जयंती विशेष: संघ कार्य को जीवन समर्पित करने वाले भास्कर राव
   दिनांक 05-अक्तूबर-2019
तरुण विजय
भास्कर राव जी ने केरल जैसे राज्य में संघ कार्य को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। उनके कारण ही केरल में कार्यकर्ताओं की ऐसी टोली खड़ी हो पाई, जो वामपंथी आतंकवाद का मुकाबला आज भी करती है

 
हिंदू धर्म की सनातन अग्नि को जिलाए रखने में हिंदू सम्राटों के साथ-साथ संतों और संत समान उन समाज शिल्पियों की बड़ी भूमिका रही है, जिन्होंने अनाम, अनजान रहते हुए अपने रक्त से हिंदू धर्म का उपवन सींचा। भास्कर राव ऐसे ही सूर्य थे। सूर्य तो उनके नाम में ही निहित था लेकिन उनका व्यक्तित्व और कृतित्व सूर्य की असंख्य रश्मियों को शांत, मृदुल आत्मीयता में बदल दिया करता था। भास्कर राव स्वयं प्रभा से उद्भासित थे। उन्होंने अपने तेज और तप से हजारों घरों को समर्पित संघ कार्यालय में ही बदल दिया और हजारों युवाओं को स्वयंसेवकत्व की दीक्षा देकर पाश्विक और बर्बर वामपंथी हिंसा के विरुद्ध चट्टान की तरह खड़ा कर दिया।
कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर केरल के मास्टर सदानंदन की बेटी यमुना भारती की चर्चा हुई। कक्षा में पढ़ाते समय सदानंदन जी को वामपंथी आतंकवादियों ने अपने हमले का शिकार बनाया और उनके दोनों पांव काट दिए। वे किसी तरह बचे। उन्होंने एक स्वयंसेवक की चट्टानी दृढ़ता दिखाते हुए अपने परिवार को पाला-पोसा। उन्हीं की बेटी यमुना भारती ने कालीकट विश्वविद्यालय की सिविल इंजीनियरिंग परीक्षा में प्रथम क्रमांक, जिसे 'फर्स्ट क्लास फर्स्ट' कहा जाता है, हासिल कर अपने पिता पर हमले का मानो विद्या-वीरता से प्रतिशोध ले लिया। कौन हैं सदानंदन मास्टर! वे और उनके जैसे अनेक कार्यकर्ता भास्कर राव द्वारा केरल में रचे गए संघ संसार की देन हैं। ऐसे एक नहीं अनेक, अनेक नहीं अनेकानेक ज्ञात, अल्पज्ञात और प्राय: अज्ञात उदाहरण हैं। अगर भास्कर राव एक सूर्य थे तो उनकी सबसे बड़ी देन, इस भारत और भारत की हिंदू सभ्यता की रक्षा के निमित्त कवच समान युवाओं को गढ़ने के रूप में यह कही जा सकती है कि एक भास्कर ने हजार भास्कर निर्मित किए।
उनको जानना अपने से मिलने जैसा होता था। शांत, शीतल, मंद समीर या भास्करराव। हमें हमेशा दोनों एक जैसे ही लगे। कठिन से कठिन परिस्थिति में भी उनका सौम्य चेहरा कभी व्यग्र या उद्विग्न नहीं होता था। संघ कार्य उनके जीवन के रोम-रोम में बसा था। पर कभी किसी भी क्षण, किसी भी कार्यकर्ता का अगर मन उदास है, उसकी कोई व्यथा है या उस पर कोई पारिवारिक संकट भी आन पड़ा है तो भी उस घर के रक्त बंधु सदस्य के नाते ही उन्होंने समाधान का प्रयास किया। यह कहकर कभी पीछे नहीं हटे कि भाई मैं तो संघ प्रचारक हूं, आपकी इस समस्या से मुझे सहानुभूति है पर मैं कुछ कर नहीं सकता।
संघ को समझना है तो उसे अपनत्व के संबंधों से समझना होगा। ग्रंथ, बौद्धिक और कार्यक्रम तो बाद में आते हैं और वास्तव में ग्रंथ, बौद्धिक और कार्यक्रम मूलत: उस अपनत्व के धागे बनाने के लिए ही किए जाते हैं जिसे हिंदू संगठन भी कहा जाता है। यही वह अपनत्व था जिसने केरल में सामान्य आर्थिक दृष्टि से विपन्न, मजदूरों, किसानों, मछुआरों, अध्यापकों, रिक्शाचालकों, बिजली और अन्य सामान्य मरम्मत करने वालों के बीच संघ का काम प्रारंभ करवाया। केरल में भास्कर राव संघ के प्रचारक, अधिकारी के नाते नहीं, बल्कि किसी के भाई, किसी के पिता समान, किसी के अनुज, किसी के मामा या चाचा बन गए थे। वे घर के सदस्य थे, जो शाखा भी जाते हैं, न कि शाखा जाने के लिए कहने वाले, जो घर भी आते हैं। कितना फर्क है इन दोनों में। पर यह फर्क था भास्कर राव और सामाजिक संगठन के नाते संगठन करने वाले अन्य नेताओं में।
संघ में एक शब्द का प्रयोग होता है- एकरूपता। जब साधक और साध्य एक हो जाएं, जब पथ और पथिक एक हो जाएं, जब कारवां और मंजिल एक-दूसरे में समा जाएं कि न मंजिल का भान हो, न कारवां मंजिल से अलग दिखे तो उस स्थिति को स्वयंसेवकत्व प्राप्त होना कहते हैं। भास्कर राव उस स्वयंसेवकत्व की स्थिति के मूर्तिमंत स्वरूप थे।
1984 में वे वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री घोषित हुए थे तो 1986 में अखिल भारतीय संगठन मंत्री बने। केरल से राष्ट्रीय स्तर पर जनजातीय समाज के संगठन, शिक्षा और आर्थिक विकास, धर्म जागरण तथा अहिंदू षड्यंत्रों से उनकी रक्षा का एक बड़ा और भिन्न प्रकार का दायित्व उनको मिला। वह भी किस आयु में- जब वे 65 वर्ष के हो गए थे। यह वह आयु होती है, जब जीवन एक निश्चित गति को प्राप्त हो चुका होता है। पथ निर्धारित होता है और शेष वर्ष आराम से निकालने का मन होता है। लेकिन 65 वर्ष की आयु में भास्कर राव जी को मानो वह एक नया दायित्व और अध्याय रचने का काम दिया गया। उन्होंनेे वनवासी कल्याण आश्रम को वही सब कुछ दिया, जो 25 और 35 वर्ष के युवा कार्यकर्ता एक नवीन संगठन को दे सकते थे। नई दिशा, नई योजनाएं, नए कार्यकर्ताओं को जोड़ना और सेवा, शिक्षा तथा आर्थिक विकास के कार्यक्रमों के साथ-साथ अपने धर्म और संस्कृति को बचाने के लिए उसी लौह दृढ़ता का समावेश, जो केरल के प्रथम प्रांत प्रचारक के रूप में दिखाई थी।
मैं तब दादरा नगर हवेली में था। वनवासी कल्याण आश्रम के पूर्णकालिक के रूप में। 1981 से 1986 तक। 1986 सितंबर में पाञ्चजन्य में आया कार्यकारी संपादक के नाते। कल्याण आश्रम में और उसके बाद पाञ्चजन्य में भास्कर राव से निरंतर संपर्क रहा। उनके साथ पत्र-व्यवहार, मिलना सतत चला। दिल्ली आने पर पहले वे झंडेवालान कार्यालय में रुकते थे। बाद में उन्होंने वनवासी कल्याण आश्रम के मलकागंज कार्यालय में ही रुकना शुरू किया। प्राय: दिल्ली आगमन पर एक समय भोजन हमारे यहां अवश्य रहता था। काम की बात? नहीं, सिर्फ घर की बातें। उस समय 'वनबंधु' को कुछ नएपन के साथ छापने का उनका मन था। पाञ्चजन्य में काम करते हुए उन्होंने मुझे 'वनबंधु' के संपादक का भी दायित्व दिया। हमने कुछ समय दिल्ली से वारली शैली की चित्रकला वाले शुभकामना पत्र बनाकर भेजने और विक्रय करने प्रारंभ किए। उन्हें मेरी माताजी की बहुत चिंता रहती थी। उनकी आंखों के दो ऑपरेशन हो चुके थे और वे देहरादून में अकेली रहती थीं। पूज्य रज्जू भैया ने अम्मा के पास भास्कर राव जी से कह कर असम से पहले दो और फिर अगले साल पांच वनवासी छात्र देहरादून में पढ़ने भेजे, ताकि वे बच्चे पढ़ें भी और अम्मा का अकेलापन भी दूर हो। उसी काम को आगे बढ़ाकर भास्कर राव जी ने देहरादून में वनवासी छात्रावास और विद्यालय प्रारंभ करने में मदद दी, जो आज 20 साल हो गए सतत गतिमान है। भास्कर राव इस प्रकार कार्यकर्ताओं का संसार रच देते थे।
उनका जन्म 5 अक्तूबर, 1919 को तत्कालीन बर्मा की राजधानी रंगून के निकट दास गांव में हुआ था। वहां उनके पिता शिवराम कलंबी चिकित्सक थे। मूलत: भास्कर राव का वंश यानी कलंबी परिवार गोवा के मंगेशी गांव से है। इसी गांव से लता मंगेशकर का परिवार है जहां मंगेश देव का प्राचीन मंदिर है। भास्कर राव की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा म्यांमार में हुई थी। काल की गति ऐसी कि बचपन में ही माता-पिता का देहांत हो गया। अत: शेष शिक्षा मुंबई के राबर्ट मनी हाई स्कूल और सेंट जेवियर्स कॉलेज से प्राप्त की। कुछ समय नौकरी करने के बाद 1945 में उन्होंने बंबई विश्वविद्यालय से एएलबी की उपाधि हासिल की। वे बचपन से ही स्वयंसेवक थे। परमपूज्य गुरुजी, भाऊराव देवरस और दत्तोपंत जी के संपर्क में रहने के कारण 1946 में वे संघ के प्रचारक बन गए और उन्हें उस समय संघ कार्य के लिए असंभव माने जाने वाले केरल में संघ कार्य बढ़ाने का दायित्व दिया जहां दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने संघ कार्य को गति दी थी।
राव जी निरंतर प्रवास तथा वनवासी क्षेत्रों में हर क्षेत्र और हर प्रकल्प को स्वयं देखते और दिशा देते थे। उनका स्वास्थ्य पहले से ही गिरावट की ओर था। हृदय रोग के कारण शनै: - शनै: उनकी गति और शक्ति पर असर पड़ने लगा और फिर अचानक डॉक्टरों ने पाया कि उन्हें कैंसर है। दैवेच्छा के आगे किसकी चली है। 12 जनवरी, 2002 को केरल के एर्नाकुलम में उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। केरल प्रारंभ से उनकी कर्मभूमि रही और उन्होंने अंतिम प्रयाण भी केरल की माटी को नमन करके किया। भास्कर राव हमारे समय के महात्मा ही थे। जिन्होंने गांधीजी और दीनदयालजी को नहीं देखा, उन्होंने भास्कर राव की छवि में गांधी और दीनदयाल दोनों को पाया।
(लेखक राज्यसभा के पूर्व सांसद हैं)