सेकुलर मीडिया का मायाजाल
   दिनांक 21-अक्तूबर-2019
 
 
श्रीराम मंदिर मामले में सेकुलर मीडिया द्वारा नए-नए झूठ गढ़ने की कोशिश लगातार जारी है
 
 
राम मंदिर पर फैसले की घड़ी करीब है। उम्मीद की जा रही है कि 500 साल पुराने इस विवाद का अंत होगा। हालांकि इस मामले पर भी मीडिया का रवैया नकारात्मक ही है। कुछ न्यूज चैनल अपने कार्यक्रमों में अधकचरे विशेषज्ञनुमा लोगों को मंच दे रहे हैं जिनकी भड़काऊ बातें माहौल खराब करने वाली हैं। कुछ मीडिया संस्थान इस तरह से माहौल बिगाड़ने के लिए कुख्यात रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकारी एजेंसियां उन पर नजर बनाए हुए होंगी। सर्वोच्च न्यायालय में आखिरी दिन की सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने साक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत किए गए नक्शे को फाड़ा तो एनडीटीवी, आउटलुक और कुछ अन्य वामपंथी मीडिया संस्थानों ने जो खबर दी उसमें यह छिपा लिया कि वकील का नाम क्या था। यह प्रवृत्ति जताती है कि ये मीडिया संस्थान वास्तव में पत्रकारिता के नाम पर कौन सा खेल खेल रहे हैं। यह बात भी सोचने की है कि अगर हिंदू पक्ष के वकील ने न्यायालय में ऐसी हरकत की होती तो क्या मीडिया इसके लिए पूरे हिंदू समाज को कलंकित करने की कोशिश नहीं करता?
राम मंदिर मामले में नए-नए झूठ गढ़ने की कोशिश भी लगातार जारी रही। यह झूठ भी मीडिया की मदद से ही फैलाया गया कि पुरातत्वविद केके मुहम्मद 1976 में राम जन्मभूमि स्थान पर खुदाई करने वाली टीम का हिस्सा थे ही नहीं। इस पर टाइम्स आॅफ इंडिया ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के उस दल के मुखिया रहे बी.बी. लाल का साक्षात्कार प्रकाशित कर दिया, जिसमें उन्होंने न सिर्फ पुष्टि की कि के.के. मुहम्मद उस दल में शामिल थे, बल्कि यह भी बताया कि वास्तव में एक विशाल मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी।
इस बीच, फर्जी नैरेटिव का वामपंथी खेल भी जारी है। कोई भी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी सर्वे के नाम पर दावा कर देती है कि भारत में भुखमरी की स्थिति पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी बदतर है। ऐसे सर्वे की विश्वसनीयता कितनी है यह किसी से छिपा नहीं है, लेकिन मीडिया इन्हें खूब तूल देता है। इशारों-इशारों में मंदिर और विकास के सभी प्रयासों को संदिग्ध ठहराया जाने लगता है। भुखमरी एक समस्या है, सरकारें उसके हल के लिए प्रयासरत हैं लेकिन इसके नाम पर ओछी पत्रकारिता भी चिंताजनक है। ऐसी ही पत्रकारिता का उदाहरण तब देखने को मिला था जब कुछ अखबारों ने छापा कि पार्ले-जी बिस्किट की कंपनी बड़े पैमाने पर छंटनी करने जा रही है और उसे घाटा हो रहा है। यह भ्रामक खबर उस दुष्प्रचार का हिस्सा थी जो इन दिनों मीडिया के जरिए चलाया जा रहा है। बीते सप्ताह कंपनी की बिक्री के जो ताजा आंकड़े सामने आए हैं, उनके अनुसार पार्ले-जी के लाभ में 15 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। क्या उन मीडिया संस्थानों के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए, जिन्होंने यह झूठ गढ़ा था?
बंगाल के मुर्शिदाबाद में एक परिवार के तीन लोगों और एक अजन्मे बच्चे की निर्मम हत्या जिस मुख्यधारा मीडिया को बड़ी खबर तक नहीं लग रही थी, वह बीते सप्ताह अचानक से महत्वपूर्ण हो गई। बंगाल पुलिस ने एक ‘आरोपी’ को पकड़कर हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने का दावा किया। दिल्ली के तमाम चैनलों और अखबारों ने बिना किंतु-परंतु के पुलिस के दावे को प्रसारित किया। पुलिस के दावे में ढेरों छेद हैं। पहली नजर में ही समझ में आता है कि असली दोषियों को बचाने की कोशिश हो रही है। लेकिन मजाल क्या जो किसी चैनल ने ममता सरकार से इस बारे में सवाल पूछे हों। आखिर मीडिया की क्या मजबूरी थी, जो ममता सरकार में हुए इस जघन्य कांड को छिपाने की कोशिश की गई?
महाराष्ट्र और हरियाणा में चुनाव हो रहे हैं। राहुल गांधी विदेश से छुट्टी मनाकर प्रचार के लिए लौटे। महाराष्ट्र में अपनी पहली ही रैली में उन्होंने जैसी बातें कीं, वे फिर से एक नेता के तौर पर उनकी योग्यता पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर गईं। राहुल गांधी ने चंद्रयान मिशन को अनुपयोगी बता डाला और राफेल विमान की पूजा की खिल्ली उड़ाई। लेकिन किसी चैनल या अखबार ने उनकी इन विचित्र बातों को शीर्षक नहीं बनाया। इसके बजाय राहुल गांधी के हवाले से कुछ ऐसी बातें गढ़ ली गईं, जो उन्होंने कही ही नहीं। आजतक चैनल ने गांधी परिवार के नमक का कर्ज यह कहते हुए चुकाया कि ‘राहुल गांधी फिर से पुराने फॉर्म में लौट चुके हैं’। एक चैनल ने बताया कि ‘राहुल गांधी ने अर्थव्यवस्था के सवाल पर मोदी सरकार को घेरा’। जबकि भाषण में ऐसा कुछ खास उन्होंने बोला नहीं था। लगता है जैसे समाचार संस्थानों पर कोई दबाव है कि वे राहुल गांधी की हास्यास्पद बातों को तूल न दें और उनकी बातों को  ‘आक्रामक तेवरों की वापसी’ की तरह दिखाया जाए। ल्ल
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