नेहरू नहीं चाहते थे डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति बनें !
   दिनांक 24-जनवरी-2019
आज 24 जनवरी है। भारत के इतिहास में आज का दिन बेहद खास है। आज ही के दिन संविधान सभा ने स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का चुनाव किया था और वह भारत के पहले राष्ट्रपति बने थे।
डा.राजेन्द्र प्रसाद से पंडित नेहरू हमेशा अपने को असुरक्षित महसूस करते रहे। उन्होंने राजेन्द्र बाबू को नीचा दिखाने का कोई अवसर भी हाथ से जाने नहीं दिया। जवाहर लाल नेहरू चाहते ही नहीं थे कि डा. राजेंद्र प्रसाद देश के राष्ट्रपति बनें। उन्हें राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए उन्होंने ‘‘झूठ’’ तक का सहारा लिया था। नेहरू ने 10 सितंबर, 1949 को डा. राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर कहा कि उन्होंने (नेहरू) और सरदार पटेल ने फैसला किया है कि सी.राजगोपालाचारी को भारत का पहला राष्ट्रपति बनाना सबसे बेहतर होगा।
नेहरू जी ने जिस तरह से यह पत्र लिखा था, उससे डॉ.राजेंद्र प्रसाद को घोर कष्ट हुआ और उन्होंने पत्र की एक प्रति सरदार पटेल को भिजवाई। पटेल उस वक्त बम्बई में थे। कहते हैं कि सरदार पटेल उस पत्र को पढ़ कर सन्न थे, क्योंकि, उनकी इस बारे में नेहरू जी से उनकी कोई चर्चा नहीं हुई थी कि राजाजी (राजगोपालाचारी) या डॉ. राजेंद्र प्रसाद में से किसे राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए, न ही उन्होंने नेहरू जी के साथ मिलकर यह तय किया था कि सी.राजगोपालाचारी राष्ट्रपति पद के लिए उनकी पसंद के उम्मीदवार होंगे। यह बात उन्होंने राजेन्द्र बाबू को बताई। इसके बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 11 सितंबर,1949 को नेहरू को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ‘‘पार्टी में उनकी (डॉ0 राजेन्द प्रसाद की) जो स्थिति रही है, उसे देखते हुए वह बेहतर व्यवहार के पात्र हैं। नेहरू जी को जब यह पत्र मिला तो उन्हें लगा कि उनका झूठ पकड़ा गया। अपनी फजीहत कराने के बदले उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करने का निर्णय लिया। नेहरू यह भी नहीं चाहते थे कि हालात उनके नियंत्रण से बाहर हों और इसलिए ऐसा बताते हैं कि उन्होंने इस संबंध में रातभर जाग कर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को जवाब लिखा।
पंडित नेहरू के विरोध के बाद भी दो कार्यकाल तक रहे राष्ट्रपति
राजेन्द्र बाबू, पंडित नेहरू के विरोध के बावजूद दो कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति चुने गए थे। बेशक, नेहरू सी राजगोपालाचारी जी को देश का पहला राष्ट्रपति बनाना चाहते थे, लेकिन सरदार पटेल और कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ नेताओं की राय डा. राजेंद्र प्रसाद के हक में थी। आखिर नेहरू जी को कांग्रेस नेताओं सर्वानुमति की बात माननी ही पड़ी और राष्ट्रपति के तौर पर डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को ही अपना समर्थन देना पड़ा। जवाहर लाल नेहरू और डॉ. राजेंद्र प्रसाद में वैचारिक और व्यावहारिक मतभेद बराबर बने रहे थे। ये मतभेद शुरू से ही थे, लेकिन 1950 से 1962 तक राजेन्द्र बाबू के राष्ट्रपति रहने के दौरान ज्यादा मुखर और सार्वजनिक हो गए।
 
दोनों की सोच और विचारों में था अंतर
नेहरू पश्चिमी सभ्यता के कायल थे जबकि राजेंद्र प्रसाद भारतीय सभ्यता देश के एकता का मूल तत्व मानते थे। राजेन्द्र बाबू को देश के गांवों में जाना पसंद था, वहीं नेहरू लन्दन और पेरिस में चले जाते थे। पेरिस के धुले कपड़े तक पहनते थे। सरदार पटेल भी भारतीय सभ्यता के पूर्णतया पक्षधर थे। इसी कारण सरदार पटेल और डा. राजेंद्र प्रसाद में खासी घनिष्ठता थी। सोमनाथ मंदिर मुद्दे पर डा. राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल ने एक जुट होकर कहा की यह भारतीय अस्मिता का केंद्र है इसका निर्माण होना ही चाहिए।
लंबे समय तक देश के राष्ट्रपति रहने के बाद भी राजेन्द्र बाबू ने कभी भी अपने किसी परिवार के सदस्य को न पोषित किया और न लाभान्वित किया। हालांकि नेहरू इसके ठीक विपरीत थे। उन्होंने अपनी पुत्री इंदिरा गांधी और बहन विजयालक्ष्मी पंडित को सत्ता की रेवड़ि़यां खुलकर बांटीं। सारे दूर-दराज के रिश्तेदारों को राजदूत, गवर्नर, जज बनाया।
एक बार जब डा. राजेंद्र प्रसाद ने बनारस यात्रा के दौरान खुले आम काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारियों के पैर छू लिए तो नेहरू नाराज हो गए और सार्वजनिक रूप से इसके लिए विरोध जताया, और कहा की भारत के राष्ट्रपति को ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए। हालांकि डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने नेहरू की आपत्ति पर प्रतिक्रिया देना भी उचित नहीं समझा।
चीन और तिब्बत नीति पर भी नेहरू से असहमत थे
राजेन्द्र प्रसाद नेहरू की तिब्बत नीति और हिन्दी-चीनी भाई-भाई की नीति से असहमत थे। नेहरू की चीन नीति के कारण भारत 1962 की जंग में करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। इसी प्रकार राजेन्द्र बाबू और नेहरू में राज्यभाषा हिन्दी को लेकर भी मतभेद था। मुख्यमंत्रियों की सभा (1961) को राष्ट्रपति ने लिखित सुझाव भेजा कि अगर भारत की सभी भाषाएं देवनागरी लिपि अपना लें, जैसे यूरोप की सभी भाषाएं रोमन लिपि में लिखी जाती हैं, तो भारत की राष्ट्रीयता मजबूत होगी। सभी मुख्यमंत्रियों ने इसे एकमत से स्वीकार कर लिया, किन्तु केंद्र सरकार ने इसे नहीं माना ।
नेहरू नहीं चाहते थे सोमनाथ जाएं राजेंद्र प्रसाद
जब दोबारा सोमनाथ मंदिर का निर्माण हो पूरा हाे गया तो नेहरू की कैबिनेट में मंत्री रहे के एम मुंशी ने मंदिर के उद्घाटन के लिए देश के पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद को न्यौता दे दिया उन्होंने इस न्यौते को बड़े गर्व से स्वीकार किया लेकिन जब जवाहर लाल नेहरू को इसका पता चला तो वह नाराज हो गए। नेहरू जी ने राजेंद्र प्रसाद से सोमनाथ मंदिर का 1951 में उद्घाटन न करने का आग्रह किया था। उनका तर्क था कि राष्ट्र के प्रमुख को मंदिर के उदघाटन से बचना चाहिए। नेहरू के आग्रह को न मानते हुए राजेंद्र बाबू सोमनाथ गए और जबरदस्त भाषण दिया।
 
नहीं पहुंचे तो उनके अंतिम संस्कार में
डॉ. राजेंद्र प्रसाद के सोमनाथ मंदिर जाने की वजह नेहरू उनसे इतना चिढ़ने लगे कि जब 12 वर्षों तक रा्ष्ट्रपति रहने के बाद राजेन्द्र बाबू देश के राष्ट्रपति पद से मुक्त हुए तो उन्हें दिल्ली में घर तक नहीं दिया गया। एक पूर्व राष्ट्रपति को सम्मान मिलना चाहिए, उनका जो अधिकार था उससे उन्हें वंचित कर दिया गया। उन्हें पटना लौटना पड़ा। पटना में भी उनके पास अपना मकान नहीं था। वह पटना के सदाकत आश्रम के एक सीलन भरे कमरे में रहने लगे। इस बीच में उन्हें दम की बीमारी ने जकड़ लिया, लेकिन नेहरू जी और उनके करीबियों ने कभी उनकी सुध लेने की कोशिश नहीं की। उसी कमरे में रहते हुए राजेन्द्र बाबू की 28 फरवरी,1963 को मौत हो गई.
अंत्येष्टि में नेहरू शामिल नहीं हुए
नेहरू जी उनकी अंत्येष्टि तक में शामिल तक नहीं हुए। जिस दिन उनकी आखिरी यात्रा थी उस दिन नेहरू जयपुर चले गए। राजस्थान के राज्यपाल डाॅ. संपूर्णानंद पटना जाना चाह रहे थे लेकिन जब नेहरू जी को मालूम चला कि संपूर्णानंद जी पटना जाना चाहते हैं तो उन्होंने संपूर्णानंद जी से कहा कि यह कैसे मुमकिन है कि देश का प्रधानमंत्री किसी राज्य में आए और उसका राज्यपाल वहां से गायब हो। इस पर डॉ. संपूर्णानंद ने अपना पटना जाने का कार्यक्रम रद्द किया. इस सनसनीखेज तथ्य का खुलासा खुद डा.संपूर्णानंद ने स्वयं किया था।
उनके मन में हमेशा यह मलाल रहा कि वह राजेन्द्र बाबू के अंतिम दर्शन नहीं कर सके। वह राजेन्द्र बाबू का बहुत सम्मान करते थे। डॉक्टर सम्पूर्णानंद ने राजेन्द बाबू के सहयोगी प्रमोद पारिजात शास्त्री को लिखे गए पत्र में अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए लिखा था कि ‘‘घोर आश्चर्य हुआ कि बिहार के जो प्रमुख लोग दिल्ली में थे उनमें से भी कोई पटना नहीं गया, (किसके डर से?) सब लोगों को इतना कौन सा आवश्यक काम अचानक पड़ गया, यह समझ में नहीं आया, यह अच्छी बात नहीं हुई। यह बिलकुल ठीक है कि उनके जाने न जाने से उस महापुरुष का कुछ भी बनता बिगड़ता नहीं। परन्तु, ये लोग तो निश्चय ही अपने कर्तव्य से विमुख रहे।