूथ इस्लामिक आतंकवाद को धन देती है। गौर करने वाली बात यह है कि मारे गए आतंकी ओसामा बिन लादेन का भाई अब्दुल्ला बिन लादेन वर्ल्ड असेम्बली ऑफ मुस्लिम यूथ का कोषाध्यक्ष रह चुका है। सऊदी शाही परिवार की विरोधी सऊदी इन्फॉर्मेशन एजेन्सी के अनुसार वर्ल्ड असेम्बली ऑफ मुस्लिम यूथ गैर-मुस्लिमों के खिलाफ नफरत और हिंसा फैलाने वाले साहित्य का प्रकाशन करवाती है। वहीं रोमानिया के खुफिया विभाग ने भी 1996 में ही इसके आतंकी संबंधों की पुष्टि कर दी थी।
सऊदी अरब द्वारा समर्थित अनेक भारतीय मीडिया प्रकाशनों का राजस्व विदेशी धन से ही पूरा होता है। इसका एक बड़ा जरिया भारत और बांग्लादेश के बीच होने वाली गो-तस्करी भी है। गो-तस्करी का रास्ता उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों से होकर गुजरता है। पश्चिम बंगाल से जुड़े झारखंड के सीमावर्ती जिले इस अवैध व्यापार का केंद्र बन गए हैं। झारखंड में हाल के दिनों में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनमें स्थानीय जागरूक नागरिकों द्वारा हजारों गोवंश को बचाया गया है।
2006 में ही उत्तर प्रदेश पुलिस ने केंद्र सरकार को गो-तस्करी और आतंकवाद के संबंध के बारे में सचेत किया था। असल में हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी के आतंकवादी अजिजूर रहमान सरदार, जो 2005 में श्रमजीवी एक्सप्रेस और 2006 में बनारस के संकटमोचन मंदिर बम विस्फोट में शामिल था, ने गो-तस्करी से आतंकवादी गतिविधियों को धन उपलब्ध कराने की बात स्वीकार की थी। यह बात आतंकवादी दिलावर हुसैन ने भी स्वीकार की थी। जमात-उद-मुजाहिद्दीन-बांग्लादेश से दिलावर ने 2013 में बोध गया में बम धमाका किया था।
28 फरवरी, 2008 को पशु कल्याण विभाग ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को एक पत्र लिखा था, जिसमें कहा गया था, ''गो-तस्करी के पैसे को इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर बांग्लादेश को हो रही गो-तस्करी पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाए।'' इसी आधार पर केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को भी सचेत किया था। एक अनुमानित आंकड़े के अनुसार गो-तस्करी का लगभग 50,000 करोड़ रु. का अवैध धंधा है। यह अतिवादी संगठनों के लिए बड़ा ही उपयोगी साबित होता है। कोलंबो में अपने उच्चायोग के माध्यम से पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने दक्षिण भारत में एक बड़ा आतंकी संगठन स्थापित करने का प्रयास किया था। यह योजना कौंसुलर ऑफिसर अमीर जुबैर सिद्दीकी ने बनाई थी। आईएसआई ने महसूस किया था कि दक्षिण भारत उसके लिए एक संभावित केंद्र हो सकता है। इसके लिए एक विशिष्ट तस्करी मार्ग उसके संचालन में सहायक था। यह मार्ग श्रीलंका के माध्यम से तमिलनाडु और केरल को जोड़ता है। काफी लंबे समय से इस मार्ग का इस्तेमाल सभी प्रकार की आपराधिक गतिविधियों जैसे भांग, सिगरेट, सोना और अब हथियार की तस्करी के लिए किया जाता रहा है। आईएसआई ने दक्षिण भारत में आतंकवाद की जड़ें जमाने के लिए उसी मार्ग के इस्तेमाल की योजना बनाई थी। हालांकि यह योजना एक श्रीलंकाई मुस्लिम जाहिद हुसैन की गिरफ्तारी के बाद ध्वस्त हो गई, लेकिन एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि यह मामला ऐसा नहीं है कि हम चैन से सो जाएं।
कट्टरवादियों द्वारा दुनियाभर में चलाई जा रही एक बड़ी साजिश का हिस्सा है इस्लामिक बैंक। यूरोप सहित दुनिया के कई देशों ने इसे समझने में काफी देर कर दी है। पीएफआई की मुख्य मांगों में से एक है भारत में शरिया या इस्लामिक बैंक की स्थापना। इससे पहले पीएफआई द्वारा जुटाए गए इस्लामिक विद्वानों का एक दल इस्लामिक बैंक पर अपना पक्ष रखने के लिए आरबीआई के अधिकारियों से मिला था। लेकिन आरबीआई के अधिकारियों ने पहले ही सरकार को सूचित किया था कि वर्तमान बैंकिंग कानूनों और विनियमों के तहत इस्लामिक बैंक को कानूनी तौर पर लागू नहीं किया जा सकता।
इन सब तथ्यों से एक ही बात साफ होती है कि पीएफआई पैसा और पहुंच के बल पर अपने प्रभाव को बढ़ा रहा है। देशहित में इसकी जांच होनी ही चाहिए।
(लेखक पी.एफ.आई. पर शोध कर रहे हैं)