क्या वास्तव में घट रही है मोदी की लोकप्रियता ?
स्रोत:    दिनांक 07-जनवरी-2019
इन दिनों कुछ “वरिष्ठ” पत्रकारों ने एक बहुत बड़ा बीड़ा उठाया हुआ है। वो भाजपा के अंदर नरेंद्र मोदी का विकल्प तलाश रहे हैं। उन्हें भाजपा की बड़ी चिंता है कि “इस बार मोदी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव जीतना शायद संभव नहीं होगा।” भाजपा को सदा से ‘कम्युनल’ और “अल्पसंख्यक विरोधी” बतलाते/साबित करते आए इन पत्रकारों की भाजपा के प्रति ये ‘चिंता’ ही अपने आप में एक बड़ी खबर है।
उनकी बात आम लोगों की समझ से परे है, क्योंकि मोदी अपनी लोकप्रियता के शिखर पर हैं| इसका प्रमाण है एक दूसरे के जानी दुश्मन रहे नेताओं द्वारा महागठबंधन के लिए महीनों से किया जा रहा सिर फुटव्वल। आगामी लोकसभा चुनाव में दोनों ही पक्षों का एक ही मुद्दा है – मोदी। यह बात कांग्रेस और उसके साथियों को साल रही है और यही इन “वरिष्ठ” कलमकारों की भाजपा के प्रति नयी-नयी ‘चिंता’ का भी कारण है। कांग्रेस और अन्य विपक्षियों की मजबूरी है कि वो मोदी विरोध के नाम पर ही अपना गठबंधन खडा कर सकते हैं। इसी नाम पर वो अपने गट्ठा वोटों को इकट्ठा करना चाह रहे हैं, लेकिन इसी में उन्हें बड़ा खतरा भी दिख रहा है।ख़तरा ये कि ऐसे में वोटर को मोदी बनाम अन्य का अंतर बड़ा साफ होकर दिखता है।
ऐसे में उन्हें ऐसे कुछ ‘बुद्धिजीवियों’ की आवश्यकता है जो कह सकें कि “मोदी अब प्रभावी नहीं रहे” या “भाजपा को लोकसभा जीतना है तो मोदी का विकल्प खोजना होगा” क्योंकि पिछले साढ़े चार सालों से एकमात्र “मोदी हटाओ” मुहिम चला रहा कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्ष खुद तो ऐसा कह नहीं सकता।  आख़िरकार आप दो में से एक ही बात कह सकते हो।एक, “मोदी देश/लोकतंत्र/संविधान.. के लिए ख़तरा हैं, इसलिए एक हो जाओ।” अथवा “मोदी लहर ख़त्म हो गई, किसी और को लाओ।”
ऐसा उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव में भी किया था। पहले वो भाजपा को चुनौती देते रहे कि “आप नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार तो घोषित करके दिखाएं “ इसमें वो जोड़ते थे कि “मोदी को एनडीए के साथी दल नहीं स्वीकार करेंगे और एनडीए तो छोड़िए भाजपा के अन्दर ही नहीं स्वीकारा जाएगा।” जब मोदी को एनडीए ने अपना प्रधानमन्त्री पद का प्रत्याशी घोषित कर दिया तो यही लोग कहने लगे कि “मोदी का गुजरात के बाहर कोई प्रभाव नहीं है” और “और मोदी तो केवल एक राज्य (गुजरात) के नेता हैं और राहुल जी राष्ट्रीय नेता हैं।” लेकिन इस बार परिस्थिति अलग है। इस बार वो खुद ऐसा नहीं कह सकते।
इसलिए इस काम को ठेके पर दे दिया गया कुछ नामचीन ‘पत्रकारों’ को। या उन्होंने मौके की नजाकत को समझते हुए इस जिम्मेदारी को खुद ही ओढ़ लिया।पर काम शुरू हो गया।एक वरिष्ठ पत्रकार जिन्हें कांग्रेस सरकार ने पद्मश्री से नवाज़ा था, और आजकल जो एक वामपंथी झुकाव वाले चैनल के साथ काम कर रहे हैं, उन्होंने केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी के एक हालिया वीडियो साक्षात्कार से एक अंश लिया, जिसमें यूपीए सरकार से उन्हें विरासत में मिले मंत्रालय पर एक सवाल पूछा गया था। उत्तर में गडकरी ने बताया कि जब उन्होंने सड़क परिवहन मंत्रालय का काम संभाला तो काम की स्थिति अच्छी नहीं थी और “ मैं ये स्वीकार करता हूँ कि 75प्रतिशत परियोजनाओं के बंद होने के पीछे सरकार थी| उस समय की यूपीए सरकार ने एक भी प्रोजेक्ट को पर्यावरण मंत्रालय से क्लिअरेंस (अनुमति) नहीं दिया”.. अब इन पद्मश्री पत्रकार ने किया ये कि गडकरी के बयान वाले इस वीडियो में से यूपीए वाला भाग काटकर हटा दिया और अपने वीडियो ब्लॉग में दिखाकर कहा कि “कहने का मतलब ये है कि अब भाजपा के अन्दर से आवाज उठ रही है और संघ से जुड़े नेता भी कह रहे हैं कि अगर आगे चुनाव जीतना है तो प्रधान सेवक नरेन्द्र मोदी की शक्ल दिखाकर नहीं जीत सकते। आपको नितिन गडकरी को आगे लाना होगा। ये संकेत नितिन गडकरी ने खुद हमारे ही सहयोगी अखिलेश भार्गव (पत्रकार) को दिए ”
फिर इसे ही आधार बनाकर कई पत्रकारों ने “मोदी-शाह रहित भाजपा नेतृत्व” पर लेख लिख डाले। “पीएम की घटती लोकप्रियता” पर चर्चा की गई। ये नया पैंतरा नहीं है| इसी तरह की चर्चाएं अटल-आडवाणी जोड़ी को लेकर चलाई जाती थीं। तब अटल जी को भाजपा से अलग चित्रित किया जाता था। ख़म-पेंच ये था कि अटल जी की लोकप्रियता को भाजपा से अलग करके दिखाया जाए।
अनौपचारिक रूप से लोकसभा चुनाव अभियान की शुरुआत हो चुकी है| हालांकि लोकसभा और राज्यसभा में पिछले साढ़े चार साल जैसा गुलगपाड़ा और रंजिश चलती रही उससे लगता है कि विपक्षी दल मई 2014 के बाद चुनावी मानस से बाहर आए ही नहीं। उनके साथ ताल बिठलाकर पत्रकारों का एक वर्ग भी सक्रिय है।ये लोग रफाल पर राहुल गांधी के आरोपों को दुहराते हैं लेकिन कभी कांग्रेस अथवा राहुल गांधी से नहीं पूछते कि उनके आरोपों का आधार क्या है ?
एक होती है राजनैतिक पत्रकारिता और एक होती है पत्रकारिता में राजनीति । दोनों में मूलभूत अंतर है पर विभाजन रेखा बड़ी बारीक है। खबर की खबर देना पत्रकार का काम है, पर खबर बनाना पत्रकार का काम नहीं है। पर ये बातें बेमानी हैं| राजनैतिक कार्यकर्ता सरीखी भूमिका निभा रहे ये सहाफी आलाप ले रहे हैं, जिसके नेपथ्य में सुनाई देता संगीत कांग्रेस मुख्यालय से उठ रहा है। थाप पोलित ब्यूरो से आ रही है।