इसलिए नहीं हैक हो सकती ईवीएम मशीन !
स्रोत:    दिनांक 22-जनवरी-2019
अमेरिकी साइबर एक्सपर्ट सैयद शुजा ने सोमवार को लंदन में वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को लेकर दावा किया कि उसने 2014 लोकसभा चुनाव में ईवीएम को हैक किया गया था। इस कारण भाजपा की जीत हुई। शुजा के दावे पर दूसरी ओर भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने कहा है कि वो जिन ईवीएम का इस्तेमाल करता है, वो पूरी तरह सुरक्षित हैं। आयोग का कहना है कि इस मामले में क्या कानूनी कार्रवाई की जा सकती है इस वह विचार कर रहा है।
उल्लेखनीय है कि 19 जनवरी को पश्चिम बंगाल में हुई ममता बनर्जी की रैली में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला ने ईवीएम को चोर मशीन बताया था। इस बीच हैकर के दावे से आम मतदाताओं के मन में भी सवाल उठ रहा है कि क्या चुनाव आयोग की ईवीएम को हैक किया जा सकता है ? लगातार बढ़ता बनाती भाजपा को घेरने के लिए तमाम विपक्षी दल भी चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं। आइए जानते हैं कि क्यों ईवीएम मशीन हैक नहीं हो सकती।
ईवीएम की विशेषताएं
चुनाव आयोग के अनुसार ईवीएम कंप्‍यूटर नियंत्रित नहीं है, वो अपने आप में स्वतंत्र मशीन हैं. वो इंटरनेट या किसी अन्य नेटवर्क के साथ किसी भी समय जुड़ी नहीं होती हैं। इसलिए रिमोट या अन्य किसी डिवाइस के जरिए उन्हें हैक करने की कोई गुंजाइश नहीं है।
आयोग का कहना है कि ईवीएम में वायरलैस या किसी बाहरी हार्डवेयर पोर्ट के लिए कोई फ्रीक्वेंसी रिसीवर नहीं है, इसलिए हार्डवेयर पोर्ट, वायरलेस, वाईफाई या ब्लूटूथ डिवाइस के जरिए किसी प्रकार की टेम्परिंग या छेड़छाड़ संभव नहीं है।
कंट्रोल यूनिट (सीयू) और बैलेट यूनिट (बीयू) से केवल एन्क्रिप्टेड या डाइनामिकली कोडिड डेटा ही स्वीकार किया जाता है। सीयू द्वारा किसी अन्य प्रकार का डेटा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
आयोग के अनुसार जिन ईवीएम मशीनों का प्रयोग किया जाता है वह स्वदेशी तरीके से बनाई गई हैं। पब्‍लिक सेक्‍टर की दो कंपनियां भारत इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स लिमिटेड, बंगलुरु एवं इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद में ये मशीनें बनाती हैं।
ईवीएम मशीनों के सॉफ्टवेयर प्रोग्राम कोड ये दोनों कंपनियां आं‍तरिक तरीके से तैयार करती हैं।
उन्‍हें आउटसोर्स नहीं किया जाता। प्रोग्राम को मशीन कोड में कन्‍वर्ट किया जाता है। इसके बाद ही विदेशों के चिप मैन्‍युफैक्‍चरर को दिए जाते हैं। क्‍योंकि हमारे पास देश के भीतर सेमीकंडक्‍टर माइक्रोचिप निर्माण करने की क्षमता नहीं है।
 
हर माइक्रोचिप के पास मेमोरी में एक पहचान संख्‍या होती है। उन पर निर्माण करने वालों के डिजिटल हस्‍ताक्षर होते हैं। माइक्रोचिप को हटाने की किसी भी कोशिश का पता लगाया जा सकता है। साथ ही ईवीएम को निष्‍क्रिय बनाया जा सकता है। कुछ इंजीनियर ही इसका स्रोत कोड जानते हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठा रहा है कि क्या ईवीएम का निर्माण करने वाले इसमें कोई हेराफेरी कर सकते हैं? इस सवाल पर आयोग का कहना है कि ऐसा संभव नहीं है. सॉफ्टवेयर की सुरक्षा के बारे में निर्माण के स्तर पर कड़े सुरक्षा प्रोटोकोल हैं। आयोग का कहना है कि ईवीएम के निर्माण के बाद उसे पहले राज्य और उस राज्य के किसी जिले में भेजा जाता है। इसके बाद वहां से फिर दूसरे जिले में भेजा जाता है। ईवीएम बनाने वालों को यह नहीं पता होता कि वह यह पता कर सकें कि कौन सा उम्मीदवार किसी निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ेगा और बैलेट यूनिट में उम्मीदवारों की क्रम संख्या क्या होगी।
हर ईवीएम का होता है सीरियल नंबर
चुनाव आयोग का कहना है कि हर ईवीएम का एक सीरियल नंबर होता है। निर्वाचन आयोग ईवीएम-ट्रेकिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके अपने डेटा बेस से यह पता लगा सकता है कि कौन सी मशीन कहां पर है, इसलिए ईवीएम में किसी तरह की गड़बड़ नहीं हो सकती।
वीवीपैट
ईवीएम की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आयोग वीवीपैट (वोटर वेरीफ़ाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल यानी वीवीपैट) मशीन की मदद ले रहा है। उल्लेखनीय है कि ईवीएम पर सवाल उठाए जाने के बाद ही वीवीपैट का इस्तेमाल किया गया। इस मशीन को ईवीएम मशीन के साथ जोड़ा जाता है। जैसे ही वोट दी जाती है तत्काल एक कागज की पर्ची बाहर निकलती है जिस पर इस बारे में छपा होता है कि किसी उम्मीदवार को वोट दी गई है। साथ में उसका चुनाव चिह्न भी छपा होता है। यह व्यवस्था इसलिए है कि किसी तरह का विवाद होने पर ईवीएम में पड़े वोट के साथ पर्ची का मिलान किया जा सके.