प्याज का अर्थशास्त्र, प्याज की राजनीति
   दिनांक 03-अक्तूबर-2019
 
जून 2019 में प्याज के रिटेल भाव दिल्ली में 26 रुपये किलो थे, जो सितंबर 2019 में बढ़कर 60 रुपये किलो तक चले गये। तीन महीनों में रिटेल भाव दोगुने से भी ज्यादा हो लिये। और यह हाल सिर्फ दिल्ली का नहीं है, पंजाब, हरियाणा से लेकर तेलंगाना तक मामला यही है। प्याज के भाव लगातार उठ रहे हैं। दिल्ली सरकार ने तय किया है 23 रुपये 90 पैसे प्रति किलो यानी करीब चौबीस रुपये प्रति किलो के हिसाब से जनता को प्याज बेचा जा रहा है । प्याज बहुत राजनीतिक आइटम है। प्याज रबी की फसल में भी होता है और खरीफ की फसल में भी होता है। देश की कुल प्याज पैदावार का करीब साठ प्रतिशत रबी में होता है, इसका प्याज ही अक्तूबर तक बाजार में चलता है, इसके बाद नवंबर में खरीफ का प्याज आना शुरु होता है। इस बार भारी बारिश बाढ़ के हालात के चलते प्याज की आपूर्ति पर असर पड़ा है। आपूर्ति कम होने या आपूर्ति कम होने की आशंका का ही मतलब है कि भाव ऊपर जायेंगे। भावों ने ऊपर जाना शुरु कर दिया है।
हाल प्याज के
नीति आयोग के सदस्य और कृषि के विशेषज्ञ रमेश चंद ने इस मसले पर कहा है कि सरकार के पास बफर स्टाक है। सरकार के पास 50000 टन का बफर स्टाक था, उसमें से 15000 टन का प्रयोग हो चुका है यानी अब करीब 35000 टन का स्टाक और है, इसका इस्तेमाल करके प्याज के भाव कम किये जा सकते हैं। रमेश चंद को उम्मीद है कि नवंबर में खरीफ की फसल आने के बाद प्याज के भाव फिर सामान्य स्तर पर आ जायेंगे। मसले पेचीदा हैं। अगर प्याज के भाव लगातार बढ़ते रहें, तो कहीं ना कहीं किसान को इसका फायदा मिलने की उम्मीद होती है। यूं किसान को हर स्थिति में बढ़े हुए भाव नहीं मिलते, बिचौलिये यानी बीच में थोक कारोबारी ज्यादा कमा लेते हैं। प्याज के भाव जब सस्ते होते हैं, और छोटे किसान के पास प्याज को स्टोर करने की क्षमताएं नहीं होतीं, तो किसान सस्ते में प्याज बेचकर निकल लेता है। सस्ता प्याज बिचौलियों के गोदाम में जमा हो जाता है। भावों की तेजी के दौर में प्याज महंगा होकर निकलता है। इस महंगे प्याज से किसान का भला आम तौर पर नहीं होता, इससे बिचौलियों, ट्रेडरों का भला होता है और आखिर में उपभोक्ता की जेब से ज्यादा पैसा निकलता तो है, पर उसका रुख किसान की तरफ हमेशा नहीं होता। इसलिए यह नहीं समझना चाहिए कि महंगा प्याज किसान को अमीर बना रहा है।
पर एक तर्क यहां यह है कि ओला ऊबर के भाव ज्यादा देना अलग बात है। प्याज तो वह लोग भी खाते हैं, जो ओला ऊबर में नहीं चलते। यानी प्याज एक बहुत ही आम उपभोग का आइटम है। इसलिए सरकारों को इसके भावों के लिए चिंतित होना पड़ता है। सरकारों को सस्ता प्याज बेचने के लिए मैदान में उतरना पड़ता है। किसानों के वोटों की तादाद के मुकाबले आम पब्लिक के वोटों की तादाद बहुत ज्यादा है। सरकारों को वोटों की चिंता करनी होती है। किसानों का यह तर्क सही होने के बावजूद एक तरफ रखा रह जाता है –मांग में तेजी से पैदा होनेवाली कीमत बढ़ोत्तरी का फायदा अगर दूसरे धंधों में उठाने की इजाजत होती है, तो किसान को मांग जनित कीमत बढ़ोत्तरी से क्यों वंचित रखा जाना चाहिए।
प्याज और महंगाई
प्याज का ताल्लुक सिर्फ पब्लिक की जेब से नहीं है। प्याज का ताल्लुक समग्र महंगाई दर से है। महंगाई दर का ताल्लुक ब्याज दर से है, ब्याज दर क्या हो, यह निर्धारण रिजर्व बैंक आफ इंडिया करता है। रिजर्व बैंक आफ इंडिया ब्याज दर के निर्धारण में महंगाई दर का विश्लेषण करता है। यानी अगर महंगाई दर लगातार ऊपर जा रही हो, तो रिजर्व बैंक की कोशिश रहती है कि ब्याज दरें सस्ती ना हों। ब्याज दर सस्ती कर जायें, तो पब्लिक के हाथ में खूब पैसा सस्ते भावों पर आ जाये, तो फिर महंगाई बढ़ने की आशंकाएँ प्रबल हो जाती हैं। महंगाई अगर लगातार बढ़ती रहे, तो रिजर्व बैंक ब्याज दरों को भी बढ़ाने की बात करता है। रिजर्व बैंक ब्याज दरों को बढ़ाने की बात करता है, तो तमाम उद्योगपतियों को समस्याएं होती हैं। यानी केंद्र सरकार अगर उद्योग जगत मंदी के इलाज के तौर पर अगर सस्ती ब्याज दरों को चाहती है, तो उसे सुनिश्चित करना होगा कि प्याज और तमाम आइटमों के भाव एक सीमा के ऊपर ना जायें। अगर ये भाव लगातार ऊपर जाते गये, तो फिर रिजर्व बैंक आफ इंडिया से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि ब्याज दरों में गिरावट का रास्ता खुले।
बुनियादी मसले
किसी भी आइटम के भावों में तेज गिरावट और बढ़ोत्तरी के कारणों में आपूर्ति और मांग का संतुलन ही होता है। अगर किसी आइटम की मांग तेजी से बढ़ जाये, तो भाव बढ़ जाते हैं और किसी आइटम के आपूर्ति तेजी से गिर जाये, तो उसके भाव गिर जाते हैं। आपूर्ति गिरने के कारण कुछ भी हो सकते हैं, बाढ़ सूखा या कोई भी प्राकृतिक आपदा के चलते किसी आइटम की आपूर्ति बाधित हो सकती है। इसमें किसी सरकार का कोई दखल नहीं है। पर सरकारें किसी एक दीर्घकालीन नीति पर काम कर सकती हैं जिनसे किसानों और उपभोक्ताओं के हितों को सुनिश्चित किया जा सके।
देखने में यह आता है कि कभी इस आशय की खबरें आती हैं कि सस्ती कीमतों से नाराज किसान अपना प्याज सड़क पर ही छोड़कर चले गये। कई मामलों में यह भी देखने में आता है कि प्याज या किसी और कृषि उपज को खेत से बाजार तक लाने की लागत ज्यादा बैठती है उससे मिलने वाली कीमत कम बैठती है। ऐसी सूरत में किसान अपनी फसल को सड़क पर छोड़कर जाने में भलाई समझता है। विरोध का यह तरीका कई बार देखा जाता है। ऐसा क्यों होता है कि किसान अंदाज नहीं लगा पाता कि उसकी फसल के भाव इस सीजन में उसे ठीक नहीं मिलेंगे।
ऐसा इसलिए होता है कि इस तरह की व्यवस्थाएं अभी बनी नहीं हैं, जो किसान को सलाह दे सकें कि प्याज की आवक ज्यादा होने की उम्मीद है, सो इस बार प्याज के बजाय कुछ और उपजा लो। छोटा किसान आंख मूंदकर अपने सैट पैटर्न पर काम कर रहा है, मांग आपूर्ति के पूर्वानुमान उसके पास नहीं हैं। इसके लिए संस्थागत इंतजाम भी नहीं हैं। बड़े किसान, चतुर सुजान तो अपना हिसाब किताब जमा लेते हैं। ज्ञान से हासिल चेतना से यह अंदाज कर लेते हैं कि भाव क्या होंगे और कब ज्यादा होंगे। इसलिए यह लगातार देखने में आता है कि बिचौलिये सस्ते भाव पर प्याज को स्टाक करते हैं और महंगे पर बेचते हैं। पर महंगे रेट का फायदा बिचौलियों को होता है, छोटे किसान के रोने वही रहते हैं कि इस बार प्याज बहुत ज्यादा हुआ, तो सस्ता बेचना पड़ा। या इस बार प्याज कम उगाया, तो भाव बहुत बढ़े हुए मिल रहे हैं बाजार में।
कुल मिलाकर किसानों की ज्ञान चेतना का स्तर उन्नत करने के साथ साथ ऐसे इंतजाम भी किये जाने जरुरी हैं कि छोटा किसान भी अपनी फसल का स्टाक उस तरह से कर ले, जिस तरह से बिचौलिये ट्रेडर और बड़े किसान कर लेते हैं और जब भाव ज्यादा होते हैं, तब बेचते हैं। इस संबंध में कोआपरेटिव संस्था बनाकर किस तरह से काम किया जा सकता है। अमूल का डेरी माडल क्या छोटे किसानों के लिए इस्तेमाल हो सकता है ।