मुफ्ती मोहम्मद सईद के गृहमंत्री बनते ही कश्मीर में फैल गया था आतंकवाद
   दिनांक 03-अक्तूबर-2019
 ले. कर्नल (से.नि.) आदित्य प्रताप सिंह
अपनी बेटी रुबैया के अपहरण के बाद कुख्यात आतंकियों को जेल से रिहा करने वाले मुफ्ती मोहम्मद सईद के देश के गृह मंत्री के नाते रहे कार्यकाल पर एक बड़ा सवाल खड़ा है। देश की सुरक्षा का दायित्व ऐसे व्यक्ति के हाथ में देना सवाल खड़े करता है जिसकी पृष्ठभूमि आतंक को पोसने वाले की रही हो

'अपहरण' के बाद रिहा हुई रुबैया के साथ मुफ्ती मोहम्मद सईद (फाइल चित्र)
भारत के केन्द्रीय गृह मंत्री रहे मुफ्ती मोहम्मद सईद का जन्म 12 जनवरी 1936 को जम्मू-कश्मीर में अनंतनाग के बिजबेहड़ा कस्बे में हुआ था। दक्षिण कश्मीर का यह स्थान कश्मीर में आतंक का गढ़ रहा है। इस क्षेत्र को इस्लामिक आतंक का गढ़ बनाने में मु़फ्ती परिवार का अहम योगदान रहा। इन्होंने आतंक की कई पीढि़यों को सामाजिक, राजनीतिक और मजहबी सहयोग से फलने-फूलने दिया। बुरहान वानी से लेकर पुलवामा के आत्मघाती इस्लामिक आतंकी अहमद डार तक इस क्षेत्र में छोटे अपराधों से शुरुआत कर आतंक के सरगना तक का सफर निर्बाध रूप से यूं ही नहीं करते रहे। पुलवामा के आत्मघाती आतंकियों के सहयोग और पत्थरबाजी की पुलिस प्राथमिकी तक दर्ज नहीं की जाती थी। ऐसे ही कश्मीर के अनेक युवा जिहादी विचारधारा से प्रभावित होकर मु़फ्ती जैसे कट्टर सोच के मुस्लिम नेताओं के नैतिक समर्थन से जिहादी या इस्लामिक आतंकी बन रहे हैं।
महत्वाकांक्षी मुफ्ती
मुफ्ती मोहम्मद सईद की राजनीतिक यात्रा 1950 के दशक में डेमोक्रेटिक नेशनल कॉन्फ्रेंस से आरंभ हुई, जो नेशनल कॉन्फ्रेंस से अलग हुआ एक धड़ा था और जो 1960 के दशक में वापस उसी में विलय हो गया। मुफ्ती 1962 में पहली बार बीजबहरा से विधानसभा सदस्य निर्वाचित हुए थे। 1965 में उनके दल का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय होने के बाद वह भी कांग्रेस के सदस्य हो गए और 1987 तक उसी पार्टी में ही रहे। 1972 में कैबिनेट मंत्री और तत्पश्चात कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे।
1986 में वह जम्मू-कश्मीर के पर्यटन मंत्री बनाए गए, पर उनका दिल जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ही अटका रहा। वह चाहते थे कि राजीव गांधी जी.एम. शाह को हटाकर उन्हंे मुख्यमंत्री बना दें। पर ऐसा न हो सका अत: नाराज होकर वह पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की पार्टी जनता दल में शामिल हो गए। जब जनता दल की केंद्र में सरकार बनी तब वह 2 दिसंबर 1989 को भारतीय संघ के पहले मुस्लिम गृह मंत्री बने और 10 नवंबर तक उस पद पर रहे। उनका गृह मंत्री का कार्यकाल कश्मीर में हिन्दू नरसंहार और हिन्दू विस्थापन के लिए कुख्यात रहा। जब 1991 में कांग्रेस पुन: सत्ता में आई तो वह फिर कांग्रेस में पी.वी. नरसिंह राव के साथ आ गए, किन्तु कांग्रेस के सत्ता में न रहने पर उन्होंने जुलाई 1999 में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) का गठन किया।
जम्मू-कश्मीर में 2003 के विधानसभा चुनावों में 18 सीटें जीतकर वह कांग्रेस से गठबंधन करके पहली बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उनके 3 वर्ष के मुख्यमंत्री कार्यकाल में इस्लामिक आतंकियों को सरकार की जैसे शह मिल गई थी। उनके द्वारा नियंत्रण रेखा पर आरंभ किए गए व्यापार से कश्मीर में आतंकियों को कथित धन जुटाने में बहुत सहायता मिली। उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल में उठाए गए अधिकतर कदम कश्मीर में इस्लामिक अलगाववाद को बढ़ावा देने वाले थे। उन्होंने जम्मू-कश्मीर पुलिस के विशेष अभियान दल (एसओजी) की स्वायत्तता को खत्म कर उसका प्रभाव घटाने की कोशिश की, क्योंकि वह इस्लामिक आतंक के विरुद्ध प्रभावी रूप से काम कर रहा था।
आतंक का पोषण
उनका दूसरा कार्यकाल मार्च 2015 में भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन से शुरू हुआ। गठबंधन धर्म से छल करते हुए उन्होंने दक्षिण कश्मीर को कश्मीर के आतंक का कथित मुख्यालय बना दिया, जहां बुरहान वानी जैसे आतंकी सरगना पैदा होकर फलने-फूलने लगे। उनकी और उनके परिवार की सहानुभूति आतंकियों के साथ ही रही। जनवरी 2016 में उनकी आकस्मिक मृत्यु ने उनकी राजनीतिक जीवन यात्रा पर विराम लगा दिया। मु़फ्ती मोहम्मद सईद का साठ साल से भी अधिक लंबा राजनीतिक सफर राजनीतिक अवसरवादिता वाला ही रहा।  1986 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने रामजन्म भूमि मंदिर का ताला खुलवाया तब उसके परिणामस्वरूप देश के अनेक मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हिदुओं के विरुद्ध जिहाद की घोषणा कर, हिंसा की गयी। लूटपाट,आगजनी और हत्याओं का सिलसिला चला। जम्मू-कश्मीर में भी इसकी प्रतिक्रिया हुई, परंतु सर्वाधिक हिंसा मु़फ्ती के गृह क्षेत्र अनंतनाग में हुई, जहां जिहादियों ने हिंदुओं के घरों और धार्मिक स्थलों को तहस-नहस कर दिया। इस हिंसा को हवा देने वाले मु़फ्ती मोहम्मद सईद स्वयं थे। इसकी पुष्टि करते हुए कारवां पत्रिका में प्रवीण डोंथी अनेक विश्वस्त सूत्रों का हवाला भी देते हैं, जिनमें मु़फ्ती के सहयोगी अनेक राजनेता भी थे। विस्थापित कश्मीरियों की संस्था 'पनुन कश्मीर' के अध्यक्ष अजय कुमार श्रृंगु ने दावा किया कि कांग्रेस की स्वयं की जांच ने भी मु़फ्ती मोहम्मद सईद को हिंसा का दोषी पाया था। किन्तु यह जांच रपट सार्वजनिक नहीं की जा सकती थी। कश्मीर में यह बात खास से लेकर आम तक, सब के लिए सामान्य ज्ञान की बात थी कि इस हिंसा के मुख्य सूत्रधार मु़फ्ती ही थे। उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ही इस हिंसा की जननी थी।
ज्यादातर कश्मीरी मुस्लिम नेताओं के लिए हिन्दू सिर्फ 'काफिर' था, जिसके जीवन का मूल्य कुछ भी नहीं था। आज जो कश्मीरी मुस्लिम नेता हिन्दू राष्ट्रवाद से डरे हुए हैं वे कश्मीर घाटी में हिंदुओं की वापसी का विरोध करते हुए तनिक भी संकोच नहीं करते हैं। कश्मीर के कट्टर सामाजिक, मजहबी और राजनीतिक वर्गों द्वारा 2016 में भी हिंदुओं के लिए सुरक्षित बस्तियां बनाए जाने का खुलकर हिंसक विरोध किया गया था। उस समय मुफ्ती मोहम्मद की पुत्री महबूबा मु़फ्ती मुख्यमंत्री थीं। भीड़ ने तब हिंदू विस्थापितों के शिविरों को निशाना बनाकर पथराव किया था।
मुफ्ती कैसे बने गृह मंत्री !
मु़फ्ती मोहम्मद सईद अपनी इस पृष्ठभूमि के साथ भी एक पंथनिरपेक्ष हिन्दू बहुल राष्ट्र के गृह मंत्री बनाए जाते हैं। खेदजनक है कि यही मुस्लिम तुष्टीकरण भारतीय लोकतंत्र में 'पंथनिरपेक्षता' का मानक है। मु़फ्ती मोहम्मद सईद और उनके परिवार के लिए इस्लामिक प्रतिबद्धता सदैव अग्रणी रही। उनका परिवार अनाधिकृत एवं सामाजिक रूप से सदैव पाकिस्तान एवं कश्मीर की आजादी का समर्थक रहा है। उनकी पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति को उनके बयानों में हमेशा अनुभव किया जा सकता है। महबूबा कश्मीर में मारे गए हर इस्लामिक आतंकी के घर संवेदना व्यक्त करने जाती हैं। क्या वह कभी किसी शहीद सैनिक के घर गईं? नहीं। क्या है इन लोगों की निष्ठा? क्या ये लोग राष्ट्र के प्रति कभी समर्पित होंगे? 2014 के आम चुनाव, चुनाव आयोग और सुरक्षा बलों के परिश्रम से शांतिपूर्ण तरीके से सम्पन्न हुए, परंतु मु़फ्ती धन्यवाद पाकिस्तान को दे रहे थे। यहां उनका पाकिस्तानी से प्रेम स्पष्ट देखा जा सकता था। मु़फ्ती मोहम्मद सईद भी उसी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विद्यार्थी रहे जो इस वहाबी विचारधारा का जनक माना जाता है। पाकिस्तान राष्ट्र नहीं अपितु मात्र एक इस्लामिक अलगाववादी विचारधारा है। अत: जब कोई भी कश्मीरी मुसलमान 'पाकिस्तान जिंदाबाद' के नारे लगाता है तो वह एक प्रकार से उस विचारधारा को सदैव जीवंत रखने की बात कर रहा होता है।
यहां पर मु़फ्ती मोहम्मद सईद के चरित्र को एक कट्टर मजहबी कश्मीरी मुसलमान के रूप में समझना आवश्यक है, तभी उनके कार्यों और उसके परिणामों की प्रभावी समीक्षा संभव है। 1980 के दशक में कश्मीर के इस्लामीकरण की साजिश की शुरुआत के बाद के हालात में क्या एक कश्मीरी मुसलमान की निष्ठा को पाकिस्तान आसानी से प्रभावित नहीं कर सकता था? क्यों उस समय प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह ने मु़फ्ती को गृह मंत्री बनाने से पहले उनकी पृष्ठभूमि की समीक्षा की कोई आवश्यकता नहीं समझी?
मु़फ्ती मोहम्मद सईद 2 दिसंबर 1989 को भारत सरकार के गृह मंत्री की शपथ लेकर राष्ट्र के प्रथम मुस्लिम गृह मंत्री बनने का गौरव प्राप्त करते हैं। परंतु 1986 में मंत कश्मीर राज्य का मुख्यमंत्री न बन पाने की पीड़ा इस खुशी से अधिक थी। उस समय उनके एकमात्र राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी फारुख अब्दुल्ला प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। जम्मू-कश्मीर के हालात दिन-ब-दिन बद से बदतर हो रहे थे। कश्मीर पर धीरे-धीरे पाक प्रायोजित इस्लामिक आतंकियों का आधिपत्य हो चुका था। कश्मीर की अधिकांश घडि़यां तक पाकिस्तान के समय से मिलाई जा चुकी थीं। कश्मीर के अनंतनाग में जो आग मु़फ्ती ने फरवरी 1986 में लगाई थी, वह अब विकराल रूप धारण कर चुकी थी। 'निजाम-ए-मुस्तफा' स्थापित करने के लिए इस्लामिक आतंकियों द्वारा चुन-चुनकर हिन्दू नरसंहार किया जा रहा था, परंतु यह हिन्दू राष्ट्र मौन था। जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार को तो वैसे भी हिंदुओं के जीवन से कोई सरोकार नहीं था। कश्मीर में कोई हिन्दू सुरक्षित नहीं था। संभ्रांत हिंदुओं की हत्याएं रोजाना की बात बन चुकी थी। अनेक नामचीन हिन्दू राजनेता, अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता इस्लामिक आतंकवाद की भेंट चढ़ चुके थे। वर्षों से चल रहे इस हिन्दू नरसंहार के लिए जिम्मेदार एक भी इस्लामिक आतंकी को पुलिस-प्रशासन के द्वारा चिन्हित कर पकड़ा नहीं गया था। इन आतंकियों को आम और खास सभी जानते थे, किन्तु उनके खिलाफ बोलने वाला कोई न था। कश्मीर का सरकारी कर्मचारी वर्ग खासकर 'कश्मीर के पाकिस्तान में विलय' को जल्द यथार्थ में बदलने के सपने देख रहा था। दिसम्बर 1989 तक तो घाटी की सुरक्षा व्यवस्था पूर्णरूप से धराशायी हो चुकी थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला को कश्मीर के हालात से कोई विशेष सरोकार नहीं रह गया था। वह दिसम्बर, 1989 में विदेश भ्रमण पर निकल गए थे।

 
 जनवरी 2019 में कश्मीर में सुरक्षाबलों के हाथों मारे गए एक आतंकवादी के घर जा पहुंची थीं तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, जिस पर पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट कर टिप्पणी की थी (ऊपर दाएं)
 रुबैया का 'अपहरण'!
कश्मीर की आंतरिक सुरक्षा की स्थिति किसी से छिपी नहीं थी। मु़फ्ती मोहम्मद सईद एक पुराने और कद्दावर नेता थे। वे कई बार विधानसभा और राज्यसभा के सदस्य से लेकर कैबिनेट मंत्री तक रहे थे। भारत सरकार में गृह मंत्री बनने के बाद उन्हें और उनके परिवार की सुरक्षा कैसे होनी है, यह उनका ही विषय था। फिर उनकी बेटी की सुरक्षा में 'चूक' का जिम्मेदार कौन था? जिस प्रकार कश्मीर में किसी भी सैनिक को बाहर अकेले जाने की आज्ञा सुरक्षा कारणों से नहीं दी जाती है, फिर भारत के गृह मंत्री की पुत्री का उन हालात में अकेले श्रीनगर यात्रा करना किस प्रकार उचित अथवा सुरक्षित था, यह सूक्ष्म समीक्षा का विषय है।
मु़फ्ती मोहम्मद सईद की तीसरी लड़की डाक्टर रुबैया सईद 1989 में कश्मीर स्थित ललदद मेमोरियल महिला अस्पताल, श्रीनगर में इंटर्नशिप कर रही थी। वह स्थानीय परिवहन से घर से अस्पताल आना-जाना करती थी। सामान्य हालात में एक साधारण बेटी का यूं यात्रा करना कोई बड़ी बात नहीं है, किन्तु गृह मंत्री की लड़की का कश्मीर के उन हालातों में यूं चलना असामान्य था। प्रतिदिन की भांति ही 8 दिसंबर 1989 को भी रुबैया सईद घर से मिनी बस में बैठकर अस्पताल गयी और उसी प्रकार दोपहर बाद वापस आने के लिए जब वह मिनीबस में चढ़ी तब उसके साथ पांच अन्य लोग भी सवार हुए, गुलाम हसन, मुश्ताक लोन, इकबाल गांद्रू, मेराजुद्दीन मुस्तफा और सलीम उर्फ 'नाना जी'। ये सभी आतंकी और रुबैया के तथाकथित अपहरणकर्ता थे। नवगाम (श्रीनगर का बाहरी इलाका) से थोड़ा पहले ही बस को अपहृत कर एक सुनसान जगह ले जाया गया, जहां पहले से ही एक नीले रंग की मारुति कार में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के आतंकी इन लोगों का इंतजार कर रहे थे। वहां रुबैया सईद को उस कार में बिठाया गया। कार में यासीन मलिक, अश्फाक वानी माजिद और गुलाम हसन भी बैठे, कार को राज्य औद्योगिक विकास निगम का कर्मचारी अली मोहम्मद मीर चला रहा था। रुबैया सईद को पहले दिन सोपोर के एक सरकारी इंजीनियर जावेद इकबाल के घर पर रखा गया। तत्पश्चात, 9 दिसंबर से 13 दिसंबर तक उसे सोपोर के ही एक बड़े व्यवसायी मोहम्मद याकूब के घर पर रखा गया। यह दर्शाता है कि किस प्रकार से समाज के जिम्मेदार और प्रतिष्ठित लोग इस्लामिक आतंकियों का साथ भय अथवा विचारधारा के आधार पर दे रहे थे। यासीन मलिक और अश्फाक माजिद वानी बेखौफ श्रीनगर में बैठकर तत्कालीन केन्द्र सरकार से रुबैया के बदले आतंकियों के छोड़े जाने की सौदेबाजी कर रहे थे।
जिस प्रकार से यह घटनाक्रम घटित हुआ उससे राज्य की कानून व्यवस्था का आकलन आसानी से किया जा सकता है और उस वक्त समाज में आतंकियों के प्रति हमदर्दी को भी समझा जा सकता है। क्या इन हालात की जानकारी देश की गुप्तचर एजेंसियों को नहीं थी कि वे गृह मंत्री को उनके अपने परिवार की सुरक्षा को चाक-चौबन्द करने की सलाह देते? या उनकी ऐसी तमाम सलाह की उपेक्षा की गयी थी? निश्चित मुफ्ती मोहम्मद सईर्द के देश के गृहमंत्री के नाते रहे कार्यकाल पर यह एक बड़ा सवाल खड़ा है। देश की सुरक्षा का दायित्व ऐसे व्यक्ति के हाथ में देना भी सवाल खड़े करता है जिसकी पृष्ठभूमि आतंक को पोसने वाले की रही हो।