पुण्य तिथि विशेष: इस गांधी से नहीं कांग्रेस को वास्ता
   दिनांक 30-जनवरी-2019
- डॉ. संतोष कुमार तिवारी            
गांधीजी ने गोरक्षा और कन्वर्जन पर अत्यधिक विचार किया था। उनके विचार हरिजन, यंग इंडिया, सम्पूर्ण गांधी वांड्मय, The Collected Works of Mahatma Gandhi आदि पुस्तकों में प्रकाशित हुए हैं।
कांग्रेस गांधी का नकली उपनाम तो इस्तेमाल करती है लेकिन गांधी जी के सिद्धांत, उनकी सोच और उनके रास्ते पर चलती नजर नहीं आती। कांग्रेस की कार्यशैली स्पष्ट तौर पर मुस्लिम तुष्टीकरण करने वाली नजर आती है
हात्मा गांधी गोरक्षा के प्रबल समर्थक थे और धार्मिक कनवर्जन के प्रबल विरोधी। अपने साप्ताहिक पत्र ‘हरिजन’ (15 सितम्बर,1940) में गांधीजी ने लिखा था कि गोमाता कई मायनों में उस मां से भी बेहतर हैं जो हमें जन्म देती है। बेलगांव, महाराष्ट्र में 28 दिसंबर 1924 को दिए अपने भाषण में उन्होंने कहा था कि कई बातों में मैं गोरक्षा के प्रश्न को स्वराज्य से भी बड़ा मानता हूं। (सम्पूर्ण गांधी वांड्मय खंड 25, पृष्ठ 549, प्रकाशनवर्ष 1967)। ऐसा प्रतीत होता है कि आजादी के बाद जो शासक केंद्र और राज्यों में सत्ता में आए, उन्हें महात्मा गांधी की बातें अच्छी नहीं लगीं। वे उनके विचारों की हत्या करने लगे। सेकुलर कांग्रेस द्वारा उनके विचारों की हत्या का यह क्रम आज पहले से कहीं अधिक तेज हुआ है।
गांधीजी ने गो के प्रश्न पर और कन्वर्जन पर अत्यधिक विचार किया और लिखा है। उनके ये विचार हरिजन, यंग इंडिया, सम्पूर्ण गांधी वांड्मय, कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ महात्मा गांधी आदि अनेक पुस्तकों में संग्रहीत हैं। सम्पूर्ण गांधी वांड्मय और कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ महात्मा गांधी, दोनों का प्रकाशन भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने किया है। ‘यंग इंडिया’ 1919 से 1932 तक अमदाबाद से प्रकाशित होने वाला एक साप्ताहिक पत्र था, जिसके संपादक गांधीजी थे। शुरू में यह पत्र गांधीजी की देखरेख में मुंबई से प्रकाशित हुआ था।
सम्पूर्ण गांधी वांड्मय (खंड 65) में प्रकाशित 20 अप्रैल, 1937 के अपने एक भाषण में गांधीजी ने कहा था: ‘‘गोसेवा हमारे धर्म का अविभाज्य अंग है।’’ उसी भाषण में गांधीजी ने आगे कहा: ‘‘गोधन की रक्षा में प्रत्यक्ष अहिंसा है और करोड़ों का आर्थिक लाभ है। हमारा धर्म है कि हम गोसेवा शास्त्र का अभ्यास करें और गोधन की रक्षा का यथाशक्ति प्रयत्न करें।’’
गांधीजी के शब्दों में ‘‘गोरक्षा का अर्थ है ईश्वर की सम्पूर्ण मूक सृष्टि की रक्षा। गोवंश के प्रति की गई प्रत्येक क्रूरता ईश्वर और हिंदुत्व की अस्वीकृति है।’’ (यंग इंडिया 6 अक्तूबर,1921)
गीता प्रेस, गोरखपुर की प्रख्यात मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ में भी देश के समक्ष आने वाली ज्वलंत समस्याओं पर गांधीजी के विचार प्रकाशित होते थे। जैसे कि हिन्दू विधवा, बलात्कार आदि। अक्तूबर 1945 में ‘कल्याण’ के गो-अंक के पृष्ठ संख्या 107 से 111 में भी गोरक्षा पर गांधीजी के विचार प्रकाशित हुए थे। सात सौ से अधिक पृष्ठों वाला यह गो-अंक अब तक नौ बार पुन: मुद्रित हो चुका है। अंतिम बार 2015 में इसका प्रकाशन हुआ था। गीता प्रेस समय-समय पर ‘कल्याण’ के विशेषांक प्रकाशित करती आ रही है। जैसे, आरोग्य अंक, ज्योतिषतत्वांक आदि। गांधीजी की पुस्तक ‘सप्त-महाव्रत’ भी गीता प्रेस द्वारा समय-समय पर प्रकाशित होती रहती है।
महात्मा गांधी का संदेश
‘कल्याण’ के गो-अंक में अपने संदेश में महात्मा गांधी ने कहा था- ‘‘भारत की सुख-समृद्धि गो और उसकी संतान की समृद्धि के साथ जुड़ी है।’’ इसमें गांधीजी के जो अन्य विचार प्रकाशित हुए उनके कुछ अंश इस प्रकार हैं:
‘‘भागवत में हम पढ़ते हैं कि भारतवर्ष का नाश कैसे हुआ। उसमें अनेक कारणों में एक कारण यह भी बताया गया है कि हमने गोरक्षा छोड़ दी। मेरी समझ में कुरान शरीफ में यह लिखा है कि किसी भी प्राणी के नाहक प्राण लेना पाप है। मुसलमानों को यह समझाने की मैं इच्छा रखता हूं कि हिंदुस्थान में हिंदुओं के साथ रहकर गोवध करना हिंदुओं का खून करने के बराबर है, क्योंकि कुरान कहती है कि खुदा ने, निर्दोष पड़ोसी का खून करने वाले के लिये जन्नत नहीं है-ऐसा निश्चय किया है। इसलिए आज मैं मुसलमानों का साथ देता हूं, उनको दुख न हो—ऐसा बर्ताव करता हूं, उनकी खुशामद करता हूं तो यह इसलिये कि इस उपाय से उनमें मजहब की वृत्ति जाग्रत हो। गोरक्षा मुझे अति प्रिय है। यदि कोई मुझसे पूछे कि हिन्दू धर्म का बड़े-से-बड़ा बाह्य स्वरूप क्या है तो मैं गोरक्षा बताऊंगा।’’ इसी अंक में गांधीजी ने यह भी बताया कि गो-रक्षा के लिए राज्य के अनेक कर्तव्य हैं जैसे:
1. राज्य बाजार में बिकने आने वाली तमाम गायों को अधिक-से-अधिक कीमत देकर खरीद ले।
2. राज्य अपने सभी मुख्य शहरों में दुग्धालय चलाकर सस्ता दूध बेचे।
3. राज्य चर्मालय की स्थापना करे और वहां अपनी मिल्कियत के तमाम पशुओं की हड्डी और चमड़े का उपयोग करे, प्रजा की मिल्कियत के पशुओं में से भी मारे हुए तमाम पशुओं को खरीद ले।
4. राज्य आदर्श पशुशालाएं रखे तथा पशुओं को पाले, और उनके पालन-पोषण की कला का ज्ञान लोगों को प्रदान करे।
5. सरकार विस्तृत गोचर भूमि की व्यवस्था करे तथा गोरक्षा का शास्त्र लोगों को समझाने के लिये श्रेष्ठ विशेषज्ञों की सेवा प्राप्त करे।
6. इसके लिये एक खास विभाग खोले, और उसमें नफा पाने का बिल्कुल ही विचार न रखकर यह उद्देश्य रखे कि पशुओं की विभिन्न नस्लों में और उनकी रक्षा आदि के हर-एक विषय में समय-समय पर जो सुधार हों, उनसे लोग पूरा-पूरा लाभ उठा सकें।
इस योजना में यह बात तो आ ही जाती है कि तमाम बूढ़े, लाचार, और रोगी पशुओं की रक्षा राज्य को ही करनी चाहिये। निश्चय ही इसमें भारी बोझ है; परन्तु यह बोझ ऐसा है कि इसे हर एक राज्य को, खासकर हर-एक-हिन्दू राज्य को उठाना चाहिये। हम इस प्रश्न पर विचार करें तो स्पष्ट है कि शास्त्रीय रीति से दुग्धालय और चर्मालय चलाये जाएं तो राज्य उनसे खाद की प्राप्ति के अतिरिक्त, आर्थिक दृष्टि से जो पशु काम के नहीं रहे, उनका निर्वाह भी कर सकता है; यही नहीं बल्कि बाजार भाव से चमड़ा, चमड़े का सामान, दूध और घी-मक्खन इत्यादि तथा खाद को भी बेच सकता है। शास्त्रीय ज्ञान के अभाव और झूठी भावना के कारण ये सभी वस्तुएं प्राय: नष्ट हो जाती हैं और इनसे अधिक-से-अधिक लाभ नहीं उठाया जाता।
‘‘यह ऐसी हानि है कि इसको कोई व्यक्ति या संस्था नहीं रोक सकती। यह बात मुख्यत: सरकार के ही हाथ की है। इसमें लोगों को पशु पालना, दुग्धालय चलाना और बैल चुनने की शिक्षा देना जरूरी है। मेरे नम्र विचार के अनुसार सारी प्रजा के साथ दृढ़ता और ज्ञानपूर्वक काम करते हुए गोधन की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है। राज्य के बालकों और लोगों को निरोग और सस्ता दूध मिल सके-ऐसी व्यवस्था करना राज्य के प्रथम कर्तव्यों में से एक है, ऐसा मैं मानता हूं।’’ यहां यह बात भी स्पष्ट कर देना जरूरी है कि महात्मा गांधी ने गोरक्षा के लिए हिंसा का सहारा लेने का भी स्पष्ट विरोध किया है।
इसी अंक की पृष्ठ संख्या 257-258 पर डॉ. मुहम्मद हाफिज सैयद का एक लेख छपा है। शीर्षक है:‘‘भारत में गोरक्षा।’’ अपने लेख में उन्होंने फ्रांसीसी लेखक फ्रास्वां बर्निएर (1620-1688) की पुस्तक ‘मुगल साम्राज्य में भ्रमण’ के हवाले से लिखा है कि मुहम्मद शाह और शाह आलम आदि पिछले मुगल सम्राटों ने गो-वध पर प्रतिबंध लगा दिया था।...गो-वध इस्लाम का प्रधान अंग नहीं है ...।’’
फ्रास्वां बर्निएर अपने जीवन काल में दो बार भारत आए थे और गुजरात, कश्मीर आदि कई जगह घूमे थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के डॉ. मुहम्मद हाफिज सैयद के कुछ अन्य लेख भी ‘कल्याण पत्रिका’ में छपते रहे थे।
प्रख्यात गांधीवादी विचारक और लेखक काका कालेलकर(1885-1981) की पुस्तक ‘बापू की झांकियां’ में पृष्ठ 98 पर गांधीजी को उद्धृत किया गया है:‘‘मैं स्वराज के लिए भी गोरक्षा का आदर्श नहीं छोड़ सकता।’’ काका कालेलकर ने स्वयं भी गोरक्षा के लिए ‘कल्याण’ में लिखा था।
गांधीजी की भांति गीता प्रेस और उसकी मासिक पत्रिका कल्याण गोरक्षा की समर्थक रही है। परंतु आज भारत के कुछ प्रभावशाली तत्व गीता प्रेस और ‘कल्याण’ को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। गोरक्षा की वकालत और कन्वर्जन का विरोध करने वालों को कुछ सेकुलर आज ‘हिन्दू कट्टरपंथी’ कहते हैं। पाञ्चजन्य ने 26 मार्च 2017,11 फरवरी 2018 और 11 मार्च 2018 के अंकों में गीता प्रेस और ‘कल्याण’ को बदनाम करने की कोशिश कर रहे तत्वों का पर्दाफाश करने का प्रयास किया है।
कन्वर्जन के प्रबल विरोधी सम्पूर्ण गांधी वांड्मय के खंड 34, पृष्ठ 10 पर उद्धृत गांधीजी के ईसाइयत पर विचार इस प्रकार हैं: ‘‘मैंने अक्सर ‘सरमन ऑन द माउंट’ की तारीफ की है पर उसे गलत रंग दिया जा रहा है। मुझे जीसस के जीवन की वह व्याख्या पूर्णत: अस्वीकार है जो परम्परागत ईसाई करते आये हैं। मैं यह कतई नहीं मानता कि एक अकेला जीसस करोड़ों मनुष्यों के पाप के लिए मर गया और इस प्रकार उनका उद्धार करने वाला हो गया। मैं जीसस को एक मनुष्य मानता हूं, एक श्रेष्ठ शिक्षक, पर सर्वश्रेष्ठ शिक्षक नहीं मानता।’’ इसी पुस्तक के खंड 34, पृष्ठ 261 पर गांधीजी बताते हैं: ‘‘ईसाइयत 1900 वर्ष पुरानी है, इस्लाम 1300 वर्ष पुराना है, वेद 10 लाख वर्ष से भी अधिक प्राचीन हैं, वे सृष्टि के आरम्भ से हैं।’’
अंग्रेजी पुस्तक ‘कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ महात्मा गांधी’ (खंड 42) में कहा गया है कि गांधीजी कन्वर्जन को बहुत गलत मानते थे। उनके आश्रम में विभिन्न मतों के लोग रहते थे, परन्तु किसी का कनवर्जन करने की सख्त मनाही थी।
सी.एफ. एंड्रयूज ने महात्मा गांधी पर लिखी अपनी पुस्तक में कहा है कि ‘धर्म के संदर्भ में बापू का स्वदेशी से मतलब था कि सब अपने-अपने धर्म में ही रहें। गांधीजी कन्वर्जन के खिलाफ थे तो इसका एक कारण यह भी था कि अधिकतर मामलों में कन्वर्जन की अपील पेट पालने के लिए की जाती थी, न कि वास्तविक आध्यात्मिक परिवर्तन के लिए। पेट पालने के लिए भोले-भाले वनवासी इसमें फंसते रहे हैं।’
एंड्रयूज (1871-1940) एक ईसाई मिशनरी थे। वे गांधी जी से दक्षिण अफ्रीका में मिले थे और उन्होंने भी गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने की राय दी थी। उन दोनों में अच्छी मित्रता थी। एक बार गांधीजी से किसी ने पूछा कि ईसाई मिशनरियों को किस तरह काम करना चाहिए, तो गांधीजी ने कहा था कि सी.एफ. एंड्रयूज की तरह। एंड्रयूज ने1904 से दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कालेज में पढ़ाया भी था।1926 में जब ‘कल्याण’ का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ तो उसके चौथे अंक में उन्होंने एक लेख लिखा था। चौदह वर्ष बाद उन्होने फिर ‘कल्याण’ में गीता के विश्वव्यापी प्रचार पर एक लेख लिखा था।
‘कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ महात्मा गांधी’ (खंड13: 220) में कहा गया है कि गांधीजी ने मिशनरी लोगों को सुझाव दिया था कि वे कन्वर्जन कराना बंद करें और अपने अन्य परोपकार के कार्य जारी रखें। 
हिन्दू बनाम भारतीय
अंग्रेजी पुस्तक ‘गांधी एंड रिलीजन’ (लेखक: बी.आर. नन्दा, प्रकाशक: गांधी स्मृति और दर्शन समिति, 1990) में बताया गया है कि एक बार गांधीजी की ईसाई शिष्या मिस स्लेड ने हिन्दू धर्म अपनाना चाहा, तो गांधीजी ने कहा कि कन्वर्जन सही नहीं है। तुम अपने ही पंथ में रहो। बाद में मिस स्लेड ने अपना नाम मीराबेन रख लिया। इस पर किसी ने कहा कि उनका नाम हिन्दू हो गया। तब बापू का कहना था कि उनका नाम भारतीय हो गया।
अंग्रेजी पुस्तक ‘क्रिश्चियन मिशन्स: देयर प्लेस इन इंडिया’ (1941, पृष्ठ 151 और 220) में गांधीजी के विचार हैं: ‘‘ईसाई मिशनरी जिस तरह कन्वर्जन कर रहे हैं, उससे वे समस्त भारतवर्ष को नुकसान पहुंचा रहे हैं, स्वतंत्र भारत में उन्हें ऐसे काम का कोई भी अवसर नहीं दिया जायेगा।’’
कन्वर्जन पर गांधीजी के विचार ईसाई मिशनरियों के लिए जबरदस्त चुनौती थे। हालांकि गांधीजी कन्वर्जन के विरोधी थे, परन्तु वे सर्वधर्म कल्याण चाहते थे। वे एक ऐसी ‘प्लूरलिस्टिक सोसाइटी’ के पक्षधर थे जिसमें सभी पंथों के लोग शांति के साथ रह सकें।
आजाद भारत में आज लगातार कन्वर्जन हो रहा है। इन्हें कौन सहयोग दे रहा है? सहयोग देने वाले तो वही कांग्रेसी और वामपंथी हैं जो 1948 से आज तक निरंतर गांधीजी के विचारों का गला घोंटते आए हैं।