यूरोपीय सांसदों ने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग कहा फिर भी विरोध क्यों ?
   दिनांक 30-अक्तूबर-2019
भारत के कथित सेकुलर मीडिया, बुद्धिजीवियों और नेताओं को इस बात की चिंता नहीं होनी चाहिए कि आने वाले यूरोपीय सांसद किस विचारधारा के हैं. चिंता इस बात की होनी चाहिए कि वे भारत के पक्ष में हैं या नहीं. जिन अतिथियों के खिलाफ कांग्रेस और वामपंथी बयानबाजी करके माहौल बनाने की कोशिश कर रहे थे, उन्होंने इस दौरे के बाद कश्मीर और धारा 370 पर भारत का समर्थन किया

प्रधानमंत्री मोदी के साथ कश्मीर दौरे पर आए यूरोपीय सांसद
कश्मीर के अनौपचारिक दौरे पर आए यूरोपीय सांसदों ने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग कहा और धारा 370 पर भारत का समर्थन किया. लेकिन यूरोपीय सांसदों के कश्मीर दौरे के दौरान भारत के विपक्ष का वही रवैया सामने आया जो सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान दिखा था, या उस समय सामने आया था, जब हाफिज सईद को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के लिए भारत सरकार की चीन के साथ संयुक्त राष्ट्र में राजनयिक रस्साकशी चल रही थी. कुछ ही दिनों पहले पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने महाबलीपुरम में हुई मोदी - जिनपिंग अनौपचारिक वार्ता को खारिज कर दिया था. पूर्व प्रधानमंत्री होने के नाते मनमोहन सिंह से कुछ बेहतर की अपेक्षा थी. बीते कुछ सालों से विपक्ष की यह समस्या रही है कि वह कई मुद्दों पर देश के विपक्ष में खड़ा नजर आता है. कश्मीर मध्यस्थता को लेकर जब अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की जबान फिसली, और भारत के विदेश मंत्रालय ने ट्रम्प के बयान का नपे-तुले शब्दों में खंडन कर दिया, व्हाइट हाउस ने भी चुप्पी साध ली, तो विपक्ष ने संसद में हंगामा शुरू कर दिया कि मोदी बयान दें कि उन्होंने ट्रम्प से क्या कहा था.ट्रम्प की जिस गलती को अमेरिकी स्वीकार कर रहे थे, यहां तक कि अनेक महत्वपूर्ण अमेरिकी राजनेता और राजनयिक भी खुलकर ट्रम्प की आलोचना कर रहे थे कि "मोदी कभी भी कश्मीर पर मध्यस्थता के लिए नहीं कह सकते" , उसे लेकर भारत के विपक्ष के अनेक नेताओं ने अपने प्रधानमंत्री और अपने देश की सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की.
क्यों करवाई गई यह यात्रा ?
कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा कि इस यात्रा का आयोजन कर भारत ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है. शायद वे इसे विदेशी हस्तक्षेप या विदेशी राजनयिक दौरे के रूप में पेश करना चाह रहे थे. इस तरह की भ्रामक बयानबाजी से देश का नुक्सान ही होने वाला है. प्रारंभ से ही ये स्पष्ट था कि ये सांसद अनौपचारिक यात्रा पर कश्मीर आ रहे हैं और ये व्यक्तिगत किस्म की यात्रा है. यानी इस दल के किसी भी बयान या रुख को किसी देश या संस्था द्वारा कश्मीर पर आधिकारिक बयान के रूप में दर्ज नहीं किया जाएगा. अर्थात ये यात्रा किसी दूसरे देश के लिए कश्मीर में किसी प्रकार के दखल का बहाना नहीं बन सकती. इस यात्रा को संपन्न इसलिए करवाया गया ताकि यूरोप की राजनीति के ये प्रभावशाली लोग भविष्य में कश्मीर पर भारत के नज़रिए को दुनिया के सामने साझा करें. और ये यात्रा इस उद्देश में सफल रही, जो कि इस दल के सदस्यों के भारत समर्थक बयानों से पता चलता है.
तथाकथित सेकुलर नेताओं और मीडिया कर्मियों के एक तबके ने बयानबाजी की कि जिन यूरोपीय सांसदों को भारत सरकार ने कश्मीर के दौरे पर आमंत्रित किया है, वो सब वहां के दक्षिणपंथी नेता हैं. कुछ विपक्षी नेता तो यहां तक आगे बढ़ गए कि इन मेहमान सांसदों को ‘नाज़ी (हिटलर) प्रेमी’ कह डाला. भारत के मीडिया, बुद्धिजीवियों और नेताओं को इस बात की चिंता नहीं होनी चाहिए कि आने वाले यूरोपीय सांसद वैचारिक रूप से किस ओर झुकाव रखते हैं. हमें चिंता इस बात की होनी चाहिए कि वे भारत के पक्ष में हैं या नहीं. वे कश्मीर पर भारत का समर्थन करते हैं या पाकिस्तानी दुष्प्रचार को हवा देते हैं. इन अतिथियों ने भारत का समर्थन किया और पाकिस्तान के दुष्प्रचार की हवा निकाल दी. विपक्ष के नेताओं को एकजुट होकर इस यात्रा का समर्थन करना चाहिए था. पर वो एक बार फिर पाकिस्तान को कश्मीर पर दुष्प्रचार की सामग्री और कुतर्क मुहैया करवाते दिखे.
कौन हैं ये अतिथि ?
जिन सांसदों को यूरोप के ‘दक्षिणपंथी’ कहकर कोसा गया,‘इस्लामोफोबिया’ से ग्रस्त बतलाया गया और इस आधार पर उनकी इस यात्रा को व्यर्थ बतलाने की कोशिश की गई वो सांसद यूरोप में उभरते संस्कृति संरक्षणवादी आंदोलन का हिस्सा हैं. यूरोप आज जनसांख्यिकी संकट के दौर से गुजर रहा है. आज का यूरोप उपनिवेशवाद और प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध के दौर का यूरोप नहीं रहा जब अंधराष्ट्रवाद ने हिंसा का दावानल भड़काया था. आज का यूरोपीय नागरिक परस्पर खुली सीमाओं वाला, आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों वाला यूरोपियन है. बीते दशकों में सस्ते श्रम के चक्कर में और उद्योगपतियों के दबाव में यूरोप की सरकारों ने अप्रवासियों के लिए अपने देशों के दरवाजे खोल दिए. बाहर से आने वाले इन श्रमिकों में बहुत बड़ी संख्या अरब व अन्य इस्लामी देशों से थी. यह अप्रवासी यूरोप में बस गए. इनकी आबादी वृद्धि दर मूल यूरोपियन लोगों की आबादी वृद्धि दर से कई गुना ज्यादा थी. फलस्वरूप यूरोप के अनेक शहरों में यूरोपीय मूल के लोगों की आबादी घटने लगी .
समस्या तब खड़ी हुई जब इस्लामी देशों से आए अप्रवासियों के एक बड़े हिस्से ने यूरोप में इस्लामी तौर तरीके और शरिया कानून लागू करने की मांग शुरू कर दी. जब सीरिया में अबू बकर अल बगदादी और उसके कुख्यात इस्लामिक स्टेट का उदय हुआ तो नव यूरोपियन मुस्लिमों और इन अप्रवासियों ने सारे यूरोप में दर्जनों आतंकी वारदातों को अंजाम दिया. इसके विरोध में इन राजनीतिज्ञों ने यूरोप में आने वाले अप्रवासियों के प्रवाह को नियंत्रित करने और अपने देशों की संस्कृति को संरक्षित करने की मांग शुरू की. यूरोप और अमेरिका के वामपंथी और समाजवादी मीडिया तथा नेताओं ने इन्हें मुस्लिम विरोधी (इस्लामोफोबिक) कहना प्रारंभ कर दिया.
और ये है दूसरा खेमा...
सांसदों के इसी यात्रा दल के साथ साथ जिनका आना तय था वो हैं ‘लिबरल’/ प्रगतिशील कहलाए जाने वाले ब्रिटिश सांसद क्रिस डेविस, जिन्होंने अपनी यात्रा रद्द कर दी. क्रिस ने भारत सरकार से अजीबोगरीब मांग की जिसे भारत सरकार या कोई भी सरकार स्वीकार नहीं कर सकती थी. क्रिस ने कहा कि वो भारतीय सुरक्षा दलों के बिना,वास्तव में किसी भारतीय सहयोगी के बिना कश्मीर घूमना चाहते हैं. जिस राज्य में पाकिस्तान पोषित जिहादी आतंकी उत्पात मचाने की फिराक में हों, वहां भारत सरकार किसी विदेशी राजनेता को इस प्रकार कैसे जाने दे सकती थी. क्रिस को शायद यही बहाना चाहिए था. उन्होंने ‘विरोध’ स्वरूप कश्मीर न जाने की घोषणा की. क्रिस ने बयान दिया कि कश्मीर में सब कुछ ठीक नहीं है. यूरोप और अमेरिका के वामपंथियों और लिबरल नेताओं का बड़ा वर्ग इस्लामी कट्टरता के तुष्टिकरण और इजराइल विरोध के लिए प्रसिद्ध है. क्रिस को 2006 में यूरोपीय संसद के नेता पद से इस्तीफा देने को मजबूर किया गया था क्योंकि उन्होंने यहूदियों के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए उन्हें “अपने ही विष्ठा (मल) में लोटने वाला” कहा था.
इस दौरे के विरोध में बोलने वाले वही नेता हैं, जिन्होंने संसद के अंदर और बाहर धारा 370 हटाए जाने का विरोध किया था या दोहरी बोली बोलते रहे. इनमें हैं महबूबा मुफ्ती, असदुद्दीन ओवैसी, प्रियंका गांधी वाड्रा, आनंद शर्मा, शशि थरूर आदि. इसलिए इनके रुख पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ. पर इनका ये रवैया ये देश के लिए अच्छा नहीं है.