क्या मुफ्ती ने ‘षड्यंत्र’ के तहत कराया था रुबैया का अपहरण ?
   दिनांक 14-अक्तूबर-2019
ले. कर्नल (से.नि.) आदित्य प्रताप सिंह
कई लोग के कथनानुसार तत्कालीन गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने एक षड्यंत्र के तहत अपनी बेटी रुबैया का अपहरण करवाया था। उन्होंने कश्मीर में हिंदू के प्रति हिंसा को बढ़ावा देने वाली कई चालें चलीं
 
1989 में गृहमंत्री पद की शपथ लेते हुए मोहम्मद सईद (दाएं टोपी में) लोग मानते है कि उनका गृहमंत्री बनना आईएसआई के लिए स्वर्णिम अवसर साबित हुआ (फाइल चित्र)
 आज से तकरीबन तीन दशक पूर्व भारत के एक पूर्व गृह मंत्री (मुफ्ती मोहम्मद सईद) की बेटी का अपहरण पलक झपकते ही राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समाचारों की सुर्खियां बन गया था। पूरे विश्व का ध्यान एक बार फिर कश्मीर की ओर आकर्षित हुआ। यह थी इस आतंकी अभियान और इस्लामिक आतंकियों की पहली सफलता। वे आसानी से हिंदू नरसंहार को अंजाम देते रहे और स्वयं विश्वपटल पर हमारे ही तथाकथित विद्वानों और वाममार्गी मीडिया द्वारा पीड़ित पक्ष भी बनाया जाता रहा। इस्लामिक आतंकियों को हम मात्र उग्रवादी कहकर संबोधित करते रहे। कश्मीरी जिहाद के वास्तविक इस्लामिक स्वरूप को भारत अंतरराष्ट्रीय जगत को दिखाने में असफल रहा। पश्चिमी जगत और भारत का ही एक बड़ा बौद्धिक वर्ग भारत के विरुद्ध एक असीमित युद्ध कर रहा था। मुस्लिम तुष्टीकरण के कारण वह 1947 से ही कश्मीर पर भारतीय पक्ष को कमजोर करने में रत था। इन हालात में मुफ्ती मोहम्मद सईद पर इस सुरक्षा चूक पर उंगली उठाने वाले कम और उनका पक्ष लेने वाले सभी थे। जिस प्रकार से मुफ्ती इस पूरे घटनाक्रम के दौरान कश्मीर स्थित इंटेलिजेंस ब्यूरो प्रमुख ए. एस. दुलत और मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला पर ही विश्वास नहीं कर रहे थे, वह उनकी भारतीय व्यवस्था के प्रति ‘आस्था’ को दर्शाता है। उन्होंने आतंकियों से मध्यस्थता के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश मोतीलाल भट्ट एवं अन्य लोगों को चयनित किया था। मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला पर जल्द कार्रवाई का निरंतर अनेक माध्यमों से दबाव बनाया जा रहा था। अब्दुल्ला आतंकियों को छोड़ने के पक्षधर न थे। उनका यह आंकलन सच साबित होने वाला था कि अगर एक बार आतंकियों के दबाव में उनके साथियों को रिहा किया गया तो इसकी बाढ़ आ जाएगी और वास्तव में 13 दिसंबर, रुबैया को छोड़ने के बाद कश्मीर में यही हुआ। इस पूरे घटनाक्रम में इंटेलिजेंस ब्यूरो भी आतंकियों के परिवार वालों से बात कर दबाव बनाने की पूरी कोशिश कर रहा था। आई. बी. प्रमुख ए. एस. दुलत इस अपहरण में शामिल अशफाक माजिद वानी के पिता से लगातार बातचीत कर रहे थे और उन्होंने मुख्यमंत्री को बहुत जल्द और शायद बिना किसी आतंकी की रिहाई के रुबैया के छुड़ाने की बात कही थी। दरअसल मुफ्ती और अब्दुल्ला की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता राष्ट्रहितों पर भारी पड़ने वाली थी। दोनों ही नेता एक-दूसरे पर विश्वास नहीं कर रहे थे। अब्दुल्ला को यदि आतंकियों को दबाव में लाने की रणनीति में कुछ विलंब लग रहा था, तो मुफ्ती को लग रहा था कि शायद मुख्यमंत्री उनकी बेटी की सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं हैं। अंततोगत्वा जो गृह मंत्री चाहते थे वही हुआ, क्योंकि देश के मीडिया ने एक कश्मीरी मुस्लिम नेता की बेटी को लेकर ऐसा वातावरण बनाया था जिसने कश्मीर के इस्लामिक आतंक के मुद्दे को नेपथ्य में धकेल दिया। 13 दिसंबर, 1989 को रुबैया के बदले 5 इस्लामिक आतंकियों की रिहाई से कश्मीर में अपहरणों की एक बाढ़-सी आ गई। 1989 में अपहरण की एक घटना के बाद 1990 में 169, 1991 में 290, 1992 में 281, 1993 में 349 और 1995 में 368 अपहरण की घटनाएं हुईं।
वी. पी. सिंह सरकार ने अपनी कमजोरी को अपने एक नेता की व्यक्तिगत कमजोरी के कारण उजागर कर दिया था। आतंकियों के हौसले बुलंद थे तो सरकार दिग्भ्रमित और दुविधाग्रस्त थी। इस्लामिक आतंकवाद को हम सब समझने में विफल थे। हम कश्मीर में 1980 से अफगान जिहाद के काल से चल रहे घाटी के इस्लामीकरण के दूरगामी प्रभाव को समझने और उसको रोकने में असफल रहे। 1989 इस इस्लामीकरण का उत्कर्ष काल था, जब जिहादियों ने अमेरिका और पाकिस्तान की सहायता से सोवियत संघ जैसी वैश्विक महाशक्ति को हरा दिया था। इसी समय कश्मीर में भी इस्लामिक आतंक की दस्तक और तेज हो गई। कश्मीर में अनेक विदेशी जिहादियों ने अपनी आमद दर्ज कराई। पाकिस्तान ने ‘अभियान टोपाक’ 1988 में ही आरंभ कर कश्मीर को अफगानिस्तान के बाद की अपनी वरीयता बना दिया था। जिहादी आतंक उसी का हिस्सा था। 1989 की सर्दियों से पाक खुफिया एजेंसी आई. एस. आई. ने अपहरण की रणनीति अपनाने का फैसला लिया था और उसके लिए मुफ्ती मोहम्मद सईद का गृह मंत्री बनना सबसे स्वर्णिम अवसर था। पहले अपहरण के प्रयोग ने ही रणनीति की सफलता के ध्वज को आसमान की बुलंदियों पर पहुंचा दिया। कश्मीर के जिहादी आतंकियों के लिए यह सफलता का नया अध्याय और इतिहास था, जब वे भारत सरकार को उसके घुटने पर ले आए थे। इसी का सर्वोच्च शिखर 10 साल बाद 24 दिसंबर, 1999 में आईसी-814 विमान अपहरण के रूप में देखने को मिला। इन अपहरणों में छुड़ाए गए अधिकांश आतंकी आगे चलकर भारत के लिए और भी बड़ा सिरदर्द बने। मौलाना मसूद अजहर, जैश-ए-मोहम्मद आतंकी संगठन प्रमुख ऐसे ही आतंकियों में मुख्य हैं। मसूद अजहर को 1999 में आईसी-814 के यात्रियों के बदले छुड़ाया गया था। दरअसल इतिहास निरंतर प्रवाहित होने वाली नदी होता है जिसमें छोटी-2 घटनाएं धाराओं के रूप में जुड़कर उसका स्वरूप बदलती रहती हैं। कश्मीर में भी यही हो रहा था। केंद्र से लेकर राज्य सरकारें तक बिना किसी दूरगामी और दूरदर्शी नीति और रणनीति के कार्य कर रही थीं। प्रतिदिन कुआं खोदकर पानी पिया जा रहा था।
13 दिसंबर, 1989 से लेकर 19 जनवरी, 1990 का समय मात्र 38 दिन का अल्पकाल है। लेकिन यह कालखंड सुल्तान सिकंदर के 1389 से 1413 ईस्वीं के 24 वर्ष के कालखंड से अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि सुल्तान सिकंदर को घाटी हिंदू विहीन करने में 24 वर्ष लगे थे, लेकिन कश्मीर के आधुनिक सिकंदरों ने इस हिंदू नरसंहार की नींव को इसी अल्पकाल में रख दिया था। इस हिंदू नरसंहार को फिर पूरा करने में 3 महीने ही लगे। इतिहास की छोटी-सी गलती पूरे इतिहास को ही बदल देती है। रुबैया के बदले 5 इस्लामिक आतंकियों को छोड़ना वैसी ही ऐतिहासिक भूल थी। यह गलती थी या एक राष्ट्रीय षड्यंत्र—अनुसंधान का विषय है। परंतु कश्मीर में इस विषय पर अनेक राजनीतिक मत आज तक चर्चा का विषय बने हुए हैं। मुफ्ती के राजनीतिक विरोधी हमेशा कहते रहे हैं कि उन्होंने यह षड्यंत्र फारुख अब्दुल्ला की सरकार गिराने के लिए रचा था। इस मत पर विश्वास क्यूं न किया जाए जब मुफ्ती 1986 में मुख्यमंत्री बनने के लालच में अनंतनाग में हिंदू विरोधी हिंसा करा सकते थे, तो ऐसा क्यूं नहीं कर सकते थे? वे इस राष्ट्र विरोधी कृत्य के दुष्परिणामों का आंकलन शायद न कर पाए हों परंतु इस मत को सिरे से नकारा भी नहीं जाना चाहिए। उसके बाद कश्मीर घाटी में जो हुआ वह इस मत को और भी बल देता है। 2005 में हिलाल अहमद, पूर्व आतंकी सरगना और अब पीपल्स पोलिटिकल पार्टी के अध्यक्ष ने अपनी एक अप्रकाशित किताब ‘द ग्रेट डिस्क्लोजर-सीक्रेट्स अनमास्क्ड’ में मुफ्ती पर खुले तौर पर आरोप लगाते हुए कहा है कि वे जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के सरगना यासीन मलिक के साथ इस पूरे षड्यंत्र के सहभागी थे।
पाकिस्तान और उसके आई. एस. आई. पोषित जिहादी आतंकियों ने इस घटना से भारत की रणनीतिक कमजोरी को पकड़ लिया था। इस पूरे घटनाक्रम में मुफ्ती की व्यक्तिगत नेतृत्व क्षमता खोखली साबित हुई। अत: उनकी राष्ट्र के प्रति निष्ठा और नियति दोनों पर प्रश्न चिह्न लगना स्वाभाविक था। संतति मोह में वे राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर बैठे थे। जब आतंकी सामाजिक दबाव में आकर रुबैया को छोड़ने ही वाले थे फिर भी इंद्र कुमार गुजराल और मोहम्मद आरिफ खान जैसे दो मंत्रियों को फारुख अब्दुल्ला पर आतंकियों को छोडने का दबाव बनाने के लिए क्यूं भेजा गया? कैबिनेट सुरक्षा समिति ने जल्दबाजी में आतंकियों को छोड़ने का निर्णय क्यूं लिया था? वे उस शपथ के भावार्थ को भूल गए, जो उन्होंने भारत का गृह मंत्री बनते समय ली थी। अथवा वे भी उसी पाकिस्तानी इस्लामिक अलगाववादी विचारधारा में रमे-बसे हुए थे, जिसमें कश्मीर की अधिकांश जनता भय अथवा वैचारिक रूप से ओत-प्रोत थी। जुलाई, 1999 में अपनी पार्टी के गठन के बाद के उनके बयानों से तो यही प्रतीत होता था। उनके परिवार का पाकिस्तान प्रेम उनके कश्मीर में मारे गए पाकिस्तानी इस्लामिक आतंकियों के प्रेम से उजागर होता है। उनके पुत्र तसददुक, जो अब राजनीति में हैं, के द्वारा बनवाई गई फिल्म ‘हैदर’ साफ तौर पर उनके परिवार की अलगाववादी और पाकिस्तान-परस्त विचारधारा को दर्शाती है। कश्मीर की राजनीति इस्लामिक कट्टरपंथियों और अलगाववादियों के ही इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है। कश्मीर की राजनीतिक पंथनिरपेक्षता मात्र दिल्ली में प्रदर्शन के लिए है। यही कारण है कि वहां आज तक हिंदू नरसंहार और विस्थापन के विरुद्ध कभी भी कश्मीर का कोई राजनीतिक दल या नेता खड़ा नहीं हुआ। फिर भी हमारे उदारवादी बौद्धिक वर्ग को मुफ्ती और अब्दुल्ला परिवार पंथनिरपेक्ष और उदारवादी लगते हैं।
कश्मीर की राजनीति की दिशा और दशा सदैव कुरान और हदीस के द्वारा संचालित करने का प्रयास हुआ। वहां के राजनेता इसमें सफल भी हुए। भारतीय संविधान तो सदैव उनके लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ‘हराम’ ही रहा। भारत को हमेशा कश्मीर का एक बहुसंख्यक वर्ग हिंदू भारत के रूप में देखता आया और इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ शेख अब्दुल्ला का रहा, जो एक कट्टर मुस्लिम थे। कश्मीर की राजनीति में अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए कट्टर इस्लामिक और अलगाववादी चरित्र बनाए रखना अनिवार्य था। मुफ्ती के भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन मात्र ने उनके राजनीतिक और सामाजिक अस्तित्व पर जो असर डाला उसे लोगों ने उनकी अंतिम यात्रा में न आकर प्रदर्शित कर दिया। कश्मीर में अपने वर्तमान मुख्यमंत्री के जनाजे में मात्र 1,000 के आस-पास की भीड़ का आना बहुत ही शर्मनाक था, जहां पाकिस्तानी इस्लामिक आतंकियों के जनाजों में भी 5,0000 की भीड़ एकत्रित होती थी। कश्मीर में जनाजों की भीड़ ही व्यक्ति की लोकप्रियता को तय करती है। ये जनाजे कश्मीर में धीरे-धीरे एक आंदोलन का स्वरूप लेते जा रहे थे जिसे वर्तमान सरकार ने विदेशी आतंकियों के लिए बंद कराया। अत: कश्मीर के राजनेताओं का इस्लामिक आतंकियों के प्रति उदारता दिखाना स्वाभाविक है। मुफ्ती ने भी शायद अपनी पकड़ को घाटी में और अधिक सुदृढ़ करने के लिए इस प्रकार का कदम उठाया हो। कश्मीर में 90 के दशक में पाकिस्तानी आतंकियों का अंतिम संस्कार नियंत्रण रेखा के समीप ही करने की व्यवस्था थी, किंतु बाद में कश्मीर की अलगाववादी राजनीति में उनके शवों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था कश्मीरियों ने स्वयं ले ली थी। यह सब कुछ वहां की इस्लामिक राजनीति से प्रेरित था। इन राजनीतिक हालात के बीच कश्मीर के राजनेताओं के चरित्र को समझना बहुत मुश्किल नहीं है। मुफ्ती का चारित्रिक विश्लेषण भी इसी के प्रकाश में किया जाना चाहिए।