अयोध्या मामला: यह हैं वह साक्ष्य जिन्हें सुनकर न्यायालय ने सुनाया फैसला
   दिनांक 14-नवंबर-2019
मनीष दीक्षित
काल यानी समय से बड़ा कुछ नहीं है. भारत की महत्वपूर्ण तारीखों में 15 अगस्त, 26 जनवरी और 6 दिसंबर की तरह साल 2019 में 9 नवंबर जुड़ना सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले की वजह से संभव हुआ जो उसने राम जन्मभूमि पर सुनाया.

 
करीब पांच सौ साल पुराने कानूनी विवाद के पटाक्षेप के साथ ही अयोध्या में राम जन्मभूमि पर मंदिर बनाने का मार्ग प्रशस्त हुआ. विवादित स्थल का अंदरूनी और बाहरी आहाता मंदिर बनाने के लिए दे दिया और मुस्लिमों को मस्जिद के लिए अयोध्या में ही वैकल्पिक स्थान पर पांच एकड़ जमीन देने का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुना दिया. अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए कहा कि साढ़े चार सौ सालों से ज्यादा के समय के दस्तावेजों, अदालती आदेश, गवाहियों और साक्ष्यों की जांच पड़ताल की लंबी और थकाऊ प्रक्रिया से गुजरकर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ फैसले की मंजिल तक पहुंची. लेकिन ये मंजिल इतनी आसानी से नहीं आई है.
इस मामले की कहानी को आसानी से जानने के लिए इतिहास में उलझे बगैर हम सीधे 1857 चलते हैं जब अंग्रेजों ने यहां ईंट और ग्रिल की दीवार बना दी थी. इससे बाद भी हिंदू यहां बेरोकटोक पूजा करते रहे. इस बात के भी प्रमाण हैं कि अंग्रेजों के अवध बनाने से पहले अंदरूनी आहाते में हिंदू पूजा करते थे. फैसले में कहा गया है कि मुस्लिम ऐसा कोई सुबूत नहीं दे सके जिससे ये संकेत मिले कि 1857 से पहले सोलहवीं शताब्दी में मस्जिद बनने तक के कालखंड में अंदरूनी आहाते में उनका कब्जा रहा. ग्रिल लगने और दीवार बनने के बाद इसके आसपास नमाज पढ़े जाने के साक्ष्य जरूर हैं. आखिरी बार जुमे की नमाज यहां 16 दिसंबर 1949 को पढ़ी गई. इसके बाद 22-23 दिसंबर की रात यहां मूर्तियां रखी गईं. कोर्ट ने इसे गलत बताया और कहा कि ये काम किसी कानूनी कार्रवाई के तहत नहीं बल्कि मुसलमानों को इस जगह से हटाने के इरादे से किया गया. वक्फ निरीक्षक की दिसंबर 1949 की रिपोर्ट ये संकेत देती है कि वहां मुस्लिमों को नमाज पढऩे के लिए निर्बाध प्रवेश करने से रोका गया इसके बाद यहां रिसीवर नियुक्त किया गया और अंदरूनी आहाते को अटैच कर दिया गया. फिर एक-एक कर कुछ सालों के अंतराल में गोपाल विशारद, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड अदालत पहुंचे अपनी-अपनी मांगें लेकर. अभी इन मामलों पर सुनवाई चल ही रही थी कि 1992 में विवादित ढांचा ढहा दिया गया. सुप्रीम कोर्ट ने इस काम को भी गलत करार दिया. इसके बाद 2010 में आया इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला जिसमें विवादित परिसर को तीन भागों में बांटने की बात कही गई. हाईकोर्ट के फैसले से सभी पक्षकार नाखुश थे. दरअसल, हिंदू-मुस्लिम समेत किसी पक्ष को पूरे परिसर से कम कुछ मंजूर नहीं था. कुल 14 अपीलें हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गईं जिन पर संविधान पीठ ने फैसला सुनाया. कोर्ट ने पूरे विवादित परिसर को मंदिर के लिए देने का फैसला सुनाया और सरकार से कहा कि वह तीन महीने के अंदर अयोध्या अधिग्र्रहण कानून के तहत ट्रस्ट बनाए. यही ट्रस्ट मंदिर निर्माण से जुड़े सारे फैसले करेगा. सरकार ट्रस्ट के मैनेजमेंट और अधिकारों के लिए जरूरी नियम बनाए जिसमें ट्रस्टियों को मंदिर निर्माण और संबंधित क्रियाकलापों को संचालित करने का अधिकार हो। विवादित परिसर के अंदर और बाहर का सारा भाग ट्रस्ट के हवाले किया जाए. जबतक जमीन ट्रस्ट बनाकर उसे सौंप नहीं दी जाती तबतक यह रिसीवर के ही पास रहेगी. सुप्रीम कोर्ट ने वैसे तो निर्मोही अखाड़े का केस खारिज कर दिया है लेकिन मंदिर निर्माण के लिए बनने वाले ट्रस्ट में उसके प्रतिनिधि को भी शामिल करने का आदेश दिया है. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने गोपाल सिंह विशारद को उपासक के तौर पर पूजा के अधिकार को स्वीकार कर लिया है. अदालत ने कहा है कि पूजा अर्चना का अधिकार सक्षम प्राधिकारी के नियंत्रण और निर्देश के अधीन होगा.

 
 
संविधान पीठ ने सुप्रीम कोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए मुस्लिमों को पांच एकड़ वैकल्पिक जमीन देने जैसा प्रावधान किया. वर्ना जमीन के मालिकाना हक के दीवानी मामले में पक्षों को उसी जमीन या अचल संपत्ति पर कब्जा मिलता है चाहे बंटवारा ही क्यों न हो जाए. अदालत ने कहा कि अगर मुस्लिमों के हकों की अनदेखी की जाती है तो न्याय नहीं होगा। उनको मस्जिद से जिस तरीके से वंचित किया गया वह तरीका कानून को मानने वाले एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में कभी नहीं अपनाया जाता। संविधान सभी धर्मों को समान नजरिये से देखता है. कोर्ट ने कहा, सहिष्णुता सहअस्तित्तव, और धर्मनिरपेक्षता इस देश और जनता की प्रतिबद्धता है।
खास बात यह है कि मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण व जस्टिस एस. अब्दुल नजीर की संविधान पीठ ने एकमत से यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया और विवादित परिसर को तीन हिस्सों में बांटने का इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश अनुचित ठहराते हुए खारिज किया. अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट का आदेश लागू करना व्यवहारिक नहीं है. संविधान पीठ ने कहा कि हम पर बेमिसाल केस के तथ्यों की छानबीन की जिम्मेदारी है. विवाद अचल संपत्ति को लेकर है. कोर्ट मालिकाना हक का फैसला आस्था के आधार पर नहीं बल्कि प्रमाणों के आधार पर कर रही है. कानून में मालिकाना हक और सुपुर्दगी के पैमाने निर्धारित हैं. विवादित संपत्ति में मालिकाना हक का फैसला करते वक्त अदालत साक्ष्य के तय सिद्धांतों को अमल में लाती है.
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस मुकदमे में एक कठिन काम 500 साल के इतिहास से जुड़े दस्तावेजी साक्ष्यों की जांच पड़ताल था. इस जटिलता को हाईकोर्ट ने भी माना. अयोध्या का धार्मिक महत्व और वैष्णवों के लिए इसकी महत्ता परखते समय पुराणों और धर्मग्रंथों के सहारे निश्चित जन्मस्थान तलाश करना बहुत मुश्किल था. सवाल ये भी था कि ढांचे के नीचे क्या है. इन सवालों के जवाब इतिहास की किताबों में ढूंढने से कोई साफ तस्वीर नहीं मिलती. तब के दस्तावेजी सुबूत भी सवालों का ठीक जवाब नहीं देते. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में जस्टिस सुधीर अग्रवाल को उद्धृत किया है. अग्रवाल ने कहा, इतने दस्तावेजों में पहेलियों के जवाब तलाशते हुए कुछ पहलू उभरे हैं और उनको सारगर्भित तरीके से लिया जाए तो सवालों के जवाब मिल सकते हैं. अय़ोध्या का पुरातन महत्व निर्विवाद है. इस पर भी कोई विवाद नहीं है कि ये राम के उपासक वैष्णवों का प्रमुख धार्मिक केंद्र है. राम का जन्म अयोध्या में हुआ और उनका यहां शासन था. धार्मिक ग्रंथ और वाल्मीकि रामाय़ण और तुसलीदास रचित रामचरितमानस और स्कंदपुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि राम का जन्म अयोध्या में हुआ लेकिन ठीक स्थान का वर्णन नहीं है. श्रवण परंपरा और आस्था और परंपराओं के अलावा महाकाव्यों, संगीत और उत्सवों को देखा जाए तो जन्मस्थान के बारे में अनेक पहलू स्पष्ट नजर आते हैं.
मुस्लिमों के दावे का विश्लेषण

 
मुस्लिमों का कब्जे का दावा कुछ प्रमुख संभावनाओं पर आधारित है. मुस्लिम पक्ष का कहना है कि मस्जिद का निर्माण 1528 में बाबर के कहने पर हुआ लेकिन मस्जिद के उपयोग या वहां पर निर्माण के समय से 1856 तक नमाज का कोई उल्लेख नहीं है. अंग्रेजों द्वारा वहां ग्रिल लगवाए जाने के 325 साल पहले तक विवादित स्थल पर मुस्लिमों के कब्जे का कोई प्रमाण नहीं दिया गया. यानी नमाज का प्रमाण इसके विपरीत टाइफेनथेलर और मोंटगुमरी मार्टिन के यात्रा वृतांत उस जगह पर हिंदुओं के पवित्र स्थान यानी भगवान राम की जन्मभूमि होने का विस्तृत ब्योरा देते हैं. यात्रा वृतांत यहां पर हिंदुओं के पूजा करने का भी विवरण देते हैं. विलियम फिंच ने 1608-11 और टाइफेनथेलर ने 1743-1785 के बीच भारत की यात्रा की और अय़ोध्या का दौरा किया. दोनों के स्पष्ट विवरण वहां हिंदुओं के पूजा करने का ठोस विवरण देते हैं.
टाइफनथेलर ने सीता रसोई, स्वर्गद्वार और बेदी, जहां राम का जन्म हुआ, का विवरण दिया है. इन विवरणों में वहां धार्मिक उत्सवों का भी ब्योरा है. टाइफेनथेरल के ब्योरे मस्जिद के सामने 18वीं शताब्दी में ग्रिल लगाए जाने से पहले के हैं. उसने वहां पर चूने से बनी जमीन से पांच इंच ऊंची बेदी का जिक्र किया है. उसने यह भी लिखा है कि यहां भगवान राम के रूप में भगवान विष्णु का जन्म हुआ. टाइफनथेलर ने ये भी कहा कि माना जाता है या तो औरंगजेब या बाबर ने इस जगह को तुड़वाया. लेकिन उसने लिखा कि ये भगवान राम का घर है और हिंदू इसकी परिक्रमा और यहां साष्टांग दंडवत करते हैं.
अय़ोध्या में 1856 में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद अंग्रेजों ने ग्रिल लगवाई और दीवार बनवाई ताकि दोनों पक्षों के बीच शांति बनी रहे. इसके ठीक बाद रामचबूतरे का विवाद शुरू हुआ जहां हिंदुओं ने भगवान राम की पूजा शुरू की. इनर कोर्टयार्ड से बेदखली की आशंका के बाद हिंदू इसी रामचबूतरे से पूजा करने लगे.
एएसआई रिपोर्ट--नीचे मंदिर की संरचना ऊपर मस्जिद

 
एएसआइ की रिपोर्ट के आधार पर ये कुछ तथ्य क्रमबद्ध होते हैं. एएसआइ की रिपोर्ट कहती है कि खुदाई से कई सभ्यताओं के अवशेष यहां पर मिले हैं और इनमें पॉलिश किए बर्तन भी शामिल हैं जो कि ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के हैं. खुदाई से यहां 12वीं शताब्दी की जमींदोज संरचना का पता चला. यह संरचना आकार में बड़ा था और इसमें 85 खंभे थे. 17 पंक्तियों में पांच खंभों के आधार थे. प्रत्यक्ष तौर पर ये संरचना हिंदू धर्म से जुड़ी हुई थी. विवादित मस्जिद का निर्माण इसी पहले से बनी संरचना पर हुआ था. मस्जिद के निर्माण में पहले से मौजूद संरचना की दीवारों का उपयोग नींव के तौर पर किया गया. कई परतों में हुई खुदाई से भी यहां एक मंदिर होने की बात पता चली. जैसे पार्ट पी 906 का मकर परनाला आठवीं शताब्दी का निकला. एएसआइ रिपोर्ट में हिंदू धर्म के प्रतीकों का मिलना बताया गया लेकिन यह नहीं बताया गया कि इन्हें ढहाने और मस्जिद बनाने की वजह का जिक्र नहीं किया गया. मुमकिन है कि 12वीं शताब्दी के ढांचे और मस्जिद बनने के कालखंड में एक बड़ा वक्त गुजर गया हो. इस गुजरे दौर में वहां क्या रहा इसके सुबूत नहीं मिले.
आइने अकबरी में राम का जिक्र, मस्जिद का नहीं
अबुल फजल की मशहूर पुस्तक आइने अकबरी के रामअवतार खंड में कहा गया है कि राम का जन्म त्रेता युग में चैत्र माह शुक्ल पक्ष (मार्च-अप्रैल) की नवमी को अयोध्या में हुआ. अयोध्या को तब के सबसे बड़े शहरों में एक था. भीड़भाड़ वाला ये शहर 148 कोस की लंबाई और 36 कोस की चौड़ाई में बसा था. पुस्तक के फुटनोट संदर्भ में भगवान राम को 7वां अवतार कहा गया है. आइने अकबरी के जिक्र पर मुस्लिम पक्ष के वकील जफरयाब जिलानी ने जोर देकर कहा कि इस सबसे वहां राम जन्मभूमि मंदिर होने या जन्मस्थान की निश्चित जगह का पता नहीं चलता. इस पर अदालत ने कहा कि एक किताब में क्या नहीं लिखा है इसके आधार पर नकारात्मक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता. अगर इस संदर्भ में मंदिर का वर्णन नहीं है तो समान रूप से मस्जिद का भी जिक्र नहीं है.
जिस दिन से फैसला है, आया कुछ मुखर होकर और कुछ दबी जुबान फैसले पर सवाल उठा रहे हैं. अब फैसला आ चुका है, वह भी देश की सबसे बड़ी अदालत का जिसके बाद कोई अपील दलील नहीं होती. हां एक पहलू पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का कानून में बचा है, लेकिन उसकी प्रक्रिया तय है और जो प्रक्रिया तय है, उसमें फैसले में बदलाव होने या संशोधन होने की बहुत कम ही गुंजाइश होती है. सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने और उस पर सुनवाई का जो नियम है उसमें किसी भी फैसले के खिलाफ 30 दिन के भीतर ही पुनर्विचार याचिका दाखिल की जा सकती है. इसके अलावा कोर्ट पुनर्विचार याचिका पर सिर्फ तभी विचार करता है जबकि फैसले में स्पष्ट तौर पर खामी यानी कोई कमी नजर आ रही हो। पुनर्विचार याचिका में कोर्ट नए सिरे से तथ्यों को नहीं खंगालता। इसके अलावा पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई वही पीठ करती है जिसने फैसला सुनाया होता है. याचिका पर सुनवाई भी न्यायाधीश चैम्बर के अंदर सर्कुलेशन के जरिए करते हैं यानी फाइल और दस्तावेजों को देखकर फैसला लेते हैं, वहां वकीलों की बहस या खुली अदालत में सुनवाई नहीं होती. बहुत कम मामले ऐसे होते हैं जिसमें कोर्ट खुली अदालत में पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के लिए राजी होता है. अयोध्या राम जन्मभूमि के मामले में ऐसी कोई स्पष्ट खामी नजर नहीं आ रही है जिस पर कोर्ट खुली अदालत में पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई को राजी हो ऐसा इसलिए लग रहा है क्योंकि पांच न्यायाधीशों ने 40 दिन तक विस्तृत सुनवाई के बाद फैसला दिया है. पक्षकारों ने हर नजरिये से अपनी दलीलें रखी थीं, उस पर न्यायाधीशों ने केस समझने के लिए सुनवाई के दौरान बहुत से सवाल भी पूछे ताकि तथ्यों को लेकर कोई भ्रम न रह जाए. ऐसे में यह कहा जाना कि कोर्ट ने जब माना है कि मस्जिद थी तो फिर कैसे उन्हें हक नहीं मिला आदि दलीलें देना जरा सतही लगता है. फैसला देते वक्त कोर्ट की तथ्यों और कानून को लेकर समझ बिल्कुल स्पष्ट नजर आ रही है. यह एक साबित तथ्य है कि जिस जमीन पर मालिकाना हक का दावा किया जा रहा था वह जमीन नजूल यानी सरकार की है. कानून का तय सिद्धांत है कि नजूल की जमीन पर कोई मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता. इस मामले में जमीन पर दावा करने वाले पक्षकारों के मुकदमे पर इसलिए विचार किया गया क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार जो कि जमीन की मालिक है, उसने उस पर कोई दावा नहीं किया था. प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट में ही स्पष्ट कर दिया था कि वह इस मामले में तटस्थ है और अपनी ओर से कोई दावा या दलीलें नहीं रखेगी. इसलिए अब इस फैसले में किसी बदल की गुंजाइश कम से कम कोर्ट की दहलीज पर तो नहीं दिखती है. हां, समय अयोध्या में करवट जरूर लेगा जहां इस फैसले को अमली जामा पहनाया जाएगा और हर साल 9 नवंबर को याद किया जाएगा.

तो क्या सुन्नी वक्फ बोर्ड छोड़ रहा था दावा ?
सुप्रीम कोर्ट ने 8 जनवरी 2019 को अय़ोध्या मसले पर अपीलों की सुनवाई के लिए संविधान पीठ का गठन किया औऱ इस पीठ ने सुलह की संभावनाएं तलाशने के लिए कमेटी बनाई जिसमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस एफ.एम. कलीफुल्ला, धार्मिक नेता श्री श्री रविशंकर और वकील श्रीराम पंचू शामिल थे. 8 मार्च को बनी इस कमेटी से 10 मई तक मध्यस्थता की प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया लेकिन कोई नतीजा न निकलने पर 6 अगस्त से मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई जो कि 16 अक्टूबर तक चली। 16 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया लेकिन इसी दिन मध्यस्थात कमेटी ने दूसरे दौर की मध्यस्ता में हुई प्रगति पर अपनी रिपोर्ट भी कोर्ट में दी. इस रिपोर्ट का जिक्र सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में किया है. कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट मध्यस्थता में समझौते की बात कह रही है और इस समझौते पर सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन जुफर अहमद फारुकी के दस्तखत भी हैं. इसमें सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड विवादित स्थल से अपने सभी दावे, हित और अधिकार छोड़ने को तैयार है लेकिन इसके लिए उसने शर्तें भी लगाईं. कोर्ट ने कहा कि उसे प्राप्त समझौते पर अन्य पार्टियां के दस्तखत नहीं हैं इसलिए इस समझौते को अन्य पक्षकारों पर बाध्यकारी नहीं माना जा सकता. इसके अलावा समझौता शर्तों के साथ है उसमें कुछ चीजें पूरी करने की बात कही गई है इसलिए भी इसे पूर्ण समझौता नहीं कहा जा सकता.
हिंदुओं-मुसलमानों पर बाध्यकारी है फैसला
यह मुकदमा दो पक्षों के बीच महज जमीन विवाद नहीं है. यह मुकदमा देश के दो बड़े समुदायों के बीच प्रतिनिधि वाद (रिप्रेजेंटेटिव सूट) है और इस पर आया यह फैसला दोनों समुदायों के हर व्यक्ति पर बाध्यकारी है. इस मुकदमे को प्रतिनिधिवाद मुस्लिम पक्ष ने ही बनाया था. सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने 1961 में जब मुकदमा दाखिल कर विवादित स्थल पर स्थिति ढांचे को मस्जिद घोषित करने की मांग की थी, उसी समय उसने अपने मुकदमे के साथ एक अर्जी देकर मुकदमे को प्रतिनिधि वाद बनाए जाने की भी मांग की थी. इस अर्जी पर कोर्ट ने सुनवाई की और बाद में कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए कोर्ट के आदेश से मुकदमे को प्रतिनिधि वाद बनाया गया. इसके लिए अखबार मे विज्ञापन निकला था और बाद में हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए हिन्दू महासभा को पक्षकार के तौर पर जोड़ा गया था. मुस्लिमों की ओर से सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड प्रतिनिधि था.
चार मूल केस और 14 अपीलें
वास्तव में इस मुकदमे में चार मूलवाद थे, जिनमें हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद दोनों पक्षकारों की ओर से कुल 14 अपीलें दाखिल की गई थीं. जिसमे छह अपीलें हिन्दू पक्षकारों की और आठ अपीलें मुस्लिम पक्षकारों की ओर से थी. अपील करने वालों में रामलाल विराजमान भी शामिल थे क्योंकि जन्मभूमि का बंटवारा उन्हें भी मंजूर नहीं था. जब दिसंबर 1949 में केन्द्रीय गुंबद के नीचे रामलला की मूर्ति रखी गई और बाद में कोर्ट के आदेश से पूरी संपत्ति अटैच कर ली गई तब 1950 में पहला मुकदमा दाखिल हुआ था और यह मुकदमा गोपाल सिंह विशारद ने उपासक की हैसियत से दाखिल किया था। मुकदमे में विशारद ने कोर्ट से पूजा अर्चना का अधिकार मांगते हुए यह भी गुहार लगाई थी कि वहां रखी मूर्तियां हटाने पर रोक लगाई जाए। इस मुकदमे पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने वहां से रामलला की मूर्ति हटाने पर रोक लगाई साथ ही उनकी पूजा अचर्ना जारी रखने का आदेश दिया यह आदेश तबसे आजतक लागू रहा और वहां रामलला की पूजा अनवरत जारी रही. हालांकि वहां मूर्ति रखे जाने के बाद से मुसलमानों का जाना और नमाज पढ़ना बंद हो गया था. मूर्तियां रखे जाने के पहले से लेकर आजतक वहां पूजा जारी रहना केस का निणार्यक पहलू साबित हुआ. लगातार पूजा-अर्चना जारी रहने और किसी भी पक्ष द्वारा रामलला को अपने मुकदमे में पक्षकार न बनाये जाने के कारण रामलला की ओर से सबसे देर में मुकदमा दाखिल किए जाने के बावजूद सुप्रीम कोटर् ने उनके मुकदमे को समयबाधित यानी कानून की निगाह में मुकदमा दाखिल करने के लिए तय समयसीमा के बाहर नहीं माना जबकि गोपाल सिंह विशारद के नौ साल बाद 1959 में मुकदमा दाखिल करने वाले निर्मोही अखाड़ा का मुकदमा सुप्रीम कोर्ट ने समयबाधित होने के आधार पर खारिज किया है. निमोर्ही अखाड़ा ने अपने मुकदमे मे सेवादारी का दावा करते हुए कब्जा दिलाए जाने की मांग की थी. तीसरा मुकदमा सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने 1961 में दाखिल किया और उसमें कोर्ट से विवादित ढांचे को मस्जिद घोषित करने की मांग की. इन तीनों मुकदमों में रामलला को पक्षकार नहीं बनाया गया था इसलिए 1989 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत न्यायाधीश देवकी नंदन अग्रवाल ने रामलला के निकटमित्र बनकर उनकी ओर से मुकदमा दाखिल किया. इस बीच 1950 में महंत रामचंद्रदास ने भी मुकदमा दाखिल किया था लेकिन वह मुकदमा बाद में वापस ले लिया गया था इसलिए हाईकोर्ट में सुनवाई सिर्फ चार मुकदमों पर ही हुई।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सार
 
अंदरूनी और बाहरी परकोटे समेत विवादित ढांचा परिसर की पूरी जमीन पर मंदिर बनेगा.
मंदिर के लिए केंद्र सरकार तीन महीने में ट्रस्ट बनाएगी. विवादित परिसर इसी ट्रस्ट के हवाले किया जाएगा. ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े का प्रतिनिधि भी होगा. हालांकि निर्मोही अखाड़े की अर्जी खारिज हो गई है.
मंदिर बनाने आदि से जुड़ी सारी शक्तियां ट्रस्ट के पास होंगी.
मस्जिद तोड़े जाने के एवज में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ जमीन अयोध्या में ही दूसरी जगह दी जाएगी. ये जमीन केंद्र या राज्य सरकार देगी.
- मुस्लिम पक्ष को मिली जमीन पर सुन्नी वक्फ बोर्ड अपने हिसाब से मस्जिद बनवा सकेगा.