हरियाणा में भाजपा को जनता की चेतावनी
   दिनांक 25-अक्तूबर-2019
ऐसे परिणाम का सामान्य अर्थ यह होता है कि जनता सरकार से बहुत खुश तो नहीं है लेकिन सरकार के खिलाफ भी नहीं है। ऐसे जनादेश को एक तरह से जनता की चेतावनी कहा जा सकता है

हरियाणा के 90 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी 40 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। यहां सरकार बनाने के लिए सामान्य बहुमत का आंकड़ा 46 सीटों का है। तो क्या प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की खट्टर सरकार को जनता ने नकार दिया है? इस प्रश्न उत्तर जानने के लिए चुनावी इतिहास और आंकड़ों पर नजर डालने के साथ-साथ राजनीतिक समझ की भी जरूरत होगी।
गुरुवार को आये चुनावी परिणाम बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी को 90 में से 40 सीटें प्राप्त हुई हैं जबकि पिछले चुनाव में भाजपा ने 47 सीटें जीत कर सरकार बनायी थी। यानी भाजपा को दोबारा सरकार बनाने के लिए सामान्य बहुमत प्राप्त नहीं हुआ है। परिणामों के मुताबिक कांग्रेस को 31 सीटें, ओमप्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल को 1 सीट, चौटाला के बागी पौत्र दुष्यंत चौटाला की नवगठित पार्टी जननायक जनता पार्टी को 10 सीटें, गोपाल कांडा की हरियाणा लोकहित पार्टी को 1 सीट और निर्दलीयों को 7 सीटें मिली हैं। इन 7 विजयी निर्दलीयों में 5 ऐसे हैं जो भाजपा से टिकट न मिलने पर बागी होकर चुनाव मैदान में उतरे थे। इसके अलावा हरियाणा लोकहित पार्टी के गोपाल कांडा ने भाजपा को बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान किया है। इससे प्रदेश में दोबारा खट्टर सरकार बनने की राह साफ होती दिख रही है।
परिणामों से स्पष्ट है कि जनता ने भाजपा को भले ही सामान्य बहुमत न दिया हो (पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को सामान्य बहुमत ही प्राप्त हुआ था) लेकिन भाजपा के मुकाबले किसी अन्य दल पर भरोसा जताने में भी कोताही बरती है। ऐसे परिणाम का सामान्य अर्थ यह होता है कि जनता सरकार से बहुत खुश तो नहीं है लेकिन सरकार के खिलाफ भी नहीं है। ऐसे जनादेश को एक तरह से जनता की चेतावनी कहा जा सकता है। हालांकि हरियाणा के मामले में इस जनादेश के कुछ और अर्थ भी हैं।
किसी सत्ताधारी दल को नहीं मिला दोबारा बहुमत
यदि चुनावी नतीजों पर नजर डालें तो 80 के दशक से अब तक किसी सत्ताधारी दल को अगले चुनाव में दोबारा बहुमत नहीं मिला है। 1982 में कांग्रेस को 36 सीटें (37.58 प्रतिशत वोट), सोकदल को 31 सीटें (23.87%), भाजपा को 6 सीटें (7.67%) और निर्दलीयों को 16 सीटें (26.54%) मिली थीं। वर्ष 1987 में लोकदल को 60 सीटें (38.58%), कांग्रेस को 5 सीटें (29.18%), भाजपा को 16 सीटें (10.08%) और निर्दलीयों को 7 सीटें (18.54%) मिली थीं। वर्ष 1991 में कांग्रेस को 51 सीटें (33.73%), जनता पार्टी को 16 सीटें (22.03%), हरियाणा विकास पार्टी को 12 सीटें (12.54%), भाजपा को 2 सीटें (9.43%) और निर्दलीयों को 5 सीटें (13.73%) मिली थीं। वर्ष 1996 में हरियाणा विकास पार्टी को 33 सीटें (22.7%), समता पार्टी को 24 सीटें (20.6%), कांग्रेस को 9 सीटें (20.8%), भाजपा को 11 सीटें (8.9%) और निर्दलीयों को 10 सीटें (15.5%) मिली थीं। वर्ष 2000 में इनेलो को 47 सीटें (29.61%), कांग्रेस को 21 सीटें (31.22%), भाजपा को 6 सीटें (8.94%) और निर्दलीयों को 11 सीटें (16.9%) मिली थीं। वर्ष 2005 में कांग्रेस को 67 सीटें (42.46%), इनेलो को 9 सीटें (26.77%), भाजपा को 2 सीटें (10.36%) और निर्दलीयों को 10 सीटें (13.7%) मिली थीं। वर्ष 2009 में कांग्रेस को 40 सीटें (35.08%), इनेलो को 31 सीटें (25.79%), हरियाणा जनहित कांग्रेस को 6 सीटें (7.40%), भाजपा को 4 सीटें (9.04%) और निर्दलीयों को 7 सीटें (13.16%) मिली थीं। वर्ष 2014 में भाजपा को 47 सीटें (33.2%), इनेलो को 19 सीटें (24.1%), कांग्रेस को 15 सीटें (20.6.22%) और निर्दलीयों को 5 सीटें मिली थीं। वर्ष 2019 में भाजपा को 40 सीटें (36.49%), इनेलो को 1 सीट (2.44%), कांग्रेस को 31 सीटें (28.08%), जननायक जनता पार्टी को 10 सीटें (27.34%) और निर्दलीयों को 7 सीटें मिली थीं।
पहली बार सत्ताधारी पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ा
हरियाणा विधानसभा के लिए 1982 से अब तक हुए 9 विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो अब तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी सरकार को दोबारा जनादेश मिला हो। यह दूसरी बार हुआ है कि जब कोई सत्ताधारी पार्टी लगातार दूसरे चुनाव में बहुमत भले न प्राप्त कर सकी हो लेकिन सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी हो। इससे पहले 2009 के चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला था लेकिन वह सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी और उसने दोबारा सरकार बनायी। लेकिन यह पहली बार हुआ है कि किसी सत्ताधारी पार्टी का वोट प्रतिशत लगातार दूसरे चुनाव में बढ़ा हो। इस मायने में भाजपा के 2019 के प्रदर्शन को बेहतर की श्रेणी में रखा जा सकता है।
वर्ष 2014 के चुनाव से पहले हरियाणा में भाजपा के लिए 10 प्रतिशत वोट के निशान को छूना बड़ी बात होती थी। वर्ष 1982 से 2009 तक के चुनाव में भाजपा सिर्फ दो बार 10 प्रतिशत वोट के स्तर को मामूली रूप से पार कर पायी थी। इसीलिए जब 2014 में मोदी की आंधी में हरियाणा की जनता ने पहली बार भाजपा के पक्ष में जमकर वोटिंग की और उसे 33.2 प्रतिशत वोट देते हुए उसकी झोली में बहुमत से अधिक यानी 47 सीटें डाल दीं तो एकबारगी लगा कि यह जीत एक बार की जीत है। भाजपा द्वारा सरकार बनाये जाने पर मुख्यमंत्री पद के लिए जब नेता का चयन हो रहा था तो पार्टी में कोई ऐसा नेता नहीं था जिसके बारे में जनता या मीडिया कयास लगा सके कि यह नेता मुख्यमंत्री बन सकता है। ऐसे में संघ के प्रचारक रहे पहली बार विधायक चुने गये मनोहर लाल खट्टर के नाम पर भाजपा संसदीय बोर्ड ने मुहर लगायी। हरियाणा की राजनीति में जाट जाति के दबदबे से परिचित जानकार एकबारगी हड़बड़ा उठे थे। लेकिन 2019 के चुनाव में 2014 से भी 3.29% अधिक वोट प्रतिशत हासिल कर खट्टर ने जता दिया कि उनका चयन गलत नहीं था।
भाजपा से कहां हुई चूक
2019 के चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ा तो फिर यह बढ़े हुए वोट बढ़ी हुई सीटों और बहुमत में तब्दील नहीं हो पाये। हालांकि जनता ने किसी अन्य पार्टी को बहुमत के आसपास फटकने न देकर भाजपा को चेतावनी देकर बख्श दिया है। दरअसल इस चुनाव में भाजपा की कुछ कमजोरियां रहीं जिससे उसे बहुमत नहीं मिल पाया। खट्टर सरकार के सात मंत्रियों का चुनाव हार जाना बताता है कि पहली बार सरकार चलाने में उनकी अनुभवहीनता आड़े आयी। किसी मंत्री को अतीत में प्रशासनिक अनुभव नहीं था। वे जनता के मूड को समझने की बजाय आदर्शवादी कार्य करते रहे जो जनता के भविष्य के लिहाज से तो ठीक थे लेकिन जनता को उससे वर्तमान में फौरी राहत नहीं मिल रही थी। दूसरे, भाजपा को इस बार अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पर केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा अध्यक्ष की दोहरी जिम्मेदारी का भी असर झेलना पड़ा। गृह मंत्रालय के गंभीर कामकाज और संसद के सत्रों में जवाबदेही के कारण अमित शाह की व्यवस्तताएं काफी बढ़ गयी हैं। इससे टिकट वितरण से लेकर पूरे चुनाव अभियान में छोटी-छोटी चूकें होती गयीं। टिकट वितरण में एक बड़ी चूक का प्रमाण यह है कि टिकट कटने पर जो भाजपा नेता बागी होकर चुनाव मैदान में उतरे, उनमें पांच को विजय मिली। एक बहुत बड़ा कारण भाजपा में अति-आत्मविश्वास भी कहा जा सकता है। नीति शिक्षा कहती है कि प्रतिद्वंद्वी को कभी कमजोर न समझें। लेकिन अति-आत्मविश्वास की वजह से आखिरी वक्त तक सीट-दर-सीट के लिए भिन्न रणनीति बनाकर जुटे रहने में चूक हुई। एक कारण स्थानीय मुद्दों पर फोकस न होना भी कहा जा रहा है। दरअसल, हरियाणा प्रदेश में भाजपा की ओर से जो राष्ट्रवाद के मुद्दे उठाये जा रहे थे, प्रमुख प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व भले ही उसके खिलाफ दिख-बोल रहा हो लेकिन कांग्रेस के स्थानीय सिपहसालार भूपिंदर सिंह हुड्डा ने राष्ट्रवादी मुद्दों के पक्ष में अपना रुख दिखा कर बचाव कर लिया।
दुष्यंत की मजबूती की थाह से अनभिज्ञ
हालांकि इसके बावजूद भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ना यह बताता है कि जनता का भरोसा तो बढ़ा है लेकिन कुछ समीकरणों की वजह से यह वोट प्रतिशत सीटों में तब्दील नहीं हो पाया। इसमें एक महत्वपूर्ण कोण इनेलो के सर्वेसर्वा चौटाला परिवार की तीसरी पीढ़ी के दुष्यंत चौटाला की बगावत है। दुष्यंत चौटाला ने आखिरी समय में बगावत कर जननायक जनता पार्टी नाम से अपनी पार्टी बनायी। इस बगावत के कारण इनेलो और दुष्यंत की जननायक जनता पार्टी में मजबूत कौन है, इसकी थाह किसी को नहीं लगी। विरोधी आमतौर पर चौटाला परिवार की मूल पार्टी इनेलो पर फोकस करते रहे जबकि दुष्यंत चौटाला ने एक तरह से इनेलो की पूरी जमीन अपनी तरफ कर ली। दुष्यंत ने जमीन तो अपनी तरफ कर ली लेकिन वे चुनावी समीकरण में अपनी स्थिति के बारे में जनता में कोई प्रदेशव्यापी हवा बना पाने में असमर्थ रहे जिससे भाजपा विरोधी वोट कांग्रेस के पक्ष में एकजुट हो गये जिसके परिणामस्वरूप भाजपा को कुछ सीटों के नुकसान से बहुमत से पीछे रहना पड़ा।