जब जार्ज ने कहा था जा रे इंदिरा तेरे राज में ये भी दिन देखना था
   दिनांक 29-जनवरी-2019
 - उमेश चतुर्वेदी                       
 
जार्ज फर्नांडिस नहीं रहे। 1974 के विख्यात देशव्यापी रेल हड़ताल ने जार्ज को धुरंधर राजनेता ही नहीं, ऐसे शख्स के रूप में स्थापित कर दिया, जिसकी जिंदगी के लिए किवदंतियां बन जाती हैं। अभूतपूर्व जीवट वाले सादगी पसंद राजनेता जार्ज फर्नांडिस से आपातकाल के दौरान इंदिरा सरकार चिढ़ गई थी। तत्कालीन सरकार का एकमात्र उद्देश्य किसी भी कीमत पर जार्ज की गिरफ्तारी थी। इसलिए उनकी खोज में खुफिया ब्यूरो और सुरक्षा बल लगे हुए थे। जार्ज की जिंदगी जितनी घटनाओं भरी रही, उतनी ही उनकी गिरफ्तारी का किस्सा भी दिलचस्प है।
आपातकाल के दौरान जार्ज को उनके साथियों के साथ कलकत्ता (अब कोलकाता) के विक्टोरिया मेमोरियल के नजदीक स्थित सेंट पाल कैथेड्रल चर्च से 10 जून 1976 को गिरफ्तार किया गया था।
उन दिनों जार्ज की खोज में लगे खुफिया ब्यूरो में तैनात एक अफसर बताते हैं कि गिरफ्तारी के वक्त जार्ज को पहचानना मुश्किल था...यह कहा जाता है कि जार्ज गिरफ्तारी के वक्त जार्ज सिख के वेश में थे..लेकिन हकीकत कुछ और है। खुफिया ब्यूरो के पूर्वी कमांड में कोलकाता में उन दिनों तैनात वह अधिकारी अब रिटायर होकर पूर्वी उत्तर प्रदेश के अपने गांव में रहते हैं। अपना नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने जार्ज की गिरफ्तारी की जानकारी इन पंक्तियों को लेखक को साल 2000 में दी थी। तब वे सेवा में थे और जार्ज फर्नांडिस देश के रक्षा मंत्री थे। आपातकाल के बतौर सेनानी रक्षा मंत्री रहते हुए जार्ज फर्नांडिस ने 25 जून 2000 को दिल्ली स्थित अपने सरकारी आवास 3 कृष्णामेनन मार्ग में एक प्रेस कांफ्रेंस भी की थी...तब इन पंक्तियों के लेखक ने उनकी गिरफ्तारी के कुछ किस्सों की उनसे चर्चा की थी...तब जार्ज ठहाका मारकर हंसते हुए पूछते रहे थे कि ये किस्से किसने बताए...
बड़ौदा डायनामाइट कांड के अभियुक्त जार्ज फर्नांडिस को हर कीमत पर गिरफ्तार करने पर आमादा इंदिरा सरकार ने अपने सारे घोड़े खोल रखे थे। खुफिया ब्यूरो के अधिकारी के मुताबिक जार्ज फर्नांडिस उन दिनों अपनी एक महिला दोस्त से मिलने के लिए कोलकाता आ रहे थे। यह जानकारी खुफिया ब्यूरो में तैनात एक आईपीएस अधिकारी को हो गई थी। शक की बिना पर वह मुंबई से ही संदिग्ध जार्ज के पीछे लग गया और जनता एक्सप्रेस से वह मुंबई से चल पड़ा था। लेकिन उसे भरोसा नहीं था कि यही जार्ज फर्नांडिस हैं।
जार्ज जब विक्टोरिया मेमोरियल के नजदीक स्थित कैथेड्रल में पहुंचे तो वे कोट-पैंट पहने हुए थे। तब खुफिया ब्यूरो की पूरी टीम वहां सादी वर्दी में तैनात हो चुकी थी...कोलकाता पुलिस के स्पेशल सेल की टीम भी वहां सादी वर्दी में थी। तब अंबेसडर कारें ही सरकारी सेवा में हुआ करती थीं।
जब अपनी महिला दोस्त से मिलकर जार्ज साहब कैथेड्रल से निकले तो उन्हें पकड़ने में वहां तैनात सुरक्षा बल की टीमें हिचक रही थीं। तब खुफिया ब्यूरो में कोलकाता के स्पेशल सेल से प्रतिनियुक्ति पर एक जूनियर अफसर तैनात हुए थे। वे बिहार के ही किसी समाजवादी परिवार के बेटे थे। उनके यहां जार्ज का आना-जाना था। इसलिए वे जार्ज को पहचानते थे। बहरहाल कैथेड्रल से बाहर निकले जार्ज को उनकी ही निशानदेही पर कोलकाता पुलिस के स्पेशल सेल के जवानों ने जबर्दस्ती उठाकर कार में डाल दिया था।
अचानक हुई इस कार्रवाई से बहुरूपिया बने जार्ज फर्नांडिस अचकचा गए। गुस्से में उन्होंने धाराप्रवाह अंग्रेजी में पुलिस जवानों को खरी-खोटी सुनाना शुरू कर दिया। बीच-बीच में जार्ज जब रूकते तो पुलिस टीम के जवान उनसे पूछते- सर, आप जार्ज फर्नांडिस हो...तब गुस्साए जार्ज उनसे उलटे ही प्रतिप्रश्न पूछ देते थे, हू जार्ज?
कोलकाता पुलिस और खुफिया ब्यूरो की टीम जार्ज साहब को लेकर कोलकाता के लार्ड सिन्हा रोड स्थित स्पेशल सेल के कार्यालय पहुंची। वहां भी अफसरों ने उनसे पूछकर तस्दीक करने की कोशिश की। लेकिन धारा प्रवाह अंग्रेजी में जार्ज फर्नांडिस खुद के जार्ज होने से इनकार करते रहे।
बाद में एक इंस्पेक्टर ने जार्ज से पूछा, सर चाय पिएंगे?
उन्होंने हामी भरी तो एक जवान केतली में चाय और कुल्हण लेकर आया। उसने योजना के तहत कुल्हण की धूल-मिट्टी झाड़े बिना उसमें चाय उड़ेली और जार्ज को थमा दिया।
खुफिया ब्यूरो के अवकाशप्राप्त अफसर के मुताबिक तब जार्ज इससे चिढ़ गए। उन्होंने चाय देने वाले जवान को अंग्रेजी में डांट पिलाई, तुम्हें सामान्य व्यवहार तक नहीं पता।
फिर उन्होंने कुल्हण को हिलाया और यह कहते हुए चाय फेंक दी, जा रे इंदिरा तेरे राज में ये भी दिन देखना था।
जार्ज के मुंह से इतना सुनते ही वहां मौजूद अफसरों और जवानों ने राहत की सांस ली थी..
यह साबित हो गया था कि जिसे उन्होंने गिरफ्तार किया है, वह जार्ज फर्नांडिस ही हैं।