मंदी के बादल और बदलते भारत की रफ्तार
   दिनांक 04-अक्तूबर-2019
 
 
वाहन निर्माता कंपनियां उत्पादन में गिरावट की असली वजह नहीं बता रही हैं।
प्रसिद्ध प्रबंधक और बाजार रणनीतिकार मार्शल मैक्लूहान की ‘ग्लोबल विलेज’ यानी विश्व ग्राम की अवधारणा से सदियों पहले जिस देश ने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के भाव को आत्मसात किया हो, उसके लिए भूमंडलीकरण कोई नई चीज नहीं है। किन्तु यह भी सच है कि पश्चिम का बाजार केंद्रित ‘ग्लोबलाइजेशन’ भारत के धर्म-अध्यात्म केंद्रित विचार जितना सादा, पूर्ण और संघर्ष की बजाय समन्वय पर जोर देने वाला नहीं है। इसलिए आर्थिक सुस्ती की वर्तमान सुगबुगाहटों को सिर्फ परंपरागत बचत और सीमित खपत की सोच से थामा नहीं जा सकता।
2014 के बाद से भारत ने बुनियादी ढांचे में बड़े निवेश, व्यवस्था में तकनीक के जरिए पारदर्शिता और भरोसा जगाने वाले जैसे प्रयोग किए हैं, उसकी दूसरी मिसाल दुनिया में नहीं है। भाजपा सरकार के दोबारा प्रबल जनादेश हासिल करने के पीछे यह बड़ी वजह थी।
2019 की शुरुआत में भारत दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से पांचवें स्थान की ओर बढ़ने को अग्रसर था, किन्तु विश्व व्यवस्था के हिचकोलों ने इसकी रफ्तार घटा दी और यह सातवें स्थान पर चला गया।
एक के बाद दूसरी, लगातार पांचवीं तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर का गिरने के बाद सवाल उठने लगे कि क्या यह मंदी की आहट है! विशेषज्ञ इससे इनकार नहीं करते, किन्तु साथ ही अर्थ जगत को इस बात का भी पूरा भरोसा है कि तमाम वैश्विक कारकों के बावजूद भारत में इस संकट से निबटने की ताकत है।
ऐसा इसलिए, क्योंकि वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था किसी रोग को पालने की बजाय उसका निर्णायक इलाज करने का दम रखती है, भले इसमें कुछ जोखिम-बाधाएं ही क्यों न हों।
इसलिए जब केंद्रीय वित्त मंत्री ने 32 सूत्री उपायों की घोषणा की तो इससे आर्थिक मोर्चे पर आशंकाओं के बादल छंटे और भरोसे की बहाली तेज हो गई। सरकार ने सितंबर माह में कार्पोरेट टैक्स की दर करीब 10 प्रतिशत घटाई और साथ ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के पूंजीगत लाभ पर से बढ़े उपकर को भी हटा दिया। इसके बाद हुआ यह कि दो माह तक ताबड़तोड़ बिकवाली से जिस शेयर बाजार में घबराहट पसरने लगी थी, वहां विदेशी पोर्टफोलियों में निवेश करने वालों ने 7,714 करोड़ रुपये लगाए।
कहते हैं आर्थिक मोर्चे पर कार्य-व्यवहार भावनाओं और संकेतकों से गहरा प्रभावित होता है। इसके साथ ही यह जोड़ना ज्यादा जरूरी है कि कुछ संकेतकों को चमकाना और बाकी खबरों का जिक्र न करना भी अर्थ जगत में अनावश्यक आशंकाएं और असंतुलन पैदा करता है। आॅटोमोबाइल सेक्टर में मंदी का हल्ला भी कुछ ऐसा ही था, जहां अच्छी बातों की पूरी तरह उपेक्षा कर दी गई और केवल बुरी खबरों को विमर्श के केंद्र में रखा गया।
जब केंद्रीय वित्तमंत्री ने निजी कारों की बिक्री घटने के लिए ओला-उबर जैसी किराए की कारों के बढ़ते चलन को जिम्मेदार बताया तो सरकार से बाहर (और नाराज), सोशल मीडिया के सारे ‘विद्वान’ उनकी समझदारी की खिल्ली उड़ाने लगे! ध्यान देने वाली बात यह है कि इन समझदारों में से किसी ने देश की सबसे बड़ी वाहन निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी के चेयरमैन आरसी भार्गव की उस टिप्पणी पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा, जिसमें उन्होंने निर्मला सीतारमण के बयान को 100 प्रतिशत सही ठहराया था।
क्या सामाजिक रुचि और अपेक्षाओं में हो रहे बदलाव आर्थिक विमर्श और विश्लेषण का हिस्सा नहीं होने चाहिए?
-बताया गया कि आॅटोमोबाइल क्षेत्र में मंदी की स्थिति यह है कि देशभर में विभिन्न वाहन निर्माताओं की 300 से अधिक डीलरशिप बंद हो गई। यह कहते हुए इस बात का उल्लेख किसी ने भी नहीं किया कि पिछले चार वर्ष के दौरान अकेले मारुति सुजुकी ने अपनी महंगी गाड़ियां बेचने के लिए देश के 200 से ज्यादा शहरों में 350 से ज्यादा ‘नेक्सा’ स्टोर खोले हैं।
- पूरे आटोमोबाइल क्षेत्र से मंदी के आंकड़े जुटाए-बताए गए। यह भी कि मारुति सुजुकी की बिक्री में लगातार 11वें महीने गिरावट देखी गई है। इसके साथ जो बात नहीं बताई गई वह यह कि पिछले कई सालों से ‘पहली कार’ खरीदने वालों के लिए कुछ नया करने में नाकाम कंपनी अब बाजार के हिसाब से खुद को नए रूप में ढाल रही है। कंपनी की कुछ इकाइयों में इस कारण उत्पादन घटा है तो वह 640 करोड़ रुपये के नए निवेश के साथ रोजगार और नए ब्रांड उपलब्ध कराने के मौके भी दे रही है। दरअसल, बाजार नई कंपनियों के लिए अवसर दे रहा है। लोग नए विकल्प तथा ब्रांड आजमा रहे हैं। उन्नत तकनीक के लिए थोड़ा इंतजार कर रहे हैं तथा पुराने उत्सर्जन मानकों वाले वाहनों की उपयोगिता और नई तकनीक के मुकाबले इनकी गुणवत्ता को तौलते हुए अपने पैसे का पूरा मोल वसूलना चाहते हैं।
- बताया गया कि सितंबर माह में मारुति ने पिछले वर्ष के मुकाबले करीब 41 हजार कम कारें बेचीं, लेकिन इसके साथ यह उल्लेख नहीं किया गया कि बाजार में एकदम नई कंपनी ‘किया’ की कार ‘सेल्टोस’ ने सिर्फ एक माह में 40 हजार कारों की बिक्री पक्की कर ली। इसी तरह, केवल छह सप्ताह में महंगी एसयूवी ‘हेक्टर’ की रिकार्डतोड़ 28 हजार बिक्री करने के बाद बुकिंग बंद कर देने वाली मॉरिस गैराज की सफलता को भी आॅटो क्षेत्र की सुस्ती की मीमांसा करते वक्त ध्यान में नहीं रखा गया!
आकलन करने के दौरान आटोमोबाइल क्षेत्र को पूरी अर्थव्यवस्था और मारुति को इसके प्रतीक के रूप में पेश करने वाले विश्लेषक बाजार के उन संकेतकों से कन्नी काटते दिखाई दिए जो पूरी तस्वीर को समझने में सहायक हो सकते थे। उदाहरण के लिए, लोगों द्वारा खरीदारी! बाजार में सुस्ती की चर्चाओं के बीच यह जानना दिलचस्प है कि अमेजन ने अपनी त्योहारी सेल के शुरुआती 36 घंटे के भीतर ही 750 करोड़ रुपये के तो सिर्फ और सिर्फ मोबाइल फोन बेच लिए थे! इसी दौरान फ्लिपकार्ट ने पिछले वर्ष की तुलना में दोगुने स्मार्टफोन बेच डाले। यदि बाजार में मंदी है और ग्राहक खरीदारी नहीं कर रहा तो ये आंकड़े आ कहां से रहे हैं?
ध्यान देने वाली बात है कि शेयर बाजार में वापसी के अलावा सोने को 40 हजारी उछाल देने वाले ग्राहक वही भारतीय हैं जिनकी बचत, मितव्ययता और तोल-मोल की क्षमता का लोहा दुनिया मानती रही है और इन्हीं ग्राहकों के बूते ई-कॉमर्स कंपनियां केवल त्योहारी मौसम में 35 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के कारोबार की उम्मीद कर रही हैं। किन्तु आज दुनिया जिस सघन आर्थिक व्यवहार से बंधी है, उसमें सिर्फ घरेलू कारकों की बात करना और बाहरी घटनाओं तथा अर्थव्यवस्था पर उनके प्रभाव को न गिनना संभव नहीं। इसलिए भारत के लिए यह चुनौती और अवसरों का दोहरा मेल है।
-अमेरिका-चीन का परस्पर व्यापार युद्ध भारत को प्रभावित भी करेगा और इसके लिए दोनों पक्षों से तोल-मोल के नए मौके भी लाएगा। इसलिए चीनी राष्टÑपति की भारत यात्रा और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के बारीक पहलुओं को समझना होगा।
-सऊदी अरब भारत को एक आकर्षक निवेश स्थल के तौर पर देख रहा है। पेट्रो, रसायन, बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में सात लाख करोड़ के निवेश का मन बना रहा है। यह बात अन्य निवेशक को भी खींच सकती है, लेकिन इस संभावना के सच होने से पहले की हकीकत यह है कि सऊदी अरब के दो तेल संयंत्रों पर हुए हमले भारत के अलावा पूरी दुनिया के लिए कच्चे तेल के भावों में करीब 20 प्रतिशत उछाल की आग लगा चुके हैं।
-ऊर्जा जरूरतों का अधिकांश हिस्सा सिर्फ पेट्रोलियम उत्पादों से पूरा करना और इसके लिए सिर्फ पश्चिम एशिया पर निर्भर रहना भी अब लंबे समय तक ठीक नहीं।
दरअसल, वर्ष 2008 में भी दुनिया की वित्त व्यवस्था ने झटका खाया था। तब अनाप-शनाप कर्ज बांटने वाले 200 वर्ष पुराने लीमन ब्रदर्स बैंक का दिवालिया होना, आईटी क्षेत्र में ‘पिंक स्लिप’ का दौर, एक संकेत था कि गड़बड़ियां कैसी और किस स्तर पर हो सकती हैं।
भारत गड़बड़ियों का सही समय पर इलाज करने, ग्राहकों को नए विकल्प उपलब्ध कराने और दुनिया को नए कारोबारी मौके देने वाले देश के रूप में स्थान बना रहा है।
दरअसल, यह आर्थिक क्षेत्र को प्रारंभिक तौर पर झकझोरने वाली और अंतत: इसके लिए सही राह खोलने वाली प्रक्रिया ही है, जहां प्रशासनिक सक्रियता के कारण व्यवस्था परिवर्तन के बाद रियल एस्टेट क्षेत्र में घपलेबाजों की कलई खुली और कई बादशाह प्यादे बन गए।
मीडिया घरानों के बही-खातों की जांच हुई तो यह संदेह गहरा गए कि ‘सच’ के सूत्रधार ही कहीं इसके सौदागर तो नहीं बन बैठे थे!
राजनैतिक आकाओं के इशारे पर नाचते, निजी या सियासी हित साधते, ‘एनपीए’ का पहाड़ खड़ा करते बैंक प्रबंधकों के अलग ही किरदार इस दौरान सामने आए हैं।
आश्चर्य की बात है कि वैश्विक संभावनाओं से भरे इस देश में कुछ तत्व भ्रष्टाचार को अर्थव्यवस्था का अंग मान बैठे थे। ऐसे तत्वों को भ्रष्टाचार का इलाज अंग-भंग से कम भला क्योें लगेगा!
तो जो सब चल रहा था क्या उसका कोई असर नहीं होना था! पहाड़ों के ढहने से निश्चित ही कुछ बड़े गड्ढे पैदा हुए हैं जो खास आर्थिक सतर्कता की मांग करते हैं। जिन खबरों-घटनाओं ने चुनाव के माहौल में एक ‘थ्रिल’ पैदा किया था, अब उन कहानियों को उपसंहार की ओर ले जाने और इससे पैदा आर्थिक थर्राहट को थामने का वक्त है।