हठ व्रत से दे रहे त्याग का संदेश
स्रोत:    दिनांक 20-जनवरी-2019
तीन वर्ष से चल रहा है यह हठ व्रत , 5 वर्षों से अन्न का भी त्याग कर चुके हैं, तीन वर्षों से बांया हाथ नहीं किया नीचे, आजीवन चलेगा यह व्रत

 
संत दिवाकर भारती  हठ व्रत लिए हुए हैं
कुम्भ मेला में साधु -संतों के शिविर अब लगभग बन चुके हैं. श्री पंच दशनाम आनन्द अखाड़े में प्रवेश करते ही सभी का ध्यान संत दिवाकर भारती की तरफ बरबस ही चला जाता है. संत दिवाकर भारती ने हठ व्रत लिए हुए हैं. यह हठ व्रत आजीवन चलेगा. दिवाकर भारती जी ने अपना बायां हाथ ऊपर की ओर उठा रखा है. करीब 20 वर्ष की आयु में दिवाकर भारती जी , श्री महंत तपन भारती जी महाराज के शिष्य हुए और तभी से संन्यास ग्रहण कर लिया. विगत तीन वर्षों से सोते - जागते हर समय उनका बायां हाथ एक ही मुद्रा में स्थिर है. कभी भी उन्होंने हाथ को हिलाया तक नहीं. 5 वर्षों से अन्न का त्याग कर चुके हैं.
संत दिवाकर भारती जी का उद्देश्य सभी को सनातन धर्म से जोड़ना है. इस हठ व्रत के माध्यम से वह लोगों को सनातन धर्म का सन्देश दे रहे हैं. कई प्रकार के व्रतों में हठ व्रत कठिनतम व्रत माना जाता है. हठ व्रत में शरीर के किसी अंग को एक ही अवस्था में कई वर्षो तक स्थिर रखा जाता है. ऐसा करने से उस अंग के सभी जोड़ पूरी तरह जाम हो जाते हैं. पिछले तीन वर्षों से बाएं हाथ को ऊपर की दिशा में स्थिर करने के कारण उनका हाथ जाम हो गया है.
सके बावजूद भी वह इस व्रत को जारी रखना चाहते हैं. उनका संकल्प है कि पूरे विश्व में यह सन्देश पहुंचे कि सनातान धर्म में त्याग की भावना है. सनातन धर्म एक दूसरे को जोड़ने वाला धर्म है. सनातन धर्मावलम्बी त्याग की भावना वाला व्यक्ति होता है. संत दिवाकर भारती कहते हैं कि कुम्भ का मेला , विश्व का सबसे बड़ा मेला है. यहां पर सरकार अपनी तरफ से कई इंतजाम करती हैं मगर कुम्भ मेले में आने वाला सनातनी कुछ न कुछ दान करने के लिए आता है. स्नानार्थी तमाम प्रकार के कष्ट को झेलते हुए संगम तट पर पहुचंता है. सुविधाओं का त्याग करके स्नानार्थी कड़ाके की ठण्ड में रात भर खुले आसमान के नीचे भोर होने का इन्तजार करते हैं. जैसे ही भोर होती है संगम और गंगा जी के तट पर स्नान शुरू हो जाता है.
संत दिवाकर भारती बताते हैं कि "पूरे विश्व में सनातन धर्म के जैसा उदाहरण कहीं पर नहीं मिलता है. सनातन धर्म के लोगों में त्याग और समर्पण की भावना, पूरे विश्व के लिए एक उदारहण है. जीवन का एकमात्र लक्ष्य है, ईश्वर की प्राप्ति. सभी के अपने-अपने मार्ग हैं. मैंने हठ व्रत का मार्ग चुना है , सभी को त्याग का सन्देश देना और ईश्वर को प्राप्त करना ही मेरा उद्देश्य है. हम लोगों के धर्म में है कि त्याग करके ही ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है. बगैर कुछ त्याग किये ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती है. त्याग भी कई प्रकार का है , चाहे अहंकार को त्यागिये या फिर क्रोध को त्यागिये. शरीर भी एक माया है. जब तक यह माया रहेगी तब तक मोह रहेगा. इसलिए माया और मोह का त्याग भी जरूरी है"