पौष पूर्णिमा स्नान शुरू, कुंभ में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
स्रोत:    दिनांक 21-जनवरी-2019
संगम तट पर पौष पूर्णिमा का स्नान करने वालों की भारी भीड़ एकत्र होना शुरू हो गई है. कड़ाके की ठण्ड , श्रद्धालुओं के उत्साह के आगे बेअसर दिखाई दी. पौष पूर्णिमा के स्नान के साथ अपने कल्पवास की शुरुआत करने वाले श्रद्धालु साधारण जीवन व्यतीत करने वाले लोग हैं. पौष पूर्णिमा के स्नान के लिए कल्पवासियों के आने का सिलसिला रविवार सुबह से ही शुरू हो गया था. रात से ही संगम तट पर डटे श्रद्धालू ,ब्रह्म मुहूर्त में ही संगम के पवित्र जल में डुबकी लगा कर अपने - अपने शिविरों में लौट गए.
 
 
पूर्णिमा का स्नान आज शाम तक चलेगा. मेला क्षेत्र में अभी भी श्रद्धालुओं के आने का क्रम जारी है. सोमवार देर शाम तक मेला प्रशासन की तरफ से स्नानार्थियों का आंकड़ा जारी किया जाएगा. फिलहाल कई लाख लोगों के संगम स्नान करने का अनुमान है. कल्पवासी पौष पूर्णिमा के इस स्नान के बाद अपने -अपने शिविरों में प्रवेश कर रहे हैं. आज से ही एक माह तक चलने वाले माघ मेले में उनका कल्पवास शुरू हो रहा है. यह कल्पवास एक माह तक चल कर माघी पूर्णिमा को सम्पन्न होगा.
अखाड़ों के लिए यह तीन शाही स्नान है महत्वपूर्ण
उल्लेखनीय है कि अखाड़ों के लिए तीन शाही स्नान ही महत्वपूर्ण है जिसमें पहला शाही स्नान -मकर संक्रांति , दूसरा शाही स्नान -मौनी अमावस्या और तीसरा शाही स्नान - बसंत पंचमी है .जबकि कल्पवासी पौष पूर्णिमा के स्नान के साथ अपने कल्पवास की शुरुआत करते हैं . माघ माह में पौष पूर्णिमा , मौनी अमावस्या , बसंत पंचमी और माघी पूर्णिमा का स्नान करके वो अपने गंतव्य को लौट जाते हैं. अगर मकर संक्रांति , पौष पूर्णिमा के बाद पड़ती है तब कल्पवासी मकर संक्रांति पर स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं और अगर पौष पूर्णिमा के पहले मकर संक्रांति पड़ गयी तब कल्पवासी मकर संकांति के स्नान में नहीं आते हैं. जैसा कि इस बार हुआ है, पौष पूर्णिमा का स्नान मकर संक्रांति के बाद पड़ा इसलिए कल्पवासी मकर संक्रांति के बाद आए हैं.
 
कुम्भ और महाकुम्भ में छह वर्ष का इन्तजार करना पड़ता है जबकि कल्पवासी गंगा तट पर लगने वाले माघ मेला में प्रतिवर्ष आते हैं. दरअसल , मकर संक्रांति का स्नान सूर्य की चाल पर निर्भर करता है. जब सूर्य उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं तब मकर संक्रांति का स्नान पड़ता है. शेष सभी स्नान -पौष पूर्णिमा , मौनी अमावस्या , बसन्त पंचमी और माघी पूर्णिमा यह सब स्नान पर्व चन्द्रमा की चाल पर निर्भर करते हैं. ज्योतिष नियम के अनुसार जब सूर्य और चन्द्रमा एक ही राशि पर आ जाते हैं तब अमावस्या पड़ती है. माघ के महीने में पड़ने वाली अमवस्या को मौनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है. कुम्भ मेला के अवसर यही मौनी अमावस्या को कुम्भ दिवस कहा जाता है. मौनी अमवस्या पर करोड़ों स्नानार्थी संगम के पवित्र जल में डुबकी लगाते हैं.
पौष पूर्णिमा के स्नान के साथ माघ माह की शुरुआत हो रही है. पौष पूर्णिमा के स्नान के ठीक एक दिन पहले ही कल्पवासियों का मेला क्षेत्र में आने का सिलसिला शुरू हो गया है.
 
कल्पवासी करते हैं शजिया दान
आम तौर पर कल्पवास 12 वर्ष के संकल्प के साथ शुरू किया जाता है. कल्पवासी अपने कल्पवास की शुरुआत किसी महाकुम्भ से ही करते हैं. 12 वर्ष पूरा होने पर अपने तीर्थ पुरोहित को शजिया दान करके अपने कल्पवास की समाप्ति कर देते हैं. शजिया दान में गृहस्थ जीवन का सारा सामान अपने तीर्थ पुरोहित को देकर तब अपने गंतव्य स्थान के लिए रवाना होते हैं.