'कांग्रेस के प्रति मीडिया की ‘नरम संपादकीय नीति'
स्रोत:    दिनांक 04-जनवरी-2019
अगस्ता वेस्टलैंड के बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल के राजनीतिक संपर्कों की खुल रही पोल
पहले मीडिया पर निष्पक्ष दिखने का नैतिक दबाव रहता था, किंतु लगता है अब वह भी खत्म हो चुका है। कुछ बड़े समाचार समूहों के खबरों के चयन से यह बात स्पष्ट हो जाती है। एनडीटीवी तो बदनाम है ही, पर आजतक समूह ने इस मामले में सबको पीछे छोड़ दिया है।
आगरा में कुछ लोगों ने वंचित समुदाय की एक नाबालिग छात्रा को जिंदा जला दिया। स्थानीय अखबारों ने पुलिस के हवाले से शुरू में ही बता दिया था कि यह परिवार के अंदर का मामला है। चूंकि एक आरोपी ने आत्महत्या कर ली, इसलिए बाकी कड़ियों तक पहुंचने में पुलिस को थोड़ा समय लग गया। चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए मुद्दे गढ़ने की फिराक में बैठे आजतक समूह को यह सुनहरा मौका लगा। उसने इस जघन्य घटना को सवर्ण बनाम दलित का रंग देना शुरू कर दिया। दूसरे चैनलों ने भी उसकी नकल की। बच्ची के परिवजनों को मालूम था कि हत्या के पीछे कौन हो सकता है। लेकिन मीडिया ने कुछ छुटभैये नेताओं की मदद से उन्हें समझाया कि ‘मामले को जातीय रंग दो तो सरकार से मुआवजा मिल जाएगा।’ ऐसा होता इससे पहले ही आगरा पुलिस ने मामले का भंडाफोड़ कर दिया और बाकी आरोपियों पकड़े गए। यह जानकारी आने के बाद भी चैनल ने सरकार को कोसना जारी रखा कि वह एक ‘दलित’ को इंसाफ नहीं दिला पा रही है। इस चैनल पर एक चीखती सी आवाज ने बार-बार ऐसी टिप्पणियां कीं जो उसके पूर्वाग्रह को झलका रही थीं।
सवाल है कि आरोपियों के पकड़े जाने के बाद भी किस नीयत से सरकार और पुलिस पर अभद्र टिप्पणियां की गई ? महिला पत्रकारों से यौन शोषण के आरोपी विनोद दुआ का चरित्र एक बार फिर बेनकाब हुआ। उन्होंने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के एक साक्षात्कार में काट-छांट करके बताया कि उन्होंने सरकार से ‘विद्रोह’ कर दिया है। असल में गडकरी कुछ समय से मीडिया के एक खास वर्ग के निशाने पर हैं। उनके वक्तव्यों को आधा-अधूरा या संदर्भ से काटकर ऐसे दिखाया जा रहा है, जिससे साबित किया जा सके कि सरकार के बड़े मंत्रियों के बीच में मतभेद है। मीडिया अगर यह कोशिश कर रहा है तो इसके पीछे किसका दिमाग होगा, यह समझना बहुत कठिन नहीं है।
कर्नाटक में 52 वंचितों को बंधुआ मजदूर बनाकर अमानवीय अत्याचार का मामला सामने आया। चूंकि इसमें कांग्रेस-जदयू(एस) की सरकार पर सवाल उठ रहे थे, इसलिए मीडिया ने इस समाचार को ‘सेंसर’ कर दिया। किसी ने दिखाया भी तो यह पूछने की हिम्मत नहीं कि वंचितों के हितैषी कहां हैं, जो उनके नाम पर राजनीति चमकाते हैं? कांग्रेस के लिए मीडिया के ‘प्रेम’ की अति तब हो जाती है, जब पत्रकार ही इसके शिकार बनते हैं। जयपुर में कवरेज के लिए गए एक पत्रकार को थाने में बैठाकर रखा गया। यह खबर दिल्ली की मीडिया तक नहीं पहुंची। किसी भाजपा शासित राज्य में ऐसा होता तो यही समाचार अलग तरीके से दिखाया जाता। मीडिया की स्वयंभू संस्थाओं ने भी पत्रकार पर हुए इस अत्याचार पर मुंह नहीं खोला।
हेराल्ड हाउस मुद्दे पर कांग्रेस परिवार के खिलाफ अदालत का फैसला आया। अगस्ता वेस्टलैंड के बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल के राजनीतिक संपर्कों की पोल खुल रही है। लेकिन दोनों ही बड़े मामलों को मीडिया ने खास महत्व नहीं दिया। शायद इसलिए, क्योंकि इनमें उस परिवार पर प्रश्नचिह्न लगता है, जिसे मीडिया सवालों से परे मानता रहा है। राफेल सौदे को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद भी राजनीतिक बयानबाजी जारी है। मीडिया का एक वर्ग विवाद को बनाए रखने में मददगार की भूमिका में है।
जीएसटी पर बैठक में कांग्रेस शासित प्रदेशों ने दरों में कटौती का विरोध किया, लेकिन अज्ञात कारणों से किसी बड़े अखबार या चैनल ने इसे तूल नहीं दिया। क्या यह राजनीतिक रूप से कम महत्वपूर्ण समाचार था कि जिस पार्टी का अध्यक्ष चुनावी रैलियों में जीएसटी को मुद्दा बनाता है, उसी पार्टी की राज्य सरकारें बैठकों में दरें कम करने का विरोध करती हैं? यह सवाल तो लोगों के मन में उठ ही रहा है कि कांग्रेस के लिए ऐसी ‘नरम संपादकीय नीति’ के पीछे क्या रहस्य है?