कश्मीर के इन परिवारों ने कश्मीर को कहीं का नहीं छोड़ा
   दिनांक 17-अक्तूबर-2019
ले. कर्नल (से.नि.) आदित्य प्रताप सिंह
मुफ्ती-अब्दुल्ला परिवारों के लिए सदैव राष्ट्र हित से पहले मजहबी और व्यक्तिगत हित रहे। सरकार में रहते उन्होंने अपने राजनीतिक पद का उपयोग आतंक को बढ़ावा देने और संरक्षण देने में किया, यह बात रुबैया सईद के अपहरण के समय साबित हो गई थी। असल में आम कश्मीरी आज उन्हें ही कश्मीरियत के शत्रु मानते हैं

 कश्मीर केंद्रित राजनीतिक दलों और नेताओं ने जम्मू-कश्मीर को 'इस्लामिक राज्य' बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। चित्र में महबूबा मुफ्ती के साथ मुफ्ती मोहम्मद सईद (फाइल चित्र)
रुबैया सईद का अपहरण मीडिया के एक विशेष वर्ग द्वारा विशेष प्रयोजन एवं नीति के प्रभाव में मात्र एक साधारण आपराधिक घटना के रूप में दिखाया जा रहा था। कथित रूप से एक लाचार पिता के पक्ष में माहौल तैयार किया गया था। इस सहानुभूति के वातावरण में रुबैया को किसी भी कीमत पर छुड़ाना आसान हो गया। जैसा कि मैंने पहले भी बताया है मु़फ्ती मोहम्मद सईद द्वारा न्यायाधीश मोती लाल भट को निजी हैसियत से एक राष्ट्रीय आपदा को सुलझाने के लिए तब बुलाना जब भारत की आंतरिक और बाह्य गुप्तचर एजेंसियां इस विषय को सुलझाने के समीप हों, एक असामान्य घटना थी। जिस प्रकार इस आतंकी घटना को सुलझाया गया वह साफतौर पर अपरिपक्वता अथवा किसी षड्यंत्र कि ओर स्पष्ट इशारा करती थी। 31 अगस्त, 2019 को 'द संडे गार्जियन' को दिये एक साक्षात्कार में भारत सरकार के तत्कालीन गृहमंत्री मु़फ्ती मोहम्मद सईद के कैबिनेट में साथी मोहम्मद आरिफ खान, जो इस स्थिति से निपटने के लिए भारत सरकार द्वारा बनाई गई मंत्रियों की कमेटी के सदस्य भी थे, ने कई चौंकाने वाले रहस्योद्घाटन किए।
जम्मू-कश्मीर में न्यायाधीश रहे मोती लाल भट इस्लामिक आतंकियों और अलगाववादियों को जल्द जमानत देने और उनसे सहानुभूति रखने के लिए बदनाम थे। उनके आतंकियों एवं जमात-ए-इस्लामी जैसे जिहादी संगठनों से संबंध सदैव चर्चा का विषय रहे। जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय से इसी आधार पर उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय स्थानांतरित किया गया था। ऐसे व्यक्ति का मध्यस्थता के लिए चयन और इस विषय पर पक्ष-विपक्ष द्वारा मौन उस समय की राजनीति में पैदा हुए खालीपन को दर्शाता है।
1989 में राष्ट्र और विश्व एक बड़े संकट से गुजर रहा था। राजनीतिक इस्लाम का अफगान जिहाद सफल हुआ था और भारत का विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय मित्र हार चुका था। जिहादी मनोबल आसमान छू रहा था। लेकिन तत्कालीन भारत सरकार इस सामरिक बदलाव से पूर्ण अनभिज्ञ थी। वह कश्मीर में बढ़ रहे इस्लामिक कट्टरपंथ और आतंक के कारणों का विश्लेषण करने में अक्षम थी। आरिफ मोहम्मद खान, जो अब केरल के राज्यपाल हैं, यहां तक बताते हैं कि जब सरकार ने आतंकियों को छोड़ने का निर्णय लिया, तो इसकी खबर भी आतंकियों को संभवत: मोती लाल भट द्वारा दी गई। संभवत: यह समाचार आतंकियों तक मोती लाल भट द्वारा मु़फ्ती के इशारे पर ही पहुंचाया गया होगा। इस खबर से आतंकी सामाजिक और सरकारी दबाव से मुक्त थे। उन्हें रुबैया को खाली छोड़ने की आवश्यकता न थी। यह घटनाक्रम साफतौर पर एक साजिश की ओर इशारा करती है। मु़फ्ती मोहम्मद सईद को आतंकियों को छोड़ने की जिस प्रकार की जल्दबाजी थी उतनी अपेक्षा तो स्वयं आतंकियों को भी न थी। मु़फ्ती शायद अपनी लड़की को छुड़ाने से अधिक आतंकियों को छोड़ने को उतावले और उत्सुक थे। यही कारण था कि रुबैया के छूटने से पहले ही आतंकियों को छोड़ दिया गया। कश्मीर का जनमत लड़की के अपहरण के विरुद्ध था। आतंकी लड़की को कुछ नहीं करेंगे, यह पूरा कश्मीर जानता था और लोग आश्वस्त भी थे। इसके पश्चात भी मु़फ्ती द्वारा अनभिज्ञता और अज्ञानता दर्शाना विश्वसनीय नहीं है। उस समय जिस प्रकार के निर्णय बिना राष्ट्रहित की चिंता के लिए जा रहे थे, वह आज भी सबको हैरान करते हैं। व्यक्तिगत हित राष्ट्र हित से बड़े थे। 1989 में भारत पहले से ही अनेक राष्ट्रीय समस्याओं जूझ रहा था। श्रीलंका से लेकर पंजाब और पूर्वोत्तर भारत तक आतंक और अलगाववाद फैलता जा रहा था और लोग इससे पीडि़त थे। कश्मीर में भी हालात चिंताजनक थे। इन सभी हिंसा में हिन्दू ही एकमात्र किसी न किसी रूप में पीडि़त पक्ष था। राजनीतिक और आर्थिक रूप से भारत एक बुरे दौर से गुजर रहा था। भारत के इन खराब हालात के बीच पाकिस्तान पेट्रो और यूएस डॉलर की सहायता से काफी सुदृढ़ स्थिति में था। वह अफगान जिहाद का विजेता बन चुका था। उसके पास विभिन्न देशों के हजारों जिहादी कश्मीर में 'गजवा-ए-हिन्द' के लिए तैयार थे। अंतरराष्ट्रीय सामरिक हालात पाकिस्तान के हक में थे। अमेरिका और पाश्चात्य देश उसके सामरिक और रणनीतिक साझेदार बन चुके थे। भारत का अकेला सामरिक मित्र सोविएत संघ अफगान युद्ध हारकर आर्थिक, सामाजिक और सैन्य मुश्किलों से गुजर रहा था। भारत की सभी आंतरिक परिस्थितियां शत्रु द्वारा उसके विरुद्ध किसी भी प्रकार के संघर्ष के लिए उपयुक्त थीं। इसीलिए पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष युद्ध छेड़ रखा था।
इन वैश्विक परिस्थितियों से क्या तत्कालीन भारत सरकार अनभिज्ञ थी, जो इस अपहरण की घटना और उसके बदले आतंकियों के छोड़े जाने के परिणामों की गंभीरता सोच नहीं पाई थी? क्यों इस समस्या को एक सामरिक और रणनीतिक सूझ-बूझ के साथ नहीं सुलझाया जा रहा था? क्यों तत्कालीन गृहमंत्री इस समस्या को अपनी व्यक्तिगत समस्या मानकर लड़ रहे थे? क्या भारत की इन विपरीत परिस्थितियों में वह भी पाकिस्तान के साथ खड़े होना अपने स्वार्थ के लिए उचित समझ रहे थे? यह सवाल आज भी जिंदा हैं और मुफ्ती परिवार को जवाब देने पर विवश करते हैं। उस समय प्रमुख धारा का सेकुलर मीडिया तो पिता-पुत्री के प्रेम की भावनात्मक कहानियां गढ़कर मु़फ्ती के लिए ऐसा जनमत तैयार कर रहा था, जिसमें वह बिना किसी नैतिक दबाव के रूबैया को छुड़ाने के लिए आतंकियों को रिहा कर सकें। क्या उस समय की यही थी जिम्मेदार पत्रकारिता?
कश्मीर का एक बड़ा वर्ग पाकिस्तान प्रेमी बन चुका था। अत: अनेक नेता भी उस राह का अनुसरण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कर रहे थे। 13 दिसंबर,1989 के दिन ने भारत को एक अति दुर्बल राष्ट्र की श्रेणी में ला खड़ा किया था। मु़फ्ती अपने मंत्रिमंडल के किसी भी सहयोगी की अपने पद से त्यागपत्र देने की सलाह को नहीं मान रहे थे, जिससे कि इस राष्ट्रीय आपदा से बिना किसी भय या भावना के लड़ा जा सके। परंतु कौन जानता था कि मु़फ्ती किसी अन्य साजिश के तहत कार्य कर रहे थे। आरिफ मोहम्मद खान ने उन्हंे इस विषय से दूर रहने और इस समस्या को सुलझाने की जिम्मेदारी भी किसी अन्य को देने के लिए कहा। फारुख अब्दुल्ला पर प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह, मु़फ्ती, कैबिनेट सचिव और गृह सचिव द्वारा रुबैया के बदले आतंकियों को शीघ्र छोड़ने का लगातार दबाव डाला जा रहा था। यह बात फारुख अब्दुल्ला ने मोहम्मद आरिफ खान को कश्मीर पहुंचते ही सबसे पहले बताई। उन्होंने चेतावनी देते हुए यह भी कहा था कि आतंकियों की इस मांग को मान लेने से कश्मीर में आतंक बढ़ेगा। कश्मीर की उन विपरीत परिस्थितियों में जब भारत सरकार द्वारा कठोर कदम उठाए जाने की आवश्यक ता थी, तब हमारे नेता घुटनों के बल बैठकर आतंकियों के सम्मुख आत्मसमर्पण करने जा रहे थे। यही आत्मसमर्पण आगे आत्महत्या सिद्ध होने वाला था। कश्मीर में हिन्दू नरसंहार जो धीरे-धीरे ही सही निरंतर चल रहा था। लेकिन कुछ ही सप्ताह में वह अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचा और 19 जनवरी, 1990 से आगे के 3 महीनों में 5 लाख से अधिक हिदुओं को कश्मीर से विस्थापित होना पड़ा। तब से लेकर आज तक कश्मीरी हिन्दू विस्थापन का दंश झेल रहे हैं। कश्मीर से हिन्दुओं के विस्थापन का परिणाम यह है कि आज ऋषि कश्यप की यह धरती दारुल इस्लाम के अनुसार चल रही है। मु़फ्ती-अब्दुल्ला परिवार सहित घाटी केंद्रित राजनीतिक दल तीन दशकों से अलगाववाद का राग अलाप रहे हैं लेकिन अनुच्छेद 370 हटने के बाद अब यह राग बेसुरा हो गया है। प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के कदम से सभी चित हो गए हैं।
कश्मीर में मैंने स्वयं अपनी तैनाती के दौरान कई कश्मीर निवासियों के मुंह से इस अपहरण कांड को एक षड्यंत्र बताते सुना। उन सबके कहने का सार था कि बिना युद्ध के सेनापति द्वारा आत्मसमर्पण करना यकीनन शंका खड़ी करता है। मुफ्ती ने वही कार्य किया था। भारत सरकार ने इस मुद्दे पर आरंभ से ही समर्पण की नीति अपना ली थी। वह आतंकियों के विरुद्ध किसी प्रकार के सैन्य अभियान की कल्पना भी संभवत: न कर पा रही थी।
कश्मीर की राजनीति पूर्ण रूप से इस्लामिक वैचारिकता से प्रेरित रही है। यही एक बड़ा कारण है कश्मीर में राजनीतिक दल और नेता जमात और मौलवियों से निर्देशित होते हैं। जमात का निर्देशन पाकिस्तान आईएसआई के माध्यम से प्रभावी रूप से करता है। अत: परोक्ष रूप से पाकिस्तान ही कश्मीर की राजनीति की दिशा और दशा तय करता आ रहा था। अलगाववादियों से लेकर आतंकियों तक सब पाकिस्तान के इशारों पर काम करते हैं। कश्मीर के चुनाव कभी भी पंथनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक व्यवस्था के रूप में होना संभव नहीं हो सकता। इसीलिए इस्लामिक कट्टरपन और तुष्टीकरण राजनीतिक मजबूरी है। कहीं मु़फ्ती भी अपने राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए यह षड्यंत्र तो नहीं रच रहे थे? 13 दिसंबर, 1989 के बाद कश्मीर में हिन्दू विरोधी हिंसा के लिए सीधे तौर पर मु़फ्ती और तत्कालीन सरकार जिम्मेदार है। 30 वर्षों के विस्थापन में तिल-तिल कर मरे कश्मीरी हिंदुओं की मृत्यु का जिम्मेदार आखिर और कौन होगा?
5 अगस्त, 2019 का दिन भारतीय इतिहास में कश्मीर पर लिए गए अभूतपूर्व निर्णायक फैसलों के लिए याद किया जाएगा। कश्मीर से अनुच्छेद 35 ए और अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी बनाने के साथ-साथ राज्य का बहुप्रतीक्षित पुनर्गठन करना एक साहसिक और राष्ट्रहित का कदम है। यही वे अनुच्छेद थे जिन्होंने कश्मीर को 'दारुल इस्लाम' बनाया। कश्मीर पर जिहादी गुंडागर्दी चलती रही। लोकतन्त्र को समाप्त कर कश्मीरी खिलाफत की स्थापना की गयी। कश्मीर में राज्य के 87 में से 46 विधानसभा क्षेत्र बनाए गए। राज्य के बड़े भू-भाग जम्मू को मात्र 37 विधानसभा क्षेत्रों से ही संतोष करना पड़ा क्योंकि यह हिन्दू बहुल क्षेत्र था। 19 जनवरी, 1990 को जो हुआ वह इसी अनुच्छेद का प्रतिफल था। यह समय भी अफगान जिहाद के समापन और एक महाशक्ति के पराजय का था तो आज फिर से परिस्थितियां भिन्न नहीं हैं। आर्थिक एवं वैश्विक महाशक्ति अमेरिका आज इस अफगान क्षेत्र से 1989 की भांति पुन: समस्या को निर्णायक रूप से सुलझाए बिना शीघ्र पलायन करना चाहता है। तालिबान और अमेरिका के मध्य वार्ता निर्णायक दौर पर पहुंच ही नहीं पा रही। लेकिन भारत के लिए अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता नितांत आवश्यक है। कश्मीर की शांति सीधे रूप में इससे जुड़ी हुई है। परंतु अब बदली हुई परिस्थितियों में शायद अफगानिस्तान, कश्मीर पर बहुत अधिक प्रभाव न डाल पाए क्योंकि अब कानून व्यवस्था सीधे तौर पर केंद्र सरकार के हाथों में है।
कश्मीर में अब जिहादी गतिविधियों को आसानी से रोका जा सकेगा, जो पहले इस्लामिक तत्वों द्वारा चुनी हुई सरकारों की ही देख-रेख में सम्पन्न होती थीं। कश्मीर की इस्लामिक खानदानी शासन व्यवस्था की नींव यदि शेख अब्दुल्ला जैसे कट्टर इस्लामिक नेता ने रखी थी तो उसको प्रश्रय देने का पूर्ण दोष नेहरू को जाता है। कश्मीर में सिकंदर से लेकर शेख तक सभी नेतृत्वकर्ता हिन्दू विरोधी हुए। वे इस्लाम के प्रति अपनी निष्ठा का प्रदर्शन खुल कर करते रहे। अत: मु़फ्ती ने भी यदि रूबैया सईद के अपहरण के माध्यम से कश्मीर में आधुनिक युग के हिन्दू नरसंहार को अंजाम दिया तो आश्चर्य करने जैसी बात कहां है! लेकिन अब बदला हुआ समय है। 'गजवा-ए-हिन्द' और कश्मीरियत के शत्रुओं पर अब न केवल नकेल कसेगी बल्कि कश्मीर की असल संस्कृति, परंपरा जीवंत होगी।