डर के आगे जिहाद है
स्रोत:    दिनांक 03-जनवरी-2019
कथित डर और शोषण की आड़ में इस्लाम अपनी मजहबी जरूरतें पूरी कर रहा है। इसलिए उसे एक डरा मुसलमान चाहिए। इस्लाम में निडर मुसलमान की कोई जरूरत नहीं है
 
 दिल्ली के जाफराबाद में एक जिहादी के घर से बरामद हथियार और अन्य वस्तुएं
23 दिसंबर को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में तहरीके इंसाफ पार्टी की सरकार ने 100 दिन पूरे किए। इस पार्टी के अध्यक्ष हैं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान। इमरान ने उस दिन एक कार्यक्रम को संबोधित किया। उन्होंने भारतीय फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह की चर्चा करते हुए कहा, ‘‘मैंने सुना है कि भारत में फिल्म कलाकार नसीरुद्दीन शाह भी आज वही बातें कह रहे हैं जिसे बहुत पहले (70 साल पहले) हमारे कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने महसूस कर लिया था।’’
आज के नसीरुद्दीन शाह को कल के मोहम्मद अली जिन्ना से जोड़ते हुए इमरान खान ने जो बात साबित करने की कोशिश की वह यह कि भारत का मुसलमान डरा हुआ है। इमरान के अनुसार, ‘‘उसका (मुसलमान का) यह डर अनायास नहीं है। आज से 70 साल पहले मोहम्मद अली जिन्ना जानते थे कि जिस दिन हिन्दुओं का शासन आएगा वे मुसलमानों को इसी तरह से डराएंगे। इसलिए उन्होंने हमारे लिए (मुसलमानों के लिए) अलग देश बनाया था।’’
साफ है कि नसीरुद्दीन शाह ने इमरान खान को यह बात कहने का मौका दिया। शाह ऐसे मुसलमान हैं, जिन्होंने अब तक दो बार शादी की है। उनकी पत्नी रत्ना पाठक हिंदू हैं और पहले भी उन्होंने एक हिंदू से ही शादी की थी। इसमें कोई दो राय नहीं है कि हिंदू-बहुल देश में उनकी फिल्मों के दर्शक भी ज्यादातर हिंदू ही होंगे। यानी उन्हें हिंदुओं ने ही इतना मान-सम्मान दिया और ‘नायक’ बनाया। वे अपने आपको नास्तिक कहते हैं और किसी खास मजहब या समुदाय से अपने को नहीं जोड़ते हैं। वे यह भी कहते हैं कि उन्होंने अपने बच्चों को हिंदू या मुसलमान नहीं बनाया है, लेकिन आज उन्हें डर लगता है कि कल को कोई भी उठकर उनके बच्चे से पूछ सकता है कि वह हिंदू है या मुसलमान, तो वह क्या जवाब देगा?
बात इतनी भर होती तो समझ में आती। वे एक नास्तिक व्यक्ति हैं और इस नाते अगर उनके मन में यह बात उठती है तो उसका जवाब उन्हें मिलना चाहिए लेकिन इसके साथ उन्होंने एक दूसरी बात भी जोड़ दी। उन्होंने कहा, ‘‘आज भारत में एक इंस्पेक्टर की जान से ज्यादा कीमत एक गाय की हो गई है।’’ उनकी पहली चिंता अगर उनके अपने परिवार के लिए है तो उनकी दूसरी चिंता परिवार के दायरे से बाहर निकलकर एक सरकार विशेष और सामाजिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है? उनका संकेत बुलंदशहर की घटना की ओर है, जहां गोहत्या के विरोध में सड़क पर उतरे लोगों से झड़प में एक पुलिस इंस्पेक्टर की जान चली गई थी। इस घटना पर भारत का कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी वर्ग और मुसलमान, दोनों ने एक जैसी प्रतिक्रिया दी थी। वे दोनों ही गोरक्षकों को दोषी ठहराने पर उतर आए थे, जो इलाके में गाय काटने के विरोध में सड़कों पर उतरे थे।
परोक्ष रूप से नसीरुद्दीन शाह ने न सिर्फ गोरक्षकों पर निशाना साधा, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार पर भी सवाल उठाया, जहां भाजपा के योगी आदित्यनाथ इस समय मुख्यमंत्री हैं। देखते ही देखते उनके डर में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी शामिल हो गए। हालांकि नसीरुद्दीन शाह ने उनको अपने डर में शामिल होने से रोक दिया, लेकिन जो संदेश जाना था वह तो चला ही गया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को भी जो कहना था उन्होंने साफ-साफ कह दिया। इसलिए सवाल न तो नसीरुद्दीन शाह रह गए हैं और न ही इमरान खान। बड़ा सवाल दूसरा है, जो बीते अनेक सालों से भारत में जस का तस बना हुआ है। वह सवाल है कि आखिर हिंदुओं की संगत में मुसलमानों को डर क्यों लगता है? क्या मुसलमान डरता है या डर दिखाकर डराता है?
इसके लिए ज्यादा दूर नहीं, बस थोड़ा-सा पीछे जाना पड़ेगा जब भारत का बंटवारा हुआ था। उस वक्त भी एक डर दिखाया गया था मुसलमानों को कि अगर अंग्रेजों के बाद हिंदू सत्ता में आ गए तो मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बना देंगे। बंटवारे के दार्शनिक और द्विराष्ट्रवाद सिद्धांत के जनक अल्लामा इकबाल ने यही डर मुस्लिम लीग को भी बेचा था और अवध के नवाब को भी। मुस्लिम लीग को जैसे मनमांगी मुराद मिल गई और उसने इसी डर को अपना हथियार बना लिया। इसी डर को दिखाकर अल्लामा इकबाल ने मोहम्मद अली जिन्ना को तैयार किया कि वे किसी भी कीमत पर पाकिस्तान की मांग से पीछे नहीं हटेंगे। समय के साथ अल्लामा इकबाल तो चले गए, लेकिन इकबाल के मरने के बाद यही डर जिन्ना ने मुसलमानों को बेचा और वे भारत के तीन टुकड़े करके अंतत: पाकिस्तान बनाने में कामयाब हो गए।
मुसलमान के लिए डर और शोषण कोई डर या शोषण नहीं, बल्कि एक हथियार है और समय-समय पर वह इस हथियार का इस्तेमाल करके अपनी मजहबी जरूरतों को पूरा करता है। मौलवी, मौलाना, मुफ्ती अल्लाह का डर दिखाकर मुसलमानों को अपने वश में रखता है। इसी तरह मुस्लिम नेता हिंदुओं का डर दिखाकर मुसलमानों को अपना गुलाम बनाकर रखते हैं। यह डर दिखाने का कारोबार अनायास नहीं है। इसी डर के आगे जिहाद है। एक निडर मुसलमान इस्लाम के किसी काम का नहीं है। एक सवाल पूछने वाला मुसलमान भी इस्लाम में किसी काम का नहीं है। इस्लाम को एक डरा हुआ मुसलमान चाहिए, जो जिहाद के लिए आसानी से तैयार हो सके।
भारत से लेकर पाकिस्तान तक समय-समय पर मुसलमानों को यही डर दिखाकर उसे एकजुट किया जाता है और हर बार उसे अंधे कुएं में धकेल दिया जाता है। अगर ऐसा नहीं होता तो जरा सोचिए जिस सभा में इमरान खान को नसीरुद्दीन शाह का डर दिखाई दिया, उसी सभा में उन्होंने अपनी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या बताई? उन्होंने बताया कि उनकी सरकार ने पांच जगहों पर रैन बसेरे बनवाए हैं। आप सोचिए कि बंटवारे के 70 साल बाद भी जहां एक तिहाई मुसलमान खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं, 90 प्रतिशत आबादी को साफ पीने का पानी तक नसीब में नहीं है, वह मुसलमान अपनी इन चिंताओं से इतना चिंतित क्यों नहीं होता जितना कि गाय काटने को लेकर रहता है? यही उसकी वह मजहबी मानसिकता है जिसको हथियार की तरह इस्तेमाल करके दूसरे मत-पंथ के खिलाफ खड़ा किया जाता है। अगर ऐसा नहीं होता तो आज मुसलमान गोहत्या बंदी के समर्थन में खड़ा होता और नसीरुद्दीन शाह जैसे अभिनेता बहुसंख्यक हिंदुओं की भावना का सम्मान करने की दुहाई दे रहे होते। हकीकत तो यह है कि मुसलमान डरा हुआ नहीं है, बल्कि इसी डर की आड़ में अपने आपको बहुसंख्यकों के खिलाफ संगठित कर रहा है। भारतीय जनता पार्टी की बढ़ी ताकत से हैरान परेशान मुसलमान उसे रोकने के लिए इस डर को औजार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। डर मुसलमानों में नहीं है, बल्कि डरने की जरूरत तो हिंदुओं को है जिनके बीच रहते हुए जिहादी पनप रहे हैं। अमरोहा और दिल्ली से गिरफ्तार मौलवी और मजहबी उन्मादी आतंकवादी ज्यादा डरा रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य से कोई नसीरुद्दीन शाह या इमरान खान इसके खिलाफ कभी नहीं बोलता। न उसको डर लगता है और न ही पेट में पलते इन आतंकियों को लेकर उन्हें कोई चिंता होती है।
(लेखक विस्फोट डॉट कॉम के संपादक हैं)