प्रियंका से कितनी बदल पाएगी राजनीति !
   दिनांक 24-जनवरी-2019
अंग्रेजी में जिसे इंटेलिजेंसिया कहते हैं, वह भारतीय मनीषा भी अजीब है। वह परिवारवाद को राजनीतिक तंत्र के लिए अच्छा नहीं मानती, लेकिन जैसे ही कथित सांप्रदायिकता के विरोध का मसला उसके सामने आता है, वह परिवारवाद, एकाधिकारवाद, लूट तंत्र और भ्रष्टाचार को किनारे रख देती है।
बात जब गांधी-नेहरू खानदान की हो तो उसमें भारतीय मनीषा और मीडिया तंत्र को न तो परिवारवाद नज़र आता है, न ही एकाधिकारवाद। इस परिवारवाद और एकाधिकारवाद में ही वह लोकतंत्र की गहरी जड़ें खोजने लगता है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा अपनी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस का महासचिव बनाने और उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार देने की व्याख्या भी इसी अंदाज में की जा रही है। मीडिया और इंटेलिजेंसिया का एक वर्ग इसे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का आम चुनावों से पहले बड़ा मास्टर स्ट्रोक मान रहा था। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जीत के बाद लगता है कि कांग्रेस अध्यक्ष अपने इस दांव के जरिए भारतीय जनता पार्टी को नेस्तनाबूद कर देंगे।
जरूरी नहीं कि कांग्रेस का यह दांव सफल ही हो जाए। राजनीतिक विश्लेषकों का दल राजनीतिक तंत्र की व्याख्याएं हर नई घटना के संदर्भ में उसी की दिशा में करने लगता है। इस लिहाज से देखें तो नरेंद्र मोदी के भारी उभार के बाद बिहार और दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की हार ही नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भारतीय जनता पार्टी का विजय रथ बिहार और दिल्ली में रूका। अगर बिहार और दिल्ली की घटनाओं को ही बड़ा संदर्भ माना जाता तो फिर बाद के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की लगातार हार होती रहती। लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ और राज्य दर राज्य भारतीय जनता पार्टी का विजय रथ आगे बढ़ता रहा। इसलिए राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की हार के संदर्भ में यह मान लेना कि प्रियंका गांधी वाड्रा की औपचारिक राजनीतिक शुरूआत के बाद कांग्रेस का विजय रथ दौड़ पड़ेगा, थोड़ी जल्दबाजी होगी। 
 
प्रियंका गांधी को भले ही पूर्वी उत्तर प्रदेश का औपचारिक प्रभार अभी दिया गया हो, लेकिन इस हकीकत से शायद ही कोई मुंह मोड़ेगा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में 2004 के आम चुनावों से ही प्रियंका की दखल बनी हुई है। अपने भाई की सीट अमेठी और मां सोनिया गांधी के चुनाव क्षेत्र रायबरेली का प्रबंधन वही करती रही हैं। इन दोनों सीटों की नजदीकी दो और सीटों सुल्तानपुर और प्रतापगढ़ में भी उनका असर होता रहा है। लेकिन 2004 और 2009 के आम चुनावों को छोड़ दें तो प्रियंका का रायबरेली और अमेठी के अलावा कहीं चुनावी नतीजों में कहीं असर नजर नहीं आया। और तो और 2012 और 2017 के विधानसभा चुनावों में प्रियंका गांधी के तमाम कौशल के बावजूद अमेठी और रायबरेली जिले की दस सीटों में से सिर्फ दो ही पर कांग्रेस को जीत हासिल हुई थी। इनमें से एक सीट रायबरेली सदर रही, जहां से अदिति सिंह जीतीं तो दूसरी हरचंदपुर की सीट पर कांग्रेस को जीत हासिल हुई। कभी इंदिरा गांधी के नजदीकी रहे गुजराती मिड डे के पूर्व दिल्ली ब्यूरो प्रमख विजय संघवी कहते हैं कि जब इंदिरा गांधी के परिवार की साख गिर रही हो तो चमत्कार की उम्मीद बेमानी ही है। उनका कहना है कि प्रियंका गांधी वाड्रा के जरिए कांग्रेस के लिए चमत्कारी बदलाव की उम्मीदें जो भारतीय अभिजात्य वर्ग कर रहा है, लगता है कि वह वंशवाद से प्रभावित है। संघवी का कहना है कि पिछले दो विधानसभा चुनावों और लोकसभा के तीन चुनावों में लगातार प्रियंका प्रचार करती रहीं। पिछले विधानसभा चुनाव में रायबरेली और अमेठी में उन्होंने लगातार पांच हफ्ते तक प्रचार किया, लेकिन सिर्फ दो ही सीटें कांग्रेस को जीता सकीं। वैसे भी रायबरेली सदर की सीट जिन अदिति सिंह ने कांग्रेस के प्रतीक पर जीता, विलायत से पढ़ाई करने के चलते उनकी भी अपनी पहचान रही।
 
वैसे राजनीति में उम्मीद बेमानी नहीं है। लेकिन कामयाबी को ही आखिरी मान लेना भी अतिवाद है। प्रियंका गांधी वाड्रा के व्यक्तित्व को बहुत चमत्कारी बताया जा रहा है, लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि चमत्कारी तो इंदिरा गांधी भी थीं। राजीव गांधी का भी सम्मोहक व्यक्तित्व था। फिर भी 1977 में इंदिरा गांधी की और 1989 में राजीव गांधी की करारी हार हुई। 1999 में तो माहौल पूरी तरह कांग्रेस के पक्ष में नजर आ रहा था। एक वोट से विश्वास मत में पराजित हो चुकी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के बाद सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनने को तैयार थीं। सीपीएम के तत्कालीन महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत उनकी ताजपोशी के लिए लगातार प्रयासरत थे। लेकिन मुलायम सिंह ने लंगड़ी मार दी। ऐसे में अव्वल तो होना यह चाहिए था कि 1999 के आम चुनावों में कांग्रेस को जीत मिलती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसलिए यह मान लेना कि प्रियंका गांधी वाड्रा के आते ही जमीनी स्तर पर माहौल बदल जाएगा, सही नहीं माना जा सकता।
बहरहाल अब यह भी बहस चलेगी कि राहुल नहीं चल पाए तो उन्होंने बहन का साथ लिया है। भारतीय जनता पार्टी इस बहस को खड़ा करने की कोशिश करने भी लगी है। वैसे प्रियंका गांधी को राजनीति में लाने की कोशिश तो 1999 से ही हो रही है, जब वे महज 27 साल की थीं। तब माना जाता था कि राहुल की तुलना में वे कहीं ज्यादा परिपक्व और राजनीतिक चेतना से लैस हैं। लेकिन उनकी मां ने 2004 के लोकसभा चुनावों में राहुल को ही उतारा। माना जाता है कि ऐसा करके उन्होंने कांग्रेस के केंद्र में राहुल को स्थापित किया। हो सकता है कि उन दिनों राजनीति में प्रियंका उतरतीं, तो शायद अपने व्यक्तित्व के दम पर बदलाव ला देतीं। लेकिन तब से लेकर गंगा और यमुना में काफी पानी बह गया है। उस दौर में प्रियंका को चाहने वाली पीढ़ी भी अब प्रौढ़ावस्था की ओर बढ़ रही है और उसकी सोच एवं प्राथमिकता बदल रही है। इसलिए इस बात की गारंटी नहीं दी जा सकती कि प्रियंका को नई पीढ़ी भी एकदम से स्वीकार ही कर लेगी। प्रियंका पहले अनौपचारिक रूप से राजनीति में थीं, अब वे औपचारिक रूप से राजनीति में आ रही हैं। वे राजनीति में कितनी कामयाब होती हैं, कांग्रेस की गिरती साख को किस कदर बचा पाती हैं, यह देखने के लिए हमें अभी इंतजार करना होगा।