नवरात्र विशेष: शक्ति संचय का अनूठा साधनाकाल
   दिनांक 03-अक्तूबर-2019
            पूनम नेगी 
 
 
 
हमारी सनातन वैदिक संस्कृति के पर्व-त्योहारों की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि पूजा- उपासना व विविध धार्मिक कर्मकांडों से सजे ये आयोजन आत्मिक उत्कर्ष के साथ सामाजिक समसरता का भी बड़ा सन्देश देते हैं। भारतीय तत्ववेत्ताओं ने जीवन को इसी रूप में परिभाषित किया है। चेतना के क्षेत्र में सुसंस्कारिता का संम्वर्धन हमारे देवपर्वों का युगों-युगों से कार्यक्षेत्र रहा है। निर्मल आनन्द के पर्याय हमारे सांस्कृतिक पर्व वस्तुत: लोकजीवन को देवजीवन की ओर उन्मुख करते हैं। इन पर्वों में प्रमुख है "नवरात्र"। हिन्दू दर्शन में "नवरात्र" को सर्वाधिक फलदायी साधनाकाल माना जाता है। जिस प्रकार ईश्वर की आराधना के लिए प्रात:काल की ब्रह्मबेला सर्वोत्तम मानी जाती है, ठीक उसी तरह नवरात्रिक साधना काल (चैत्र व आश्विन) को अध्यात्म के क्षेत्र में विशिष्ट मुहूर्त की मान्यता प्राप्त है। ऋतु परिवर्तन की यह बेला वस्तुत: साधना के द्वारा शक्ति संचय की मानी जाती है। आत्मिक प्रगति के लिए वैसे तो किसी अवसर विशेष की बाध्यता नहीं होती लेकिन नवरात्र बेला में किये गये उपचार संकल्प बल के सहारे शीघ्र गति पाते तथा साधक का वर्चस्व बढ़ाते हैं। हमारे तत्वज्ञ मनीषियों की मान्यता है कि इस समय वायुमंडल में दैवीय शक्तियों के स्पंदन अत्यधिक सक्रिय होते हैं तथा सूक्ष्म जगत के दिव्य प्रवाह भी इन दिनों तेजी से उभरते व मानवी चेतना को प्रभावित करते हैं। इसीलिए हमारे ऋषियों ने इस संधिकाल को मां शक्ति की आराधना से जोड़कर देवत्वपूर्ण बना दिया।
आश्विन नवरात्र की प्रस्तुत अमृत बेला में मूल रूप से मां शक्ति की की उपासना का विधान है। देवी आराधना का यह उत्सव प्रतिपदा से लेकर नवमी तक मां की नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के रूप में सनातन काल से मनाया जा रहा है। मां दुर्गा का स्वरूप वस्तुत: शक्ति का विश्वरूप है और नवरात्र का अनुष्ठान शक्ति के साथ मर्यादा का अनुशासन और मां के सम्मान का संविधान। सनातन धर्म में देवी दुर्गा के नौ रूप उनके शक्ति वैविध्य का ही विस्तार है। सच भी है कि शक्ति के बिना लोकमंगल का कोई भी प्रयोजन सफल नहीं हो सकता। यही वजह है कि हमारे यहां शक्ति के बिना शिव को "शव" की संज्ञा दी गयी है। शक्ति ही चेतना है, सौन्दर्य है, इसी में संपूर्ण विश्व निहित है। देवी दुर्गा शक्ति की अपरिमितता की द्योतक हैं। जिस तरह युद्ध के संकट काल में दुर्ग में रहने वाले लोग सुरक्षित बच जाते हैं, ठीक उसी तरह मां दुर्गा की शरण में आये हुए की दुर्गति कदापि नहीं हो सकती। दुर्गा शब्द का यही निहितार्थ है। इसीलिए वे दुर्गति नाशिनी कहलाती हैं।
मातृ शक्ति के इसी सृजनात्मक व दिव्य स्वरूप को प्रतिष्ठित करने के लिए मार्कण्डेय ऋषि ने देवी भागवत पुराण में अलंकारिक भाषा शैली में विविध रोचक कथा प्रसंगों की संकल्पना की है। "दुर्गा सप्तशती" में भगवती दुर्गा की अभ्यर्थना पुरुषार्थ साधिका देवी के रूप में की गयी है। मां जगदम्बा के इस महात्म्य को वर्तमान संदर्भों में देखें तो पाएंगे महिषासुर पाशविक प्रवृत्तियों का प्रतीक है। जब-जब मानव समाज में सात्विकता व नैतिकता का हृास होता है तब-तब पाशविक प्रवृत्तियां सिर उठाकर संसार में हाहाकार मचाती हैं। मां दुर्गा का वाहन सिंह बल का, शक्ति का, निर्भयता का प्रतीक है। उनके दस हाथ दस दिशाओं में शक्ति संगठन के सूचक हैं। इसी तरह यह भी समझना चाहिए कि प्रत्येक असुर एक दुष्प्रवृत्ति का प्रतीक है, जिनका विनाश दुर्गा जैसी दुर्गतिनाशिनी शक्ति के द्वारा ही हो सकता है। शास्त्रीय मत से मनुष्य में मुख्य रूप से तीन प्रवृतियां होती हैं- सात्विक, राजस एवं तामस। जब तामसिक प्रवृत्तियां प्रबल होती हैं तो मनुष्य उदात्त दैवी गुणों से, सात्विक वृत्तियों से दूर हो जाता है, उसमें पाशविकता प्रबल हो उठती है। शुंभ-निशुंभ, मधु-कैटभ आदि असुर और कुछ नहीं; हमारे भीतर स्थित आलस, लालच और घमंड जैसी दुष्प्रवृत्तियां ही हैं।
नवरात्र की प्रासंगिकता ही उसकी सदुपयोगिता में है। नवरात्र के नौ दिन मन, वाणी, कर्म तीनों में शुद्धता लाते है। इसकी साधना आत्मा, मन और शरीर का शोधन करती है। यों तो आज के आपाधापी और तेजी से दौड़ते समय में आम आदमी के पास न तो कड़ी तपश्चर्या का समय है और न ही उतना सुदृढ़ मनोबल; फिर भी आध्यात्मिक विभूतियों की मान्यता है कि यदि नौ दिनों की इस विशेष अवधि में जब वातावरण में परोक्ष रूप से देवी शक्तियों के अप्रत्याशित अनुदान बरसते रहते हैं, संकल्पित साधना की जा सके तो उससे चमत्कारी परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं।
मां दुर्गा के नौ रूपों की महत्ता
प्रथम शैलपुत्री : मां दुर्गा का प्रथम स्वरूप है शैलपुत्री। पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म होने से इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। इनकी आराधना से पर्वत सा सुदृढ़ मनोबल प्राप्त होता है।
द्वितीय ब्रह्मचारिणी : मां दुर्गा के दूसरे ब्रह्मचारिणी स्वरूप की आराधना की भक्तों ब्रह्मचर्य व आत्मसंयम की साधना फलित होती है।
तृतीया चंद्रघंटा : मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप चंद्रघंटा की आराधना से मनोबल व शौर्यबल की वृद्धि होती है।
चतुर्थ कूष्मांडा : कूष्मांडा माता की आराधना से साधक के रोग-शोक दूर होकर आयु-यश में वृद्धि होती है।
पंचम स्कंदमाता : नवरात्र के पांचवें दिन की जाने वाली स्कंदमाता की उपासना सिद्धियों के द्वार खोलने वाली मानी जाती है।
षष्ठम कात्यायनी : मां का छठा रूप कात्यायनी है। इनकी पूजा-अर्चना साधक को शत्रुओं पर विजयी बनाती है।
सप्तम कालरात्रि : नवरात्र के दिन मां कालरात्रि की आराधना का विधान है। इनकी पूजा-अर्चना से साधक में काल पर विजय पाने की शक्ति विकसित होती है।
अष्टम महागौरी : मां गौरी के पूजन-वंदन से साधन को मनोवांछित वरदान मिलता है।
नवम सिद्धिदात्री : मां सिद्धिदात्री की आराधना साधक को अष्ट सिद्धियों व नव निधियों की प्राप्ति होती है।
समझें कन्या पूजन का मर्म

 
नवरात्र के अवसर पर कन्या पूजन को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि ये कन्याएं नौ देवियों का प्रतिबिंब मानी जाती हैं। सनातन धर्मियों में कन्या पूजन की परंपरा सदियों से चली आ ही है। देवीभागवत पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि कन्या भोज के बिना नवरात्र अनुष्ठान पूरा नहीं होता। मान्यता है कि देवी मां जप और दान से उतनी खुश नहीं होतीं जितनी कि कन्या पूजन से होती हैं। मगर यह विडम्बना ही है कि हमारे कन्या पूजक देश में हमारी माताएं-बहनें ही नहीं, छोटी-छोटी बच्चियां तक असुरक्षित हैं। देश में दुराचार की घटनाओं व कन्या भ्रूण हत्याओं के आंकड़े हमारे माथे पर लगे कलंक का ऐसा बदनुमा दाग हैं जो किसी भी भावनाशील देशवासी का सिर शर्म से नीचे झुकाने के लिए पर्याप्त हैं। यदि हम जगजननी मां दुर्गा को प्रसन्न कर उनसे शक्ति व भक्ति का अनुदान-वरदान पाना चाहते हैं तो उससे पूर्व अपनी मातृशक्ति की सुरक्षा व सम्मान सुनिश्चित करना होगा।