बेलगाम अपराधी, बदहाल बंगाल
   दिनांक 11-अक्तूबर-2019
जिस ‘मॉब लिंचिंग’ पर पूरे देश में हल्ला मचता है, वैसी ही कोई घटना प. बंगाल में होती है तो सेकुलर बिरादरी के होठ सिल क्यों जाते हैं? ‘मॉब लिंचिंग’ पर प्रश्न उस पक्ष से ही क्यों होते हैं जो लगातार यह पीड़ा झेल रहा है?

त्योहार का मातम में बदल जाना क्या होता है, यह पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के पाल परिवार के परिचितों से पूछिए! कहां दीवाली के दीए जलाने की तैयारी थी, कहां कुल के सभी दीपक एक साथ बुझ गए।
मुर्शिदाबाद जिले के जियागंज थाने के कांजीगंज क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बंधुप्रकाश पाल, उनके आठ साल के बेटे और गर्भवती पत्नी की बर्बर हत्या बताती है कि बंगाल में कानून और व्यवस्था की स्थिति बेकाबू है।
बंधुप्रकाश हाल में संघ से जुड़े उत्साही और मुखर कार्यकर्ता थे। वह और उनका परिवार किस कारण से किन लोगों की आंखों में खटक रहे थे, यह तो अब तक साफ नहीं है किन्तु घटना के 48 घंटे बाद भी खाली हाथ रही पुलिस का रवैया यह बताने के लिए काफी है कि जघन्यतम घटनाएं भी शासन-प्रशासन की सुस्ती तोड़ने में नाकाम हैं।
सभी घटनाओं की कड़ियां आपस में जुड़ें, न जुड़ें, घटनाओं का अंबार ऐसा है कि लोग इसे खास वैचारिक पालेबंदियों, आक्रोश और गुंडा तत्वों को तृणमूल राज में मिल रहे प्रशासनिक प्रश्रय से जोड़कर देख रहे हैं।
राज्य सरकार की ओर से लगातार उपेक्षा, असुरक्षा झेलते समाज के लिए यह अस्वाभाविक भी नहीं है। एक के बाद दूसरी, लगातार हो रहीं ऐसी अनेक घटनाएं ममता राज में पलती उस हिंसक असहिष्णुता की साक्षी हैं जो भारत-भारतमाता, राम-दुर्गा, संघ-भाजपा जैसा जिक्र जबान पर आते ही चाकुओं पर सान धरने लगती है।
क्या यह महज संयोग है कि जिस राज्य की मुख्यमंत्री सड़क पर राम का नाम लेते बच्चों को ललकारने-दुत्कारने लगती हो, वहां 6 जुलाई को 24 वर्ष के कृष्णा देबनाथ की उन्मादियों के समूह द्वारा घेरकर सिर्फ इस कारण हत्या कर दी गई, क्योंकि उसने ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाया था।
गौर कीजिए, भारत माता की जय कहने वाले बंधुप्रकाश या राम का जयकारा लगाने वाले कृष्णा, ये इक्का-दुक्का घटनाएं नहीं हैं। इसी वर्ष 6 अप्रैल को नैहाटी, बीरभूम में ललटू दास को पुलिस सिर्फ इस कारण पकड़ रही थी क्योंकि उसकी साइकिल पर हिन्दू ध्वज लगा था! घबराहट में सड़क पर गिर गए ललटू दास को पीछे से आते एक ट्रक ने रौंद दिया। 7 अक्तूबर को नानूर (बीरभूम) में भाजपा कार्यकर्ता अनिमेष चक्रवर्ती की भी हत्या तृणमूल के गुंडों ने कर दी थी। सवाल है कि सूबे के भीतर (या बाहर भी) जब रा. स्व. संघ, भाजपा या राष्ट्रीय विचार से जुड़ाव रखने वाले लोगों को पगलाए राजनैतिक गुर्गे शिकार बनाते हैं तो ‘लिबरल’ किस खोल में दुबक जाते हैं? और.. क्या किसी राज्य में पुलिस भी वही हरकतें कर सकती है जो मजहबी पागलपन में डूबे गुंडे कर रहे हैं! फिर फर्क क्या है, प्रशासन कहां है? इस तरह की घटनाओं पर लगाम कौन लगाएगा?
बंगाल की बदहाल स्थितियों पर स्थानीय मीडिया ने भले संकोच के साथ ही कई घटनाओं का ब्योरा तो दिया है, किन्तु खुद को मुख्यधारा कहने वाला मीडिया इस राज्य की लगातार खराब होती स्थितियों पर विमर्श खड़ा करने से सीधे तौर पर कतराता रहा है। एक अपवाद अवश्य है। मीडिया घरानों ने न सही, देश के पुराने-प्रतिष्ठित पत्रकार संगठन नेशनल यूनियन आॅफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) ने बंगाल में राजनीतिक हिंसा और संघर्ष की घटनाओं को खंगाला और शोध के बाद इसे रिपोर्ट का रूप दिया। यह रिपोर्ट बताती है कि इसी वर्ष 19 मई से लेकर 21 जून तक पश्चिम बंगाल में राजनीतिक-वैचारिक हिंसा और मुठभेड़ की 150 घटनाएं हुई हैं। कुछ लोग इसे सभी राजनीतिक दलों का साझा हुड़दंग बताते हुए मामले पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं, किन्तु यह रिपोर्ट बताती है कि हिंसा में जिन 16 लोगों की जान गई है उनमें से 15 रा. स्व. संघ-भाजपा के कार्यकर्ता थे। संघर्षाें में घायल होने वाले 156 लोगों में भी तृणमूल कांग्रेस के केवल 16 कार्यकर्ता थे। आज की स्थितियों में ममता बनर्जी से लोगों की अपेक्षाएं सीमित हैं। प्रश्न है कि अन्य दल, विशेषकर बंगाल भाजपा के सभी सांसद सूबे में खून के आंसू रोती जनता को कैसे दिलासा देंगे?
यह समय की जरूरत है कि चुनाव के मुहाने पर खड़े पश्चिम बंगाल की लगातार हिंसक होती स्थितियों का देश-समाज, राजनीति और मीडिया द्वारा संज्ञान लिया जाए। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की यह जिम्मेदारी बनती है कि पश्चिम बंगाल की ओर कदम बढ़ाए, हत्या और ‘मॉब लिंचिंग’ के आंकड़ों का पहाड़ खड़ा करने वाले सूबे का संज्ञान ले।