भारत में शरण लेने वाले हिंदुओं के दर्द पर लगेगा मरहम!
   दिनांक 11-अक्तूबर-2019
 प्रशांत पटेल उमराव
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा समय-समय पर इस विषय पर दिए बयानों को देखें तो स्पष्ट होता है कि यह विधेयक सरकार की प्राथमिकताओं में से एक है और उन्हें भारत के बाहर रह रहे हिन्दू, सिख एवं अन्य अल्पसंख्यकों की बड़ी चिंता है

संभव है कि संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में नागरिकता संशोधन विधेयक पारित हो जाए। ऐसा हुआ तो असुरक्षा के चलते पड़ोसी देशों-पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान छोड़कर भारत में शरण लेने वाले हजारों हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई, पारसी आदि अल्पसंख्यकों के जख़्मों पर बड़ा मरहम लगेगा और वे सम्मान और गरिमा के साथ भारत में भारतीय बनकर रह सकेंगे। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा समय-समय पर इस विषय पर दिए बयानों को देखें तो स्पष्ट होता है कि यह विधेयक सरकार की प्राथमिकताओं में से एक है और उन्हें भारत के बाहर रह रहे हिन्दू, सिख एवं अन्य अल्पसंख्यकों की बड़ी चिंता है।
दरअसल, असम में एनआरसी की सूची जारी होने के बाद से सिटिजनशिप अमेंडमेंट बिल (नागरिकता संशोधन विधेयक) 2016 को लेकर चर्चाएं कुछ ज्यादा तेज हो गई हैं। यह विधेयक 19 जुलाई, 2016 को लोकसभा में प्रस्ततु किया गया था। उसके बाद 12 अगस्त, 2016 को संयुक्त संसदीय समिति को सौंप दिया गया था। समिति ने इस संशोधन का ढाई साल तक निरीक्षण किया और इस साल जनवरी में रिपोर्ट सौंपी। उसके बाद इस विधेयक को जनवरी में लोकसभा में पास कर दिया गया था, लेकिन राज्यसभा में यह पास नहीं हो सका था। नागरिकता (संशोधन) विधेयक को चुनौती देने वाली एक याचिका सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है और जैसे ही संसद यह विधेयक पास करेगी, इस याचिका पर सुनवाई होगी। पिछली लोकसभा के भंग होने के साथ ही यह विधेयक स्वत: रद्द हो गया। इसलिए अब इसे पुन: संसद में पेश करने की आवश्यकता होगी। उम्मीद है कि संसद के शीतकालीन सत्र में इसे पुन: पेश किया जाएगा और राज्यसभा में भी सत्ताधारी पार्टी के बहुमत के करीब होने के कारण बिल के पास होने में कोई रुकावट नहीं आएगी। इस बिल की राह में रोड़े अटकने की आशंका इसलिए भी नहीं है क्योंकि बीते सत्र में मोदी सरकार तीन तलाक और आरटीआई अमेंडमेंट जैसे बिल भारी विरोध के बावूजद भी लोकसभा और राज्यसभा दोनों से पास कराने में सफल रही।
क्यों महत्वपूर्ण है यह विधेयक
यह विधेयक नागरिकता एक्ट, 1955 में संशोधन करता है ताकि भारत में रह रहे-अफगानिस्तान,पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसियों को नागरिकता प्रदान की जा सके और उन्हें अवैध प्रवासियों की श्रेणी से बाहर किया जा सके। विधेयक के अनुसार भारत में रहने वाले पाकिस्तान,बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यक समुदाय, जैसे कि हिन्दू,सिख, बौद्ध, ईसाई,जैन, पारसी से सम्बन्ध रखने वाले व्यक्तियों, जो बिना कानूनी दस्तावेजों या जिनके दस्तावेजों की वैधता समाप्त हो गयी है उन्हें भारतीय नागरिकता का आवेदन करने के लिए पात्र बनाने का प्रस्ताव है। नागरिकता एक्ट, 1955 अवैध प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्राप्त करने से प्रतिबंधित करता है। प्रस्तावित बिल, एक्ट में यह संशोधन करता है कि उपरोक्त अल्पसंख्यक समूहों के साथ अवैध प्रवासियों की भांति व्यवहार नहीं किया जाएगा। नागरिकता एक्ट के तहत देशीकरण (नेचुरलाइजेशन) द्वारा नागरिकता प्राप्त करने के लिए एक शर्त यह यह है कि आवेदनकर्ता आवेदन करने से 12 महीने पहले से भारत में रहा हो और उससे पहले 14 वर्षों में से 11 वर्ष उसने भारत में बिताए हों। विधेयक इन तीन देशों के छह मत-पंथों के व्यक्तियों के लिए 11 वर्षों की इस शर्त को छह वर्ष करता है।
इस लाभ को प्राप्त करने के लिए उन्हें विदेशी एक्ट,1946 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) एक्ट,1920 से भी छूट देनी होगी। अवैध प्रवासियों को विदेशी एक्ट,1946 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) एक्ट,1920 के तहत कारावास दिया जा सकता है या निर्वासित किया जा सकता है। 1946 और 1920 के एक्ट केंद्र सरकार को भारत में विदेशियों के प्रवेश, निवास और निकास को ‘रेगुलेट’ करने की शक्ति प्रदान करते हैं। 2015 और 2016 में केंद्र सरकार नें दो अधिसूचनाएं जारी करके अवैध प्रवासियों के कुछ समूहों को 1946 और 1920 के अधिनियमों के प्रावधानों से छूट प्रदान की थी। यह समूह अफगानिस्तान,पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी हैं, जिन्होंने भारत में 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले प्रवेश किया। इसका अर्थ यह है कि अवैध प्रवासियों के इन समूहों को वैध दस्तावेजों के बिना भी भारत से निर्वासित नहीं किया जाएगा या कारावास नहीं भेजा जाएगा।
यह विधेयक भारत की विदेशी नागरिकता वाले ‘कार्डहोल्डरों’ से संबंधित प्रावधानों में भी संशोधन का प्रस्ताव करता है। 1955 के अधिनियम के तहत, यदि कोई व्यक्ति भारतीय मूल का है जैसे कि भारत के पूर्व नागरिक या उसके वंशज या भारतीय मूल के किसी व्यक्ति के पति-पत्नी हैं, वह ओवरसीज सिटीजन आॅफ इंडिया (ओसीआई) के रूप में पंजीकरण करा सकता है। इससे वे भारत में आने, यहां काम करने एवं अध्ययन करने जैसे लाभों को प्राप्त करने के लिए अधिकृत हो जाएंगे। प्रस्तावित विधेयक, नागरिकता एक्ट में यह संसोधन का प्रस्ताव करता है जिसके तहत अगर कोई ओसीआई कार्ड होल्डर देश के किसी भी कानून का उल्लंघन करता है तो उसका पंजीकरण रद्द किया जा सकता है।
विधेयक के प्रति सजग है सरकार
पिछले 1 अक्तूबर को कोलकाता में हुई एक रैली में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि किसी भी हिंदू, सिख, जैन, ईसाई, पारसी और बौद्ध शरणार्थी को देश से जाने नहीं दिया जाएगा और बंगाल में एनआरसी को लागू किया जाएगा, लेकिन उससे पहले नागरिकता (संशोधन) बिल को पास कराकर सभी हिंदू, जैन, सिख, ईसाई और बौद्ध शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दी जाएगी। गृहमंत्री के इस बयान से इस विधेयक के प्रति सरकार की सजगता का अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि जनवरी में नागरिकता संसोधन विधेयक लोकसभा में पास होने के बाद असम के कुछ जनजातीय संगठनों द्वारा इसका विरोध भी किया गया। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में लम्बे समय से वहां के अल्पसंख़्यकों पर अत्याचार होता है, आयेदिन वहां पर नाबालिग हिन्दू, सिख और ईसाई लड़कियों के अपहरण व जबरन कन्वर्जन की खबरें आती रहती हैं। 1951 की जनगणना के अनुसार पूर्वी पाकिस्तान में जहां 22 फीसदी से अधिक हिन्दू थे, अब घटकर मात्र 8 फीसदी रह गये हैं। इसी तरह सिखों, ईसाइयों का भी यही हाल है, जो अब नाम मात्र के ही बचे हैं। प्रति वर्ष पाकिस्तान में मजहबी प्रताड़ना से त्रस्त होकर भारत में शरण लेने वाले हिंदुओं की संख्या लगभग 5000 से अधिक है, जो काफी विपरीत परिस्थितियों में दिल्ली, जोधपुर, कर्णावती व कुछ अन्य शहरों में रह रहे हैं। इसी प्रकार बांग्लादेश में भी 1971 युद्ध के समय वहां के अल्पसंख्यक हिंदुओं के साथ बड़े पैमाने पर अत्याचार हुआ और उनकी जमीनों, घरों, मंदिरों पर कब्जा कर लिया गया। मजबूरी में उन्हें जान बचाकर भारत में शरण लेनी पड़ी जो मुख्यत: असम, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा जैसे राज्यों में बसे हैं। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान और बांग्लादेश के बहुसंख्यक भारत में बेहतर रोजगार के साधनों, अच्छे जीवन स्तर की तलाश में अवैध रूप से आते और जनसंख्या असंतुलन पैदा करते हुए कई गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त पाए जाते हैं।
नागरिकता संशोधन विधेयक के पास होने से भारत में लंबे समय से रह रहे पाकिस्तान, अफगानिस्तान व बांग्लादेश के पीड़ित अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता का रास्ता साफ होगा और उन्हें वापस अपने देशों में जाने को मजबूर नहीं होना पड़ेगा।
(लेखक सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता हैं)