बगदादी मरा है, ज़हर अभी भी जिंदा
   दिनांक 29-अक्तूबर-2019
बगदादी मारा गया , पर बगदादी का अंत आतंक का अंत नहीं है. इस्लामिक स्टेट अभी भी अस्तित्व में है. भौतिक और वैचारिक रूप से आज भी मजबूत है.


आखिरकार बगदादी को वो मौत मिली जिसका वो हकदार था. उत्तर-पश्चिम सीरिया के अपने ठिकाने में परिवार के साथ छिपा बगदादी यूएस स्पेशल फोर्सेज के जवानों के रूप अचानक सामने आ खड़ी हुई मौत को देख चीखा-चिल्लाया, और आखिरकार एक सुरंग में बदहवास भागते हुए उसने खुद को आत्मघाती विस्फोट करके उड़ा लिया. साथ में अपने तीन बच्चों को भी ले मरा. उसके बचे हुए अवशेषों की डीएनए जांच के बाद पुष्टि हो गई कि वो बगदादी ही था.
बगदादी ने दुनिया को मध्ययुग की अनेक नृशंस वास्तविकताओं के दर्शन करवाए. बगदादी ने अरब जगत में एक दूसरे के खिलाफ उबल रही नफ़रत को भी मानचित किया. सबसे बढ़कर, उसने जिहाद की उस विस्फोटक विचारधारा को दुनिया के सामने रखा, जो आज भी लाखों अनाम बगदादियों की नसों में दौड़ रही है.
बगदादी आधुनिक युग का सबसे दुर्दांत इस्लामी आतंकी था. कुख्यात ओसामा बिन लादेन ने अल कायदा के नाम से एक जिहादी तंजीम बनाई थी जो दुनिया भर के जिहादियों को संसाधन मुहैया करवाती रही. अल कायदा अरब जगत से पेट्रो डॉलर खींचकर जिहादी बारूद फैक्ट्रियों में झोंकता. हर बड़ी खुराफात के पीछे उसका समर्थन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दिखता. लेकिन उसकी कोई जमीन नहीं थी, न आज है. इसके उलट बगदादी ने धरती पर अपना इस्लामी राज्य कायम किया. इस्लामी सरकार बनाई. अपने कब्जे के इलाकों में लोगों को उन तौर तरीकों से रहने पर मजबूर किया, जी भरकर मौत बांटी, प्राचीन इमारतों, कलाकृतियों को नष्ट किया. समलैंगिकों को मौत के घात उतारा. महिलाओं को बुर्के से चेहरा दिखने या पुरुषों को दाढ़ी न रखने के जुर्म से सार्वजनिक रूप से सजा ए मौत दी गई. 40 हज़ार यज़ीदी महिलाओं और मासूम बच्चियों के साथ सालों बलात्कार किया गया.
बगदादी की तंजीम , लादेन की तुलना में, पाकिस्तान पोषित अफगान तालिबान के ज्यादा समकक्ष थी, जिन्होंने एक दशक तक अफगानिस्तान पर कब्जा बनाए रखा. लेकिन इस्लामिक स्टेट उससे ज्यादा आधुनिक, बहुत ज्यादा संसाधन संपन्न और बेहद तेजी से कारवाई करने वाला संगठन साबित हुआ. इस्लामिक स्टेट ने किसी भी अन्य जिहादी आतंकी संगठन की तुलना में दुनिया का सबसे ज्यादा ध्यान खींचा. उसने मीडिया के प्रचलित माध्यमों का आक्रामकता से इस्तेमाल किया और सारी दुनिया से जिहाद के नाम पर मुस्लिम युवाओं और युवतियों को आकर्षित करने में सफल रहा. यही बात इसे सबसे ज्यादा खतरनाक बनाती है.
भारत, अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, बंग्लादेश, फिलीपींस आदि से जो नौजवान इस्लामिक स्टेट के गिरोह में शामिल होने पहुंचे, या जिन्होंने इस्लामिक स्टेट के आह्वान पर अपने शहरों में गैर मुस्लिमों के नरसंहार किए, उपासना स्थलों पर हमले किए, वो मदरसों में से पढ़कर निकले युवा नहीं थे. वो पढ़े-लिखे, कई मामलों में कामकाजी-व्यवसायी और घर-परिवार वाले यहाँ तक कि अनेक बच्चों के माता-पिता थे.
इस्लामिक स्टेट का जिक्र निकलने पर लोगों की आंखों के सामने चाक़ू से अपने बंदियों का गला रेतते जिहादी याद आते हैं, या ऊंची इमारतों से हाथ-पैर बांधकर फेंके जाते लोग अथवा गले में विस्फोटक बांधकर – बंद पिंजरों में डुबाकर मारे जाते लोग याद आते हैं. ये सब सीरिया की धरती या पश्चिमी ईराक में हो रहा था. लेकिन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भी इस्लामिक स्टेट का झंडा लिए जिहादी अपने ही शहर की सड़कों, क्लबों, मॉल और रेस्त्रां में कहर बरपा रहे थे. ये लोग इस्लामिक स्टेट की ऑनलाइन भर्ती का हिस्सा थे.
याद करें 26 जून 2015 को 26 जून को ट्यूनीशिया के बहुत सारे सुन्दर पर्यटन स्थलों में से एक पोर्ट अल कंतोई पर भयानक आतंकी हमला हुआ। हमला करने वाले शख्स ने चुन चुनकर पश्चिमी देशों से आये पर्यटकों को निशाना बनाया। 39 लोग मारे गए। इसके पहले 18 मार्च को राजधानी ट्यूनिस के एक प्रमुख केंद्र बरदो संग्रहालय पर भी जिहादी हमला हुआ था , जिसमें मारे गए 24 लोगों में से 20 विदेशी पर्यटक थे। इसी माह कुवैत की शिया मस्जिद पर हमला करके दर्जनों शियाओं को मौत के घात उतारा गया. मार्च 2016 में बेल्जियम के मेट्रो स्टेशन और एयरपोर्ट पर हुए आतंकी हमले में 32 ओग मारे गए, और 340 घायल हुए. जून 2016 में तुर्की के अतातुर्क में इस्लामिक स्टेट से जुड़े आतंकियों ने 45 लोगों को मार डाला. इसी जून में अमेरिका के एक नाइट क्लब में ओमर मतीन नामक अमेरिकी ने 49 लोगों को गोलियों से भून डाला.
जुलाई 2016 बंग्लादेश की राजधानी ढाका में 5 स्थानीय युवाओं ने एक कैफे पर हमला बोला और 24 लोगों की हत्या कर दी. जुलाई 2016 में ही फ्रांस के नीस में 31 वर्षीय मोहम्मद बोहेल एक 19 टन वजनी कार्गो ट्रक को लेकर उत्सव मनाते फ्रेंच लोगों की भीड़ में घुस गया और 86 लोगों को कुचल कर मार डाला, 434 को घायल कर दिया. इसी जुलाई में काबुल में दो आत्मघाती हमलवारों ने आत्मघाती बेल्ट में विस्फोट कर 80 नागरिकों को मार डाला, और 230 से अधिक को घायल कर दिया. अप्रैल 2017 में दो चर्चों में किए गए धमाकों में 49 जानें गईं, 136 घायल हुए. मई 2017 में ब्रिटेन के मैनचेस्टर एरीना में एक कॉन्सर्ट में गोलीबारी हुई जिसमें 22 मारे गए. इसी माह फिलिपीन्स के मरवाई में 593 लोग मारे गए. अप्रैल 2019 में श्रीलंका में तीन चर्चों में हुए हमलों में 259 लोग मारे गए. 500 घायल हुए. सारी दुनिया इस प्रकार के डेढ़ सौ के लगभग हमले हुए हैं.
इन हमलों में से अधिकाँश में आतंकियों का इस्लामिक स्टेट से सीधा संपर्क नहीं आया था. ये लोग इस्लामिक स्टेट के प्रचार वीडियो या जाकिर नाइक, हाफ़िज़ सईद, सिमी के भटकल जैसे लोगों की बातों से प्रभावित होकर दुनिया में ‘इस्लामी खिलाफत’ कायम करने निकले थे. हथियार ही उन्होंने खुद ही जुटाए. उनका मकसद था अधिक से अधिक ‘काफिरों’ को मारना और दहशत फैलाना. गौर से देखने पर पता चलता है कि काफिर की व्याख्या, जिहाद का महिमामंडन और सारी दुनिया पर इस्लामी हुकूमत कायम करने की सनक और इस्लामी श्रेष्ठता का विचार ही असली हथियार है, जिससे दुनिया को खतरा है. आतंकवाद कट्टरता की खुराक पर पलता है. आखिर हाफ़िज़ सईद, लखवी या अल जवाहिरी लड़ाके तो नहीं हैं, लेकिन इन्हें बर्बर आतंकवादी बनाती है वो जिहाद की वो खुराक, जो ये लोग किशोर-युवा मुस्लिमों के दिमाग में उंडेलते हैं. हर वो शख्स खतरनाक है जो ये कहकर जिहाद के लिए मुस्लिमों को उकसाने की कोशिश करता है कि एक दिन दुनिया में सिर्फ कुरआन को मानने वाले बचेंगे और हर मुस्लिम का फ़र्ज़ है कि वो गैर मुस्लिमों के खिलाफ जिहाद करे. ऐसा हर आदमी शांति के लिए ख़तरा है, भले ही वो स्वयं एक चींटी भी न मारता हो. आतंकवाद से दुनिया को बचाने के लिए आतंक के विचार को समाप्त करना ज़रूरी है. बगदादी का अंत आतंक का अंत नहीं है. इस्लामिक स्टेट अभी भी अस्तित्व में है. भौतिक और वैचारिक रूप से आज भी मजबूत है.