राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता की अनुभूति का माध्यम SEIL
स्रोत:    दिनांक 08-जनवरी-2019
 - श्रीनिवास                       
मेरा भारत मेरा घर ध्येय लेकर 2019 में एक बार फिर से भारत गौरव यात्रा प्रारंभ हो गई है। इसके तहत गुवाहाटी से तीन अलग अलग समूहों में 30-30 छात्र छात्राओं का दल देश भर में भ्रमण करेगा और भारत को समझेगें
 दिल्ली में आए हुए उत्तरपूर्व छात्र
9 जुलाई 1949 को देश में स्थापित हुई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने अपने स्थापना काल में ही यह तय कर लिया था कि अगर हमें राष्ट्र के गौरव को पुन: स्थापित करना है तो इस देश के वर्तमान छात्रों को भारतीयता के साथ जोड़ना और भारत की वास्तविक पहचान को वर्तमान छात्रों को बताना होगा। राष्ट्र सर्वोपरि की भावना लेकर आज भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यही काम करने में जुटी है।
परिषद का मानना है कि छात्र कल का नहीं बल्कि आज का नागरिक है और यह छात्र शक्ति ही राष्ट्र शक्ति है। छात्र शक्ति में यही भाव जागृत करने के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद अनेक प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करती है। कार्यक्रमों की रचना में भारत के सनातन विचारों को स्थान देते हुए विविधता में एकता को ही आधार माना जाता है। विद्यार्थी परिषद की स्थापना वास्तव में इसलिए हुई थी कि जिन बातों को लेकर देश के क्रांतिकारियों ने बलिदान दिए थे आजादी के बाद उसी आंदोलन को वर्तमान पीढ़ी में स्थापित करना , यानी राष्ट्रीय मूल्यों, गौरवशाली इतिहास , सनातन भारतीय विचार और हमारी सांस्कृतिक विरासत को पुनः स्थापित करने के लिये शिक्षा का भारतीयकरण करना। विद्यार्थी परिषद ने ही सबसे पहले यह कहा कि छात्र कल का नहीं छात्र आज का नागरिक है, अतः समाज में वह एक सजग और जागरूक छात्र संगठन की भूमिका में है। परिषद का मानना है कि भारत की विविधता, संस्कृति और सुंदरता को स्वीकार करते हुए अटक से लेकर कटक तक कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक यह संपूर्ण भारत मेरा घर है, यह भाव तभी उत्पन्न होगा जब छात्र और छात्राएं पूरे भारत को जानें और उसका भ्रमण कर उसे समझें। जैसा कि हम सब जानते हैं कि भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र न केवल विपुल खनिज सम्प्रदाओं का भंडार है बल्कि सामरिक महत्व का क्षेत्र भी है। पूर्वोत्तर के सात राज्य जिन्हें सेवन सिस्टर भी कहा जाता है जनजाति बहुल क्षेत्र हैं। यहां अनेक देशों से हमारी सीमाएं लगती हैं। पहले सैकड़ों वर्षों की गुलामी फिर आजादी के बाद की तत्कालीन केंद्र सरकार की उपेक्षा के चलते और वहां की भौगोलिक परिस्थितियां विषम होने के कारण शेष भारत से पूर्वोत्तर के लोगों का संपर्क और संवाद न के बराबर होता था। वहां राष्ट्र विरोधी शक्तियों द्वारा एक षड्यंत्र के चलते अनेक प्रकार के भ्रम भी उत्पन्न करने के प्रयास चल रहे थे।
1965 में जब विद्यार्थी परिषद के प्रमुख लोग जब पूर्वोत्तर में भ्रमण पर गए तो उन्होंने पूर्वोत्तर की विशेषताओं को समझा। पूर्वोत्तर के भौगोलिक और सामाजिक महत्व को समझा , पूर्वोत्तर की सभ्यता और सौन्दर्य बौद्ध को आत्मसात किया। उन्हें लगा कि पूर्वोत्तर के साथ शेष भारत का और पूर्वोत्तर के लोगों का शेष भारत के साथ संवाद और संपर्क बढ़ना चाहिए। विद्यार्थी परिषद ने विचार किया कि जब तक पूर्वोत्तर का विकास नहीं होगा तब तक हम भारत का विकास नहीं कर सकते। यदि हमें भारत की एकात्मकता, अखंडता और संप्रभुता को सुदृढ़ करना है तो हमें संपर्क और संवाद बढ़ाना ही पड़ेगा। परिषद का मानना हैँ कि जब तक समाज को जागृत नहीं किया जायेगा तब तक हम भारत को महान नहीं बना सकते और भारत को बनाने के लिये सभी क्षेत्रों के छात्रों का योगदान अपेक्षित है और यह तभी हो सकता हैँ जब हम सही में अपने देश को समझें और पहचाने। इसके लिए जरूरी है कि हम महसूस करें कि इसी मिट्टी में हमारी जड़ें हैं। सभी छात्रों के मन में ऐसी ही भावना हो इसके लिए 1966 में SEIL ( Students Experience in Inter-state living . यानी अंतरराज्जीय छात्र जीवन दर्शन की शुरुआत की गई। प्रारम्भ से ही SEIL ने अपनी सार्थकता को सिद्ध किया।
 
 लोकनृत्य करता पूर्वोत्तर का एक छात्र
इसके तहत 1966 में परिषद ने जो सबसे पहला प्रयोग किया वह था पूर्वोत्तर के 17 छात्रों को पढ़ने के लिए मुंबई लाया जाना। इसे नाम दिया गया my home india. मेरा भारत मेरा घर, मेरा देश मेरा घर। परिषद के इस प्रकल्प ने पूर्वोत्तर के राज्यों में एक ऐसा नेतृत्व विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जिसने यह समझाया कि उसका देश से रिश्ता क्या है ? पूर्वोत्तर के यहां आने वाले छात्र जब मुंबई, दिल्ली, बंगलुरु, चेन्नै, चंडीगढ़, जयपुर और पुणे जैसे विकसित शहरों को देखते हैं तो स्वाभाविक रूप से उनके मन में भी यह प्रश्न उठता है कि मेरे राज्य में भी ऐसा ही विकास हो। इस तरह विद्यार्थी परिषद का यह प्रकल्प उत्तरपूर्व भारत के विकास की एक धुरी का भी काम करता है। वहां से आने वाले छात्र जब एक परिवार में रुकते हैं तो उनका परिवार से संवाद होता है। उनमें ऐसा भाव आता है कि उसके घर से दूर भी उसका एक घर है परिवार है। अनेकों बार ऐसा होता है कि जब छात्र वापस अपने घरों को लौटते हैं तो भावुक हो जाते हैं। महज कुछ दिनों का संबंध जीवन पर्यंत बना रहता है।
SEIL के माध्यम से परिषद 50 वर्षों से भी अधिक समय से यह सांस्कृतिक और भावनात्मक आदान— प्रदान का काम कर रही है। यह प्रकल्प आज सांस्कृतिक एकता की अनुभूति का माध्यम बन गया हैँ। हजारों छात्र इस अनुभूति के साथ पूर्वोत्तर सहित देश के अन्य राज्यों में राष्ट्र जीवन के कार्य में जुड़े हैं। 2019 में यह यात्रा 4 जनवरी से 26 जनवरी तक " भारत गौरव यात्रा " के रूप में हो रही है। तीन अलग अलग समूहों में यह 30-30 छात्र—छात्राओं का यह दल देश भर में भ्रमण करेगा। परिवारों में रहना, परिवारों से संवाद सार्वजनिक कार्यक्रमों पत्रकार वार्ताओं के माध्यम से यह छात्र परस्पर जागरूकता , एकात्मकता सशक्तिकरण के भावों को लेकर राष्ट्रीयता की अलख जगाएंगे। इस यात्रों में आए छात्र—छात्राएं अधिकतर पहली बार अपने राज्यों से बाहर आये हैँं। परिषद के इस प्रकल्प के तहत सारा उत्तरपूर्व मेरा भारत मेरा घर भावना से ओत—प्रोत हो रहा है। इसी तरह प्रति वर्ष भारत से छात्रों के रूप में युवा वर्ग आता रहेगा। भारत को समझता रहेगा और वापस जाकर वहां राष्ट्र विचारों की अलख जगाता रहेगा। विविधता में एकता के तत्व को मजबूत करेगा। सांस्कृतिक धरोहर को मजबूत करेगा और यह सिलसिला चलता रहेगा।
बहु भाषा बहु पंथ हमारे
मतभेदों को रखे किनारे
एक जुट हो करे देश के
मान बिन्दुओं का सम्मान।
(लेखक एबीवीपी के राष्ट्रीय सह संगठनमंत्री हैं )