हिंदुओं के लिए दोजख है पाकिस्तान
   दिनांक 07-अक्तूबर-2019
 
 
यह है 13 वर्षीया बच्ची पूजा कुमारी। कुछ समय पहले इसका अपहरण हैदराबाद जिले के बक्सो लगहरी गांव से किया गया था। इसे जबरन मुसलमान बनाकर एक अधेड़ के साथ निकाह कर दिया गया है.
 पश्तूनों और बलूचों के घर जिस मुल्क में जलाए जा रहे हैं, मानवाधिकार का जहां कोई अर्थ नहीं, जहां हिंदू, सिख और ईसाई लड़कियों को जबरन उठा लिया जाता है, जिस देश की सेना जिहादियों के लिए पालना हो, उस देश के प्रधानमंत्री इमरान खान संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर का राग अलाप रहे थे। लेकिन वैश्विक मंच पर दिए उनके भाषण ने पाकिस्तान की भद पिटवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अलबत्ता अब पाकिस्तान के अंदर की छिपी बातें दुनिया के सामने आ रही हैं। सिंध सहित पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर ढहाए जा रहे जुल्मों की चर्चा हो रही है। लेकिन कश्मीर की चिंता में पतले हुए जा रहे इमरान की अपने ही देश के अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे अत्याचार, इस्लाम में कन्वर्जन, अपहरण, हत्या और जबरदस्ती निकाह पर चुप्पी सवाल खड़े कर रही है
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर और कश्मीरियों की चिंता को लेकर जोर-जोर से बोल रहे थे, दुनिया के सामने गलत तथ्य पेश कर रहे थे और एक हठी बच्चे की तरह अपनी झूठी बातों को मनवाने पर अड़े थे। कश्मीर को लेकर उन्होंने जो कहा उसका सार था, ''वहां कुछ भी ठीक नहीं है। भारतीय सेना कश्मीर के मुसलमानों पर अत्याचार कर रही है और बंदूक के दम पर शासन चलाया जा रहा है। जिस दिन कर्फ्यू हटेगा, उस दिन लोग सड़कों पर उतरेंगे और इस ज्यादती के खिलाफ बंदूक उठाकर 'जिहाद' करेंगे।'' इमरान खान अपने भाषण के माध्यम से दुनिया के शक्तिशाली मंच का इस्तेमाल पाकिस्तानी अफवाह फैलाने और 'जिहाद' के लिए पाक अधिक्रांत कश्मीर में तैयार बैठे आतंकियों को खुराक देने के लिए कर रहे थे। लेकिन इमरान पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के ऊपर आए दिन होने वाले अत्याचारों को छिपा ले गए। सिंध सहित पूरे पाकिस्तान में रोजाना हिन्दू लड़कियों के जबरदस्ती इस्लाम में कन्वर्जन, हत्या, अपहरण पर उनकी जुबान नहीं चली! कट्टरपंथियों के अत्याचारों से तंग आकर पाकिस्तान के विभिन्न इलाकों से हर साल लगभग 5,000 हिन्दुओं के भारत पलायन पर उनके मुंह से एक शब्द नहीं निकला।
दरअसल 11 अगस्त, 1947 को जिन्ना ने अपने एक भाषण में कहा था, ''पाकिस्तान में हिन्दू आजाद हैं; अपने मंदिर जाने के लिए, मुस्लिम आजाद हैं अपनी मस्जिद जाने के लिए। कोई भी कहीं भी पाकिस्तान में जाने के लिए स्वतंत्र है। मत-पंथ, जात-पात, रंग-रूप, वेश-भूषा से, देश का कुछ भी लेना-देना नहीं है।''
दुनियाभर में पाकिस्तान के निर्माता ने इस भाषण के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश की थी कि पाकिस्तान बनने के बाद इस्लाम के इतर यहां रह रहे किसी भी मत-पंथ के व्यक्ति का न तो शोषण किया जाएगा और न ही उन पर जुल्म ढहाया जाएगा। उस समय पाकिस्तान में हिन्दू, सिख एवं ईसाई कुल जनसंख्या का 23 प्रतिशत थे। गुजरे समय यानी 2019 में जिन्ना के उस बयान को देखें तो पाकिस्तान में सब उल्टा नजर आता है। इस्लाम की बुनियाद पर बने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का प्रतिशत 23 से घटकर 3 से भी कम पर आकर अटक गया है। अल्पसंख्यकों पर आएदिन हमले होते हैं। अगर कोई इसका विरोध करता है तो उसे बर्बरता से मार दिया जाता है। सिंध की मेडिकल छात्रा निमरिता चंदानी इसका ताजा उदाहरण है। न्यायालय भी बिना कोई कारण बताए निमरिता की हत्या पर न्यायिक जांच से इंकार कर देता है। इससे साफ जाहिर होता है कि इस्लामिक मुल्म में अल्पसंख्यकों का हाल क्या है! अल्पसंख्यकों के कन्वर्जन, अपहरण, जबरदस्ती निकाह की सैकड़ों खबरों में एकाध खबरें ही सोशल मीडिया के कारण मुख्य धारा के मीडिया की सुर्खियां बन पाती हैं, बाकी दबा दी जाती हैं।
पुलिस की मिलीभगत से होता है खेल
25 मार्च, 2019 को सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था। वीडियो में एक पिता अपनी अपह्त बेटियों- रीना और रबीना के लिए दहाड़ मारकर रो रहा था, जिन्हें जिहादियों ने घोटकी से उनके घर से अगवा किया था। जिसने भी यह वीडियो देखा उसका दिल रो गया। पाकिस्तान सहित भारत और विदेशों तक में यह वीडियो पहुंचा और लोगों ने सोशल मीडिया के माध्यम से पाकिस्तान की सरकार और स्थानीय पुलिस को दुत्कारना शुरू किया। मामले के तूल पकड़ते ही सरकार ने जांच के आदेश दिए। लेकिन यह जांच महज दिखावे के लिए ही थी। परिवार ने अपह्त होने के बाद यानी 20 मार्च को स्थानीय पुलिस में इसकी रिपोर्ट की थी लेकिन पुलिस उनकी शिकायत सुनने को तैयार न थी, उल्टे धमकी देने का काम कर रही थी। अगले दिन पुलिस ने ट्वीटर पर एक वीडियो जारी किया जिसमें दिखाया गया था कि दोनों बेटियां घर से दूर रहने, अपनी मर्जी से इस्लाम और निकाह कबूलने की बात कर रही हैं। जबकि परिवार ने जो शिकायत की थी उसमें स्पष्ट था कि लड़कियां बालिग नहीं हैं, इसलिए यह निकाह अवैध है। परिवार रोता रहा, बिलखता रहा और हर दर पर न्याय की भीख मांगता रहा लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला। रीना और रबीना के माता-पिता एक ही बात कह रहे थे कि उनकी बेटियों का जबरन कन्वर्जन और निकाह किया गया है और पुलिस इस साजिश में शामिल है, लेकिन किसी ने उनकी एक न सुनी।

 
दरअसल, यह कोई पहला मामला नहीं है जब पुलिस की मिलीभगत सामने आई हो। सिंध के सैकड़ों मामले ऐसे हैं जहां पुलिस की मिलीभगत से ही हिन्दू बेटियों-महिलाओं के सामूहिक बलात्कार, हत्या, अपहरण, कन्वर्जन, जबरदस्ती निकाह की घटनाओं को अंजाम दिया जाता है। स्थानीय पुलिस और घटना में शामिल मुल्ला-मौलवी की शासन-सत्ता तक पहुंच होती है जिसके कारण स्थानीय पुलिस उनका साथ देती है। कई मामलों में तो यहां तक देखा गया है कि पुलिस साक्ष्यों को मिटाने का भी काम करती है। इन घटनाओं पर 'पाकिस्तान हिन्दू काउंसिल' के सदस्य रमेश कुमार का कहना है कि समूचे पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का जबरदस्ती कन्वर्जन बंद होना चाहिए। वे कहते हैं,''सिंध में आज छोटी-छोटी लड़कियों तक को निशाना बनाया जा रहा है। इस दुष्कृत्य में मस्जिद, मजारें और मदरसे सबसे आगे हैं। जिन लड़कियों को अगवा किया जाता है उन्हें सबसे पहले इन्हीं मदरसों-मस्जिदों में लाया जाता है, जहां उन्हें धमकाया जाता है, परिवार को खत्म करने की धमकी दी जाती है और फिर इस्लाम कबूल करने और निकाह का हुक्म दिया जाता है। ऐसी स्थिति में बेचारी हिन्दू लड़कियां क्या कर सकती हैं?''
पाकिस्तान की सामाजिक कार्यकर्ता जोहरा यूसुफ की मानें तो प्रत्येक साल 1,000 से अधिक हिन्दू लड़कियों को इस्लाम में जबरिया कन्वर्ट किया जाता है। यह आंकड़ा साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है। वे कहती हैं,''यह बिल्कुल सही है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्कों पर अत्याचार होते हैं और उनके अधिकार नाम की कोई चीज यहां है ही नहीं। जब उन्हें संरक्षण नहीं मिलेगा, उनके साथ भेदभाव होगा, उनका कन्वर्जन किया जाएगा, तो यकीनन वह देश छोड़कर ही जाएंगे। उनके सामने और रास्ता ही क्या है?''
कन्वर्जन के लिए कुख्यात मस्जिद-मदरसे
खबरों की मानें तो पाकिस्तान स्थित अमरकोट की सरहिन्दी मस्जिद, सिंध की अमरोथ शरीफ और भरचंुडी शरीफ कन्वर्जन के लिए कुख्यात जगह हैं। इन जगहों से कन्वर्जन और हिन्दू लड़कियों के अपहरण और जबरदस्ती निकाह का पूरा खेल खेला जाता है। 'ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान' अपने एक शोध में बताता है कि जबरदस्ती कन्वर्जन और निकाह के सबसे ज्यादा मामले सिंध एवं दक्षिणी पंजाब में होते हैं। इसी तरह पाकिस्तान में काम करने वाले अन्य स्वयंसेवी संगठन, मीडिया समूह, स्वतंत्र पत्रकार, बौद्धिक वर्ग मानते हैं कि पाकिस्तान में प्रत्येक महीने 70 से अधिक मामले अगवा एवं जबरदस्ती कन्वर्जन के होते हैं लेकिन इनमें एकाध ही उजागर हो पाते हैं बाकी को दबा दिया जाता है। हाल के दिनों में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है। इसमें पीडि़त महिलाएं एवं लड़कियां अधिकतर अनुसूचित जाति की होती हैं, जिनमें कोली, मेघवार एवं भील प्रमुख हैं। इन समूहों का मानना है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को किसी भी तरह का कोई संरक्षण प्राप्त नहीं है। सरकारें पीडि़तों का साथ देने के बजाय अपराधियों के साथ होती हैं, जिसके कारण उनको न्याय नहीं मिल पाता। हाल के कुछ वर्षों में सिंध सहित पूरे पाकिस्तान में मस्जिद-मदरसे और अन्य मजहबी केंद्रों की संख्या बढ़ी है। इन सभी का हिन्दू लड़कियों के कन्वर्जन, अपहरण, हत्या से बेहद निकट का नाता है। कहा जाता है कि इन मस्जिद-मदरसों को अरब देशों से भारी मात्रा में 'इस्लाम' के नाम पर पैसा मिलता है और उसका उपयोग हिन्दुओं के खिलाफ किया जाता है। इनके अलावा पाकिस्तान में कुछ ऐसे गैर-सरकारी संगठन हैं, जो वहां के अल्पसंख्यकों के विरुद्ध काम करते हैं। इनमें मुख्य रूप से मीनहज-उल-कुरान है। इसकी आधिकारिक नीति के तहत इसके सदस्य जितने अधिक कन्वर्जन करते हैं उन्हें सम्मानित किया जाता है और पैसों से मालामाल।
न्याय नहीं अन्याय का घर!
सिंध के वरिष्ठ पत्रकार जय प्रकाश मुरानी कहते हैं, ''पाकिस्तान की पुलिस और यहां का न्यायालय पूरी तरह से मुल्ला-मौलवियों के इशारों पर काम करता है, क्योंकि इन सबका नाता मजहबी नेताओं से लेकर रसूखदार परिवारों से है, जो इन्हें संरक्षण देने का काम खुलेआम करते हैं। दूसरी बात, अधिकतर मामलों में निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालय तक के ज्यादातर वकील मामले को लड़ने से ही मना कर देते हैं और जो लड़ते भी हैं वे अंत में विरोधी पक्ष से मिल जाते हैं।''
2016 में अमेरिका के स्टेट ह्यूमन राइट की एक रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान की न्याय-व्यवस्था में बाहरी तत्वों का दखल बहुत है। यह दखल कट्टरपंथियों का होता है। इस स्थिति में पाकिस्तान में किसी अल्पसंख्यक को न्याय मिलेगा, इसकी उम्मीद करना भी अपने को धोखा देना है। सच में पाकिस्तान अल्पसंख्यक समाज के लिए बहुत ही निर्दयी हो चुका है। यही वजह है कि वहां अल्पसंख्यकों की आबादी दिनोंदिन घटती जा रही है। इस पर विश्व समुदाय को विचार करना होगा।