धर्म के रक्षक हैं अखाड़े
   दिनांक 29-जनवरी-2019
संन्यासियों का अखाड़ा यानी- जहां एक हाथ में दीपक है और दूसरे हाथ में तलवार। प्रयाग कुंभ में अखाड़ों की उसी समृद्ध परंपरा के साक्षात् दर्शन हो रहे हैं। ये अखाड़े सनातन धर्म की विजय पताका के वाहक हैं। आदि शंकराचार्य द्वारा आरम्भ हुई अखाड़ा परंपरा हिन्दू धर्म के आध्यात्मिक शौर्य का प्रतीक है |
आद्य शंकराचार्य ने धर्म की रक्षा के लिए अखाड़ों की स्थापना की थी। उन्होंने सबसे पहले आवाहन अखाड़ा था। इस अखाड़े से विस्तार होते-होते शैव सम्प्रदाय के कुल सात अखाड़े बने। भगवान् शिव की पूजा करने वाले अखाड़ों को शैव अखाड़ा कहा जाने लगा। सनातन धर्म की रक्षा के लिए आद्य शंकराचार्य ने संपूर्ण भारत का भ्रमण किया था और विभिन्न प्रकार के मठों, जो अलग-अलग मतों को मानने वाले थे, को अपनी विचारधारा से प्रभावित करके अपने साथ जोड़ा। इन्हें अखाड़े का स्वरूप इसलिए देना पड़ा क्योंकि तब विधर्मी बहुत ज्यादा सक्रिय थे। उस समय तक कोई आक्रान्ता भारत पर हमला करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। लेकिन राजाओं में आपसी फूट से शक्ति का संतुलन गड़बड़ा गया। तब आद्य शंकराचार्य ने आवाहन अखाड़ा खड़ा किया। अखाड़ा का अर्थ है- जहां एक हाथ में दीपक है और दूसरे हाथ में तलवार। ज्ञान के प्रकाश में तलवार का प्रयोग करते हुए धर्म की रक्षा का कार्य शुरू हुआ। उधर जगद्गुरु रामानंदाचार्य ने राम और कृष्ण की भक्ति का प्रचार किया। उन्होंने गांव-गांव भ्रमण करके सभी को जोड़ा। जातिगत भेदभाव से सनातन धर्म को नुकसान हो रहा था। जिन लोगों को जाति के कारण उचित सम्मान नहीं मिल पा रहा था, उन्हें प्रलोभन देकर कन्वर्ट कराया जा रहा था। ऐसे में जगद्गुरु रामानंदाचार्य ने कहा -जो हरि को भजे, सो हरि का होई। उन्होंने सभी जाति के लोगों को उन्होंने एक साथ जोड़ा। उसी दौर में भगवान विष्णु की पूजा करने वाले वैष्णव अखाड़े अस्तित्व में आए। इन अखाड़ों को बैरागी अखाड़ा भी कहा जाता है। स्वामी श्री बालानंदाचार्य ने तीन बैरागी अखाड़ों की स्थापना की। इसी प्रकार उदासीन परम्परा के दो अखाड़े और सिख परम्परा के एक अखाड़े की स्थापना हुई। वैसे तो अनी अखाड़ों में उनके अपने अखाड़ों की संख्या और अधिक है मगर अखाड़ा परिषद और मेला प्रशासन इन तेरह अखाड़ों को ही मान्यता देता है।
 
संगम की रेती पर गृहस्थों और अखाड़ों के संतों का संगम सदियों से होता आया है। अखाड़ों के संत कथावाचक नहीं होते। सनातन धर्म की रक्षा करने के लिए राजा नागा संन्यासियों की मदद लेते थे, उसके बाद उन्हें कुछ गांवों की जागीर देते थे। ऐसे ही गांवों में धूनी रमा कर रहने वाले साधु-संतों का दर्शन संगम की रेती पर आमजन को प्राप्त हो रहा है। औरंगजेब ने कुम्भ में शाही स्नान की परम्परा पर रोक लगा दी थी। उस समय महानिर्वाणी अखाड़े के राजेन्द्र्र पुरी जी महाराज ने 23,000 नागाओं के साथ कुम्भ क्षेत्र में डेरा डाला। औरंगजेब को यह सन्देश भिजवाया कि वह कुम्भ मेला क्षेत्र में केवल निवास करेंगे, शाही स्नान नहीं करेंगे। जैसे ही स्नान पर्व आया, राजेन्द्र पुरी जी ने शाही स्नान की गोपनीय तरीके से पूरी तैयारी कर रखी थी। महानिर्वाणी अखाड़ा और अटल अखाड़ा ने अपनी धर्म ध्वजा के साथ 52 फुट ऊंची एक पर्व ध्वजा स्थापित की। धर्म ध्वजा और पर्व ध्वजा दोनों का पूजन करके दोनों अखाड़े शाही स्नान के लिए निकल गए। तभी से महानिवार्णी और अटल अखाड़े में दो ध्वजा स्थापित की जाती हैं। यही वजह है कि संख्या बल के आधार पर जूना अखाड़ा सबसे बड़ा अखाड़ा माना जाता है मगर शाही स्नान में आज भी सबसे आगे महानिर्वाणी अखाड़ा चलता है, बाकी सभी अखाड़े उसके पीछे चलते हैं।
जूना अखाड़ा
शैव अखाड़ों में श्री पंच दशनाम जूना अखाड़े को सबसे बड़ा अखाड़ा माना जाता है। इस अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी हैं। इसकी स्थापना विक्रम संवत् 1202 को उत्तराखण्ड के कर्ण प्रयाग में हुई थी। आदि शंकराचार्य ने चार दिशाओं में चार पीठों की स्थापना की थी और इन चार पीठों पर शंकराचार्य बनाये। यह अखाड़ा इन चारों पीठों— द्वारिका, पुरी, शृंगेरी और ज्योतिर्मठ-से सम्बद्ध हैं। भगवान् दत्तात्रेय जूना अखाड़े के इष्ट देव हैं। इस अखाड़े में भगवान दत्तात्रेय और उनकी 52 फुट ऊंची पवित्र धर्म ध्वजा की पूजा की जाती है। अखाड़े का प्रशासनिक निकाय श्री पंच है-जिसके सदस्य कुंभ और महाकुंभ मेले के दौरान चुने जाते हैं। इस अखाड़े में योद्धा, तपस्वियों (नागा साधुओं) की समृद्ध परंपरा है। कुंभ और महाकुंभ मेले के दौरान नए नागा संन्यासी बनाये जाते हैं। नागा संन्यासियों की संख्या हजारों में है। जूना अखाड़ा में शस्त्रधारी और शास्त्रधारी दोनों तरह के संत शामिल हैं। इस अखाड़े की विशालता इसकी सबसे खास बात मानी जाती है।
निरंजनी अखाड़ा
श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी शैव अखाड़ा है। इसका मुख्यालय प्रयागराज में है। स्वामी महंत रविंद्रपुरी इस अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर हैं। अखाड़े के सचिव श्री महंत नरेंद्र गिरी अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष हैं। अखाड़ा परिषद साधु समाज के सबसे बड़े संगठनों में से एक है। निरंजनी अखाड़े के संन्यासी भगवान कार्तिकेय (भगवान शिव और पार्वती के पुत्र) की पूजा करते हैं। माना जाता है कि निरंजनी अखाड़ा की स्थापना विक्रम संवत् 970 को मांडवी, गुजरात में हुई थी। जूना के बाद, निरंजनी को दूसरा सबसे बड़ा अखाड़ा माना जाता है। यह कुंभ और महाकुंभ मेले में अपने शिविर में 52 फुट ऊंचे पवित्र ध्वज का अभिषेक भी करता है। इस अखाड़े में शिक्षित संतों की संख्या अधिक होना यहां की खास बात है।
 
श्री शंभू पंचायती अटल अखाड़ा
अटल अखाड़े की स्थापना 703 विक्रम संवत् को गोंडवाना, गुजरात में हुई थी। अटल अखाड़े का मुख्यालय वाराणसी में है। यह अखाड़ा भी शैव अखाड़ा है। इस अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विश्वात्मानंद सरस्वती हैं। इसका संचालन 12 सदस्यीय प्रशासनिक कमेटी द्वारा किया जाता है। इस कमेटी को रमता पंच कहा जाता है। रमता पंच में श्री महंत, महंत, सचिव, कोतवाल एवं पुजारी आदि सदस्य है। अटल अखाड़ा के इष्ट देव गणेश जी हैं। अटल अखाड़े के संतों को अटल बादशाह भी कहा जाता है। कुंभ मेले में अटल अखाड़ा दूसरे शाही स्नान में नागा साधुओं का एक समन्वय समारोह भी आयोजित करता है। पर्व ध्वजा इस अखाड़े की विशेष बात है।
हर अखाड़े में धर्म ध्वजा स्थापित की जाती है मगर अटल अखाड़े में धर्म ध्वजा के साथ 52 फुट ऊंची पर्व ध्वजा स्थापित की जाती है। औरंगजेब ने जब अखाड़ों को शाही स्नान के लिये रोका था, उसके बावजूद संगम पर पर्व ध्वजा को स्थापित कर शाही स्नान हुआ था। पर्व ध्वजा उसी का प्रतीक है।
 
महानिर्वाणी अखाड़ा
श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी का मुख्यालय प्रयागराज में है। यह अखाड़ा विक्रम संवत् 805 को स्थापित हुआ था। स्वामी विशोकानंद भारती जी महाराज इस अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर। इसमें हजारों की संख्या में नागा सन्यासी हैं। भगवान् कपिल मुनि इस अखाड़े के इष्ट देव हैं। सूर्य प्रकाश भाला और भैरव प्रकाश भाला की पूजा होती है। सूर्य प्रकाश भाला की दिन के देवता के रूप में एवं भैरव प्रकाश भाला की पूजा रात के देवता के रूप में होती है।
इस अखाड़े की धार्मिक मान्यता है कि प्रकाश में ही ऊर्जा का संचार होता है। भगवान् कपिल मुनि संन्यास परम्परा के प्रथम आचार्य माने जाते हैं। श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी एक चुनाव के माध्यम से अपनी प्रशासनिक कमेटी (रमता पंच) का चुनाव करता है।
 
पंच अग्नि अखाड़ा
श्री शंभू पंच अग्नि अखाड़ा की आचार्य गद्दी अमरकंटक में है जहां नर्मदा नदी का उद्गम स्थल है। इस अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर राम कृष्णानंद जी महाराज हैं। इस अखाड़े में नागा संन्यासी नहीं होते। यह अखाड़ा ब्रह्मचारी संतों के अभिषेक के लिए जाना जाता है। इस अखाड़े में अग्निहोत्र करने वाले साधक, ब्रह्मचारी होते हैं। अधिकतर साधक संस्कृत भाषा, वेद-पुराणों के ज्ञाता होते हैं। यह अखाड़ा अन्य शैव अखाड़ों की तुलना में अपने रीति-रिवाजों और परंपराओं के लिए मशहूर है।
अखाड़े में ब्रह्मचारी युवकों को प्रवेश दिया जाता है। उसके बाद कर्मकांड सिखाया जाता है। अखाड़े के संत अग्नि यज्ञ या धूनी नहीं रमाते। इस अखाड़े की सबसे खास बात यह है कि यहां के संत किसी भी नशीले पदार्थ का सेवन नहीं करते। बल्कि स्वयं तैयार किए गए भोजन का सेवन करते हैं। इस अखाड़े की आराध्या मां गायत्री हैं और यहां पर अग्नि की पूजा की जाती है। मान्यता है कि जल भी नीचे की तरफ जाता है। अगर दबाव पड़े तो वायु भी नीचे की तरफ जाती है मगर अग्नि प्रत्येक दशा में ऊपर की तरफ जाती है।
 
आवाहन अखाड़ा
श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा का मुख्यालय हरिद्वार में हैं। इसके आचार्य महामंडलेश्वर शिवेंद्रपुरी जी महाराज हैं। इस अखाड़े के इष्ट देवता श्री दत्तात्रेय हैं और अखाड़े के कार्यालय गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार सहित पूरे देश में फैले हुए हैं। जैसा कि नाम से ही जाहिर है, इस अखाड़े की स्थापना के लिए आदि शंकराचार्य ने सभी का आवाहन किया था। शैव सम्प्रदाय के सभी अखाड़े आवाहन के विस्तार से ही बने हैं। इस अखाड़े की प्राचीनता इसकी सबसे विशेष बात है। आदि शंकराचार्य ने धर्म की रक्षा के लिए पूरे भारत में भ्रमण करके सभी मठों को अपने विचारों से सहमत किया था और तब आवाहन अखाड़े की स्थापना विक्रम संवत् 703 में की थी।
 
आनंद अखाड़ा
तपोनिधि श्री आनंद अखाड़ा पंचायती की स्थापना विदर्भ, महाराष्ट्र में विक्रम संवत् 912 में हुई थी। इसका मुख्यालय कपिल लहरा, सारनाथ (वाराणसी) में है। आनंद अखाड़ा भी शैव अखाड़ा है। इसके आचार्य महामंडलेश्वर बालकानंद गिरी जी महाराज हैं। यह अखाड़ा देश में सबसे प्राचीन अखाड़ों में से है। भुवन भास्कर सूर्यनारायण इस अखाड़े के इष्ट देव हैं। इसमें सूर्य प्रकाश भाला और चन्द्र प्रकाश भाला के प्रतीक की पूजा होती है। शस्त्र की पूजा के साथ ही शाही स्नान की शुरुआत की जाती है। देश भर में करीब 250 से अधिक जगहों पर इस अखाड़े के कार्यालय और आश्रम चल रहे हैं। अखाड़े में करीब 1000 नागा संन्यासी हैं। समाजिक कार्य इस अखाड़े का विशेष आयाम है।