'तेजस': रेलवे में एक नया प्रयोग
    दिनांक 15-अक्तूबर-2019
हाल में तेजस नामक गाड़ी दिल्ली से लखनऊ के बीच चली, इसे लेकर ऐसी खबरें आयीं कि यह निजी क्षेत्र की गाड़ी है। पर तथ्य यह बताते हैं कि तेजस के परिचालन के कुछ हिस्सों को छोड़ दें, जिनका ताल्लुक रेलवे के मूल काम से नहीं है, तो तेजस सरकार की ही गाड़ी है।
 
तेजस के परिचालन की जिम्मेदारी जिस संस्था, जिस कंपनी की है-उस आईआरसीटीसी-इंडियन रेलवे केटरिंग एंड टूरिज्म कारपोरेशन में 87.40 प्रतिशत हिस्सेदारी सरकार की ही है। हाल में आईआरसीटीसी ने शेयर जारी किए थे, जिन्हे खरीदने में निवेशकों ने जबरदस्त दिलचस्पी दिखायी थी। हाल में आईआरसीटीसी ने शेयर जारी किये उसे करीब 645 करोड़ रुपये चाहिए थे पर उसके पास रकम आ गयी 72000 करोड़ रुपये की यानी करीब 112 गुना रकम आई। यानी इस कंपनी के कामकाज में निवेशकों को भरोसा है। यानी सरकारी कंपनियों पर जनता का, निवेशकों का भरोसा कायम है। यह समझा जाना चाहिए। आम ग्राहक को बेहतर सेवा, ठीक ठाक कीमत पर चाहिए होती है, वह सरकारी कंपनी दे रही है और या निजी कंपनी दे रही है यह चिंता आम तौर पर ग्राहक की नहीं होती। तेजस में दुर्घटना बीमा मिलेगा, अगर गाड़ी लेट हुई, तो सांकेतिक ही सही मुआवजा जैसा कुछ मिलेगा। तेजस अगर इस काम को कर सकती है, तो बाकी गाड़ियां इस काम को क्यों नहीं कर सकतीं, यह सवाल उठेगा।
सरकारी कंपनी के ही तहत
रेलवे में निजी क्षेत्र की भागीदारी की चर्चा लंबे समय से चल रही है। पर अभी तक निजी क्षेत्र की सशक्त मौजूदगी रेलवे में दिखाई दे नहीं रही है। रेल विभाग सरकार की मोनोपोली वाला या एकाधिकार वाला विभाग है। निजी रेलें निकट भविष्य में चलती हुई दिखाई नहीं देतीं। अलबत्ता स्टेशनों के रखरखाव के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी के प्रयोग जरूर सामने आ रहे हैं।
रेल की चर्चा होती है तो यह बात लगातार साफ होती है कि रेल की लागत तो लगातार बढ़ती ही जाती है पर उस हिसाब से रेल की कमाई या रेल की उत्पादकता नहीं बढ़ती है। राकेश मोहन समिति का 2001 में एक आकलन यह था कि रेलवे की समस्याओं का एक कारण यह भी है कि यहां वेतन भत्ते तो लगातार बढ़ते रहते हैं, पर उत्पादकता वैसे नहीं बढ़ती। कड़वी सचाई तो यह है कि सरकारी विभाग जितनी लागत से काम करते हैं, उसकी चौथाई लागत से भी कम में निजी क्षेत्र वह काम कर देता है, हम टेलीकाम को देख सकते हैं। रेलवे की उत्पादकता बढ़े,यह बहुत बड़ा सवाल है। निजी क्षेत्र की स्थितियां अलग हैं। पर निजी क्षेत्र के कौशल को समझकर कुछ मामलों में उसका अनुसरण करने में हर्ज नहीं है। यह सब आईआरसीटीसी नामक सरकारी कंपनी के तत्वावधान में ही हो सकता है। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि निजी क्षेत्र का रिकार्ड हर मामले में अनुकरणीय नहीं है। दिल्ली में मेट्रो ने एक रुट दिया था एक निजी कंपनी को, उसने वापस कर दिया। तो मीठा मीठा अंदर कड़वा कड़वा थू-यह एक किस्म का निजी अर्थशास्त्र है। निजी क्षेत्र वहां पर रकम लगाने में दिलचस्पी न दिखायेगा, जहां से रकम वापसी की, मुनाफे की संभावनाएं दूर दिखायी दें।
हर काम रेल का नहीं
पर बहुत से काम ऐसे हैं जिन पर रेल विभाग को अपनी ऊर्जा और संसाधन खर्च नहीं करने चाहिए। 2001 में राकेश मोहन समिति की रिपोर्ट में अनुशंसा थी कि रेजीडेंशियल कालोनियों, स्कूलों-कालेजों-अस्पतालों को चलाने का काम रेलवे के छोड़ देना चाहिए, यह रेल के मूल काम नहीं हैं। राकेश मोहन समिति 2001 का एक आकलन यह था कि मुफ्त के पास और मुफ्त की यात्राएं रेल को जमकर करानी पड़ती हैं। मुफ्तखोरी पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। अंतत इस का भार करदाता पर ही पड़ता है। ग्लोबल तजुरबे बताते हैं कि व्यापक तौर पर विश्व में पब्लिक सेक्टर के रेल विभाग भी व्यापक स्तर पर मुफ्तखोरी, मुफ्त यात्राओं को बढ़ावा नहीं देते।
नये प्रयोग
समझने की बात यह है कि भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा है, जो बेहतरीन सुविधाओं के लिए ज्यादा रकम खर्च करने को तैयार है। इन्हे ज्यादा बेहतरीन सुविधा देकर उनसे संसाधन जुटाये जा सकते हैं, उन संसाधनों का इस्तेमाल कई सेवाओं को, कई रेल किरायों को सस्ता रखने में भी किया जा सकता है। मूल बात यह है कि संसाधन होने चाहिए। संसाधन अगर किसी संपन्न की जेब से लिये जा रहे हैं, उसे ठीक ठाक सेवा देकर, तो इसमें कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। हां यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि देश का बड़ा वर्ग ऐसा भी जो सस्ती रेलयात्रा पर निर्भर है। तो रेल यात्राओं को उनकी जेब से बाहर भी नहीं होना चाहिए। यह देखना एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार का का काम है कि किसकी जेब से कितना निकलवाया जा सकता है। अगर कोई वर्ग ज्यादा बेहतर सुविधाओं के लिए ज्यादा रकम खर्च करने को तैयार है, तो इस संबंध में आवश्यक इंतजाम करना भी सरकार का ही जिम्मा है।