हताशाओं का गठबंधन
   दिनांक 29-जनवरी-2019
 
 न नेता , न नीति : कोलकाता में आयोजित रैली में विपक्षी नेता। आपस में इनकी बनती नहीं है, पर मोदी विरोध के नाम पर एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं
सारी घटनाएं इतिहास में दर्ज नहीं होतीं। कुछ बातें समाज अपनी स्मृति में लिखता है। सामाजिक अवचेतन की ये अलिखित बातें लिखित इतिहास से ज्यादा गहरी होती हैं। ऐसी ही एक घटना—जिस समय यह देश संस्कृति की धारा में आस्था भरी डुबकियां लगा रहा था (और राज्य सरकार द्वारा की गई व्यवस्थाओं की प्रशंसा कर रहा था), विश्व विस्फारित-मंत्रमुग्ध भाव से उस ‘संस्कृति कुंभ’ को ताक रहा था (और केंद्र सरकार ने प्रवासी भारतीय दिवस के तार इससे जोड़ दिए थे) उस समय विकल्प की धारा होने का दम भरने वाली राजनीति कहां थी! समाज कहीं जुटा था और राजनीतिक हित के पतनाले एक होने के लिए कहीं और मचल रहे थे। यह सिर्फ संयोग नहीं बल्कि भारतीय राजनीति की विद्रूपताओं के उजागर होने का क्षण था।
एक और उदाहरण लें तो यह विद्रूपता एकदम बेपर्दा हो जाती है— महागठबंधन के लिए उचकते चेहरे वही थे जो चंद रोज पहले इलाहाबाद को प्रयागराज के रूप में उसकी मूल पहचान वापस दिलाने पर तमतमा गए थे। तो क्या हैरानी, इस राजनीति के लिए क्या प्रयाग और क्या गंगा! दरअसल यह विद्रूपता उन राजनैतिक विसंगतियों के संगम से पैदा हुई है जो भारतीय राजनीति में प्रगतिशील और सेकुलर होने का दम भरती हैं।
महागठबंधन के भीतर (और बाहर भी) इसका गोंद बनने को आतुर दलों और चेहरों के उलट-पलट समीकरणों पर गौर कीजिए—मजदूर और गरीब-गुरबा की बात करने वाले वामदल वही हैं जो उद्योगपतियों के पैरोकार होने के आरोप में बंगाल से निकाले गए। इनकी जगह लेने वाली और वामपंथी हिंसा का मुखर विरोध करने वाली ममता बनर्जी वही हैं जिनकी तृणमूल कांग्रेस के हाथ पंचायत चुनाव के समय रक्त में सने दिखाई दिए। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कुर्सी हथियाने और बाद में अन्ना हजारे, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, कुमार विश्वास को हाशिए पर फेंक देने वाले केजरीवाल वही हैं जिनके आंख के तारे लालू प्रसाद यादव सहित आम आदमी पार्टी के ऐसे मंत्री हैं जो भ्रष्टाचार में पूरी तरह सने दिखाई देते हैं। और, तो और, देश में लोकतंत्र की बहाली का हुंकारा भरने वाले खड़गे उसी पार्टी से हैं जहां वंशवादी राजनीति को तमगे की तरह सीने पर सजाया जाता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि विरोधाभासों में लिथड़ी इन राजनीतिक इच्छाओं की उछाल सिर्फ ‘मोदी विरोध’ पर केंद्रित है। आज के दौर का सबसे लोकप्रिय नेता इन सबकी आंखों की किरकिरी है केवल यही परम नकारात्मक बात इस पूरी राजनैतिक लामबंदी में साझा दिखती है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश के (कथित) किसानों का जमावड़ा लगाने वालों के पास किसानों के लिए कोई दृष्टिपत्र नहीं है, रोजगार सृजन के लिए कोई सोच नहीं है, घपले करने की उत्कट चाह से इतर कोई आर्थिक एजेंडा नहीं है. क्या यह अनायास है! नहीं, ये दल जैसे हैं ऐसे ही बने रहने के लिए उन्होंने सायास-प्रयास किए हैं। भारतीय राजनीति के हर छद्म को सतह पर ला देने वाला यह दौर दिलचस्प है। संगम से दूर, वंदेमातरम् के नारें से दूर यह राजनीतिक हताशाओं का महागठबंधन है। लगता यही है कि देश आस्था की डुबकी लगा रहा है और आम भारतीयों की चिंताओं से दूर हसरतों की राजनीति, डूबने से पहले उचक रही है!
हर-हर गंगे !