संपादक नहीं, विज्ञापन तय कर रहे सुर्खियां
   दिनांक 15-नवंबर-2019
प्रदूषण पर केजरीवाल की गलत बयानी उछाली, पर आंकड़ों की हेराफेरी दबाई
 
स्वस्थ लोकतंत्र के लिए मीडिया की आजादी जरूरी है लेकिन अखबार और चैनल अगर सरकारी विज्ञापनों के लिए अपनी आजादी को गिरवी रख दें तो इसके लिए किसे दोषी माना जाए? दिल्ली में इन दिनों कुछ ऐसा ही हो रहा है। इसी का असर है कि मीडिया को जलते खेत तो दिख गए, लेकिन दिल्ली के अंदर प्रदूषण के कारण नहीं दिखाई दिए। जो मुख्यमंत्री कुछ दिन पहले तक पूरे पेज के विज्ञापन देकर दिल्ली में प्रदूषण की समस्या हल कर देने का दावा कर रहा था, उसे जवाबदेह ठहराने के बजाय अधिकतर अखबारों और चैनलों ने लोगों को भ्रमित करने पर ज्यादा ध्यान दिया। कुछ चैनलों पर किसानों के लिए ऐसी टिप्पणियां की गईं जो कतई सही नहीं मानी जा सकतीं। ऐसी हर वह खबर दबाई गई जिससे प्रदूषण के मोर्चे पर अरविंद केजरीवाल सरकार की विफलता खुलकर सामने आती हो। दिल्ली की मीडिया का सारा जोर हरियाणा और केंद्र सरकार को दोषी ठहराने पर था, जबकि सैटेलाइट तस्वीरों के अनुसार सबसे ज्यादा खेत पंजाब में जलाए गए।
बीबीसी और जनसत्ता ने खबर छापी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े एक किसान संगठन ने कहा है कि पराली जलाते रहेंगे चाहे कुछ भी हो जाए। जबकि यह बात कांग्रेस से जुड़े किसान संगठन ने कही थी। यह कैसे मान लिया जाए कि इन संस्थानों में काम करने वाले पत्रकारों का सामान्य ज्ञान इतना कमजोर है? वास्तव में ऐसी गलतियां बहुत सोच-समझकर योजना के तहत की जाती हैं ताकि लोगों के बीच कोई झूठी राय स्थापित की जा सके। बाद में कहीं कोने में छपा छोटा सा खंडन देखने वैसे भी कोई नहीं आता। झूठ फैलाने के मीडिया के इस खेल के बीच कुछ अपवाद भी रहे, जैसे कि टाइम्स नाऊ ने बताया कि कैसे दिल्ली सरकार ने पर्यावरण रक्षा के लिए वसूले जाने वाले टैक्स का 80 प्रतिशत हिस्सा खर्च ही नहीं किया।
गांधी परिवार सत्ता में हो या न हो, मीडिया पर उसका नियंत्रण देखने लायक रहता है। प्रियंका वाड्रा न तो सांसद हैं, न विधायक, लेकिन उनके ट्वीट आजकल चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज बन रहे हैं। मानो विपक्ष के किसी बड़े नेता का बड़ा राजनीतिक बयान हो। प्रियंका वाड्रा आए दिन झूठ या दुष्प्रचार ट्वीट करती रहती हैं और मीडिया उसे पूरा महत्व देता है। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में एक न्यायिक विवाद में गवाह पर हमले की खबर आई तो प्रियंका वाड्रा ने ट्वीट किया,''दलित पर हमला किया गया।'' जबकि ये राजपूत समुदाय के दो लोगों के बीच आपसी विवाद का मामला था। कुछ ऐसी ही स्थिति पी. चिदंबरम की है, जो आर्थिक गबन के मामले में तिहाड़ जेल की हवा खा रहे हैं। जेल में उनके पास मोबाइल या कंप्यूटर नहीं है, लेकिन उनके नाम से आर्थिक से लेकर विदेश नीति तक के मामलों पर ट्वीट किए जा रहे हैं। मीडिया इनको महत्वपूर्ण बयान की तरह दिखा रहा है। सवाल उठता है कि न्यायालय के आदेश पर जेल में बंद एक नेता को राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बनाए रखने का ये खेल किसके इशारे पर हो रहा है?
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने एक कार्यक्रम में असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी की प्रशंसा की और कहा कि इसे लेकर मीडिया के एक वर्ग ने भ्रम फैलाने की कोशिश की थी। ज्यादातर अखबारों और चैनलों ने उनकी बात के इस हिस्से को हटा दिया। अखबारों ने अवैध घुसपैठियों की गंभीर समस्या पर देश के मुख्य न्यायाधीश के विचारों को अंदर के पन्नों में छिपाकर छापा। जबकि निचली अदालत का कोई जज या कोई अन्य संस्था एनआरसी के विरोध में बोल दे तो यही मीडिया उसे प्रमुखता के साथ छापता है। एक राष्ट्रीय महत्व के विषय पर मीडिया के इस संदिग्ध व्यवहार के पीछे कौन सी ताकतें हैं, यह अब किसी से छिपा नहीं है।
राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर अखबार और चैनल किसी खबर को कैसे बदल देते हैं, इसके भी ढेरों उदाहरण देखने को मिल रहे हैं। बीते महीने के लिए जीएसटी की वसूली के आंकड़े आए। इसमें अच्छी-खासी बढ़त थी। लेकिन कुछ अखबारों और चैनलों ने इसे भी गिरावट के तौर पर दिखाया। ताकि आर्थिक मंदी के नाम पर जारी राजनीति को और खाद-पानी मिल सके। अक्तूबर महीने में ऑटो क्षेत्र की बिक्री के आंकड़े भी यही इशारा कर रहे हैं कि अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे सुस्ती के माहौल से निकल रही है। लेकिन आजतक जैसे चैनल और नवभारत टाइम्स जैसे अखबार ने फर्जी खबर चलाई कि त्यौहारों के सीजन में भी इस क्षेत्र को कोई राहत नहीं है।