इमरान खान पर क्यों भड़के हैं पाकिस्तान के लोग ?
   दिनांक 14-नवंबर-2019
 संतोष कुमार वर्मा
कश्मीर के मुद्दे पर दुनिया में आतंक के पोषक के नाते पहचाने जाने लगे प्रधानमंत्री इमरान खान के खिलाफ अब इस्लामाबाद में बज रही खतरे की घंटी। एकजुट विपक्ष उनके इस्तीफे पर अड़ा,फजलुर्रहमान का दबाव बढ़ा

 
 पाकिस्तान में इमरान से आजादी की मांग करते तमाम विपक्षी दलों के समर्थक (फाइल चित्र )
पिछले कई दिनों से पाकिस्तान में मौलाना फजलुर्रहमान और उनकी राजनीतिक पार्टी जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के हजारों समर्थक राजधानी इस्लामाबाद में धरना देकर बैठे हुए हैं। पाकिस्तान में पहले से कूटनीतिक और आर्थिक संकट से जूझ रही इमरान सरकार की जान सांसत में अटक गई है। वहां के राजनीतिक जानकार इसे इमरान पर जबरदस्त दबाव मान रहे हैं। उनका कहना है कि सेना की मदद से इमरान सरकार भले इस संकट से उबर जाए पर वह कितने दिन टिकी रहेगी, यह नहीं कहा जा सकता।
उल्लेखनीय है कि मौलाना फजलुर्रहमान की अगुआई में हजारों की संख्या में नारेबाजी करते और झंडे लहराते हुए जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के कार्यकर्ताओं के 'आजादी मार्च' ने गत 31 अक्तूबर को राजधानी इस्लामाबाद में प्रवेश किया था। इस 'मार्च की शुरुआत, सिंध प्रांत से हुई थी। 4 नवम्बर की रात को इस्लामाबाद में यह मार्च सम्पन्न हुआ था। इससे पहले, सत्तारूढ़ दल और विपक्षी पार्टियां सरकार विरोधी मार्च को योजना के अनुसार आगे बढ़ाने के लिए एक समझौते पर पहुंचीं कि सरकार इसके खिलाफ तब तक कोई कार्रवाई नहीं करेगी, जब तक कि प्रदर्शनकारी इस्लामाबाद में संवेदनशील 'रेड जोन' को पार नहीं करते।
उल्लेखनीय है कि देश के मुख्य विपक्षी दलों, जैसे पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) ने इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के खिलाफ जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के विरोध का समर्थन किया है, जिसने पिछले साल का आम चुनाव जीता था। परन्तु धरने के दौरान ही बड़ी असमंजस की स्थितियां पैदा हो गई हैं। पीएमएल-एन नेतृत्व ने 4 नवम्बर को यह घोषणा की कि यदि मौलाना फजलुर्रहमान का 'आजादी मार्च' हिंसक रुख अपनाता है तो वे इस मार्च से समर्थन वापस ले लेंगे। पीपीपी भी यह स्पष्ट कर चुकी है। वह जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल द्वारा किये जा रहे विरोध को केवल नैतिक समर्थन ही दे रही है। प्रधानमंत्री इमरान खान के नेतृत्व में पाकिस्तान की लगातार बिगड़ती आर्थिक स्थिति और चुनावी धांधली इस आन्दोलन के प्रमुख मुद्दे हैं। इसके अलावा अवामी नेशनल पार्टी और कई अन्य छोटे दल भी इस मुहिम में शामिल हैं । पाकिस्तान की कानून प्रवर्तन एजेंसियों के अनुसार, 25,000 से अधिक लोग जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के इस मार्च में शामिल हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक मार्च में जुड़े दलों, नेताओं और सरकार के बीच गतिरोध बना हुआ है। लिहाजा यह देखना दिलचस्प होगा कि पाकिस्तान की सियासत अब क्या मोड़ लेगी।
दिलचस्प इसलिए क्योंकि जैसा पहले कहा गया है, पाकिस्तान की सेना इमरान खान के पक्ष में सक्रिय हो गई है जिसके कारण आन्दोलन को लेकर संशय की स्थिति उत्पन्न हो गई है। मौलाना ने कुछ मीडिया समूहों से बात करते हुए आन्दोलन को अनिश्चितकाल तक के लिए चलाने से इनकार किया है, साथ ही सेना प्रमुख जनरल बाजवा के इस्तीफे की मांग से पल्ला झाड़ लिया है। ये संकेत साफ दिखा रहे हैं कि इस आन्दोलन से बड़े राजनैतिक दल पीछे हट रहे हैं और अगर इस दौरान कुछ भी हिंसक गतिविधि होती है तो सेना बलपूर्वक उसे काबू करने हेतु तत्पर है ।
विवादों का साया
दरअसल विपक्षी दलों में एकजुटता का अभाव इस आन्दोलन में शुरू से ही दिखाई देता आया है। पाकिस्तान के राजनीतिक दल इमरान खान के सत्ता में आने को 'इलेक्शन' से अधिक 'सिलेक्शन' का विषय मानते हैं और इसके लिए पूरी तरह से सेना जिम्मेदार है, जो विपक्षी दलों के विरोध का एक प्रमुख मुद्दा है। परन्तु शुरुआत से अब तक इस आन्दोलन के मुद्दों के प्रति विपक्षी दलों के रुख में उतार-चढ़ाव आता रहा है। पाकिस्तान मुस्लिम लीग-एन (पीएमएल-एन) ने जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के इस 'आजादी मार्च' रूपी सरकार विरोधी आंदोलन को शुरू करने के लिए सैद्धांतिक रूप से सहमति दे दी थी पर लाहौर की रैली के लिए पाकिस्तान मुस्लिम लीग-एन का कोई भी नेता नहीं पहुंचा जिसने अनेक कयासों को जन्म दिया। वहीं पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो-जरदारी ने शुरू में इस आन्दोलन में किसी भी सहभागिता से साफ इनकार कर दिया था। हालांकि बिलावल ने भी सरकार की कश्मीर नीति की आलोचना करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने निर्दोष कश्मीरियों की आवाज बनने की कोशिश नहीं की। ''वह (इमरान) हर घोषणा पर यू-टर्न लेता है...न तो हम और न ही कोई अन्य पाकिस्तानी कश्मीर विवाद पर सरकार की अक्षमता को बर्दाश्त कर सकता है।'' हालांकि इसके बाद उनका दल भी इस मार्च में सक्रियता से शामिल हुआ। इसके अलावा, एक अन्य मजहबी पार्टी जमात-ए-इस्लामी, जिसने मुत्तहिदा मजलिस-ए-अमल की छतरी तले जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम -फजल के साथ गठबंधन में पिछले साल का आम चुनाव लड़ा, ने भी इस आन्दोलन का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है।
आजादी मार्च और भारत
पाकिस्तान के शासक हमेशा ही उनके यहां होने वाली अव्यवस्था के लिए भारत को दोषी ठहराते आये हैं। 'आजादी मार्च' में भी यही देखने को मिला। भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर में किये गए संविधानसम्मत परिवर्तनों को लेकर पाकिस्तान में गंभीर प्रतिक्रया देखी गई। जहां शुरुआती दौर में पाकिस्तान की सभी राजनैतिक पार्टियों ने अनमने तरीके से सरकार के समर्थन की बात तो की, पर जैसे ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान अलग-थलग पड़ने लगा, विपक्षियों के असंतोष का लावा फूट पड़ा। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने दावा किया है कि उन्हें सेना का पूर्ण समर्थन हासिल है और वे इस्तीफे के लिए विपक्ष की मांग को पूरा नहीं करेंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के प्रमुख मौलाना फजलुर्रहमान के 'आजादी मार्च' के पीछे भारत का हाथ है। यह पूछे जाने पर कि क्या विदेशी एजेंडे का कोई सबूत मिला है, उन्होंने कहा कि कोई सबूत नहीं है, लेकिन मार्च का समय और क्षेत्रीय स्थिति बताती है कि इसके पीछे 'भारतीय हाथ' है।
उल्लेखनीय है कि इस आन्दोलन के नाकाम होने की सूरत में इमरान खान ने उससे फायदा उठाने की कोशिश की और सेना के साथ गठजोड़ द्वारा सत्ता प्राप्ति के आरोपों को पलटते हुए राष्ट्रहित के लिए सेना के समर्थन को आवश्यक बताया। उन्होंने यह भी कहा कि सेना सरकार के एजेंडे का पूरी तरह से समर्थन करती है। इमरान ने कहा, ''नागरिक-सैन्य संबंध विश्वास पर आधारित हैं और दोनों को एक-दूसरे पर भरोसा है।'' इमरान ने मौलाना को लेकर सीधे प्रश्न उठाया कि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि उनकी समस्या क्या है। उन्होंने स्वीकार किया कि महंगाई और बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है, जिसे उनकी सरकार सुलझाने की कोशिश कर रही है।
आन्दोलन के पीछे वजह
मौलाना फजलुर्रहमान का मानना है कि वर्तमान सरकार ने कश्मीर के प्रति गहन अकर्मण्यता का परिचय दिया है। उन्होंने पीटीआई की अगुआई वाली सरकार पर कश्मीर को 'बेचने' का आरोप लगाया और राष्ट्र से भारत के कब्जे वाले क्षेत्र की आजादी के लिए अपने संकल्प को ताजा करने को कहा। मौलाना ने इमरान सरकार पर तंज कसते हुए कहा,''नकली सरकारें एक राष्ट्र का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकतीं...पाकिस्तान के शासक कश्मीर को बेचने वाले हैं और ऐसे शासकों को कश्मीरियों के सामने आने की हिम्मत नहीं करनी चाहिए''। उन्होंने कहा कि ''5 अगस्त को नरेंद्र मोदी के कदम ने एक नए विवाद को जन्म दिया है और ऐसे वक्त हमें ऐसा नेता मिला है, जिसके नेतृत्व से पूरा देश शर्मिंदा है। 'पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी की अगुआई वाली संघीय सरकार ने देश में कयामत बरपा रखी है। हमें इस देश के अस्तित्व के लिए लड़ना होगा।''
क्या चाहते हैं मौलाना फजलुर्रहमान!
परन्तु मौलाना फजलुर्रहमान जो कुछ कह रहे हैं वही पूर्ण सत्य है, ऐसा भी नहीं। पाकिस्तान की राजनीति में भारत का विरोध और कश्मीर एक 'कॉर्नर स्टोन' की तरह है। वहां का हर दल और नेता, भले ही उसके स्वार्थ कुछ भी क्यों न हों, भारत के विरोध के द्वारा अपनी छवि चमकाने का प्रयास करता ही है। वही मौलाना के साथ हो रहा है। उनके सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया था। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल का सरकार विरोधी आंदोलन शुरू करने का सबसे बड़ा कारण यह है कि पीटीआई और इमरान खान की राजनीति ने मजहबी दलों, खासकर जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल को उन क्षेत्रों में नेशनल असेम्बली के चुनाव में अपूरणीय क्षति पहुंचाई है, जो कभी इसके गढ़ हुआ करते थे। 2018 के राष्ट्रीय चुनावों ने जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल को लगभग खत्म कर दिया गया और स्वयं फजलुर्रहमान हार गए। वे लंबे अंतराल के बाद नेशनल असेंबली में जगह नहीं बना सके। इसके साथ ही उन्होंने कश्मीर कमेटी के चेयरमैन के लंबे समय से कब्जाए पद को भी खो दिया।
फजलुर्रहमान सत्ता के साथ चिपकने वाले नेता माने जाते हैं और 1990 के दशक की शुरुआत से ही जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल लगभग सभी सरकारों का हिस्सा रही है, चाहे वह किसी भी दल की सरकार रही हो। उल्लेखनीय है कि जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल 2002-2007 तक बलूचिस्तान में पीएमएल-क्यू सरकार का भी हिस्सा थी, जब जनरल परवेज मुशर्रफ का सत्ता पर नियंत्रण था। इस तथ्य के बावजूद कि उन दिनों छह कट्टरपंथी इस्लामिक दलों के गठबंधन, मुत्तहिदा मजलिस-ए-अमल (एमएमए) का नेतृत्व जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल ही कर रही थी, जिसका मूल ही मुशर्रफ का विरोध था।
और आज, फजलुर्रहमान 'लोकतंत्र और संविधान की खातिर' पीएमएल-एन और पीपीपी के साथ-साथ अपनी धुर विरोधी और गैरमजहबी अवामी नेशनल पार्टी का समर्थन करते हैं। आज जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल का मुख्य मकसद सत्ता में हिस्सेदारी प्राप्त करना है , और इसके लिए वह कुछ भी करने को तत्पर है, किसी से भी हाथ मिलाने को तैयार है। विकीलिक्स ने खुलासा किया था कि 2002 के चुनावों में एमएमए की अभूतपूर्व सफलता के बाद, पाकिस्तान में तत्कालीन अमेरिकी राजदूत ऐनी पैटरसन के साथ बैठक में मौलाना फजल ने उन्हें बताया था कि वे वाशिंगटन की हर इच्छापूर्ति के लिए तैयार हैं बशर्ते अमेरिका उन्हें पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने में सहायता करे।
इमरान खान की पार्टी ने खैबर पख्तूनख्वा में जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल को बुरी तरह से मात दी है। बलूचिस्तान के पश्तून बहुल भाग के साथ खैबर पख्तूनख्वा और फाटा, दोनों ही जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के पारंपरिक गढ़ रहे हैं। यहां बहुसंख्यक कबाइली लोगों में शिक्षा का अभाव और वहां के अति-रूढि़वादी मौलवियों का ज्यादा ही प्रभाव रहा है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल ने इन क्षेत्रों में अपने सामाजिक प्रभाव का इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने में किया है। सत्ता से बाहर रहने से जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल की हताशा में इजाफा हुआ है और इसलिए यह फिर से अपने प्रभाव में वृद्धि के लिए इस मौके को भुनाने की पूरी कोशिश कर रही है।
पाकिस्तान की वर्तमान दशा और दिशा
आज पाकिस्तान की राजनीति गहन द्वंद्व में फंस गई है। एक तरफ कट्टरपंथी इस्लामिक धड़ा है, जो देश को गर्त में ले जा रहा है वहीं दूसरी ओर एक ऐसा वर्ग भी है जो पाकिस्तान को इस दलदल से निकलकर विकास की राह पर अग्रसर होते देखना चाहता है। विडंबना तो यह पाकिस्तान की सेना को इस्लामिक कट्टरपंथ पर टिकाए रखने के लिए इमरान खान जैसा कुशल अभिनेता और 'कप्तान' मोहरे के रूप में मिल चुका है। ऐसी स्थिति में सेना फजलुर्रहमान और उनके जैसे खांटी कट्टरपंथियों से दूरी बनाये हुए है और यही फिलहाल इमरान खान के सत्ता में बने रहने की वजह है।