माफी मांगकर अदालत से छूटते ही पलट गए राहुल गांधी
   दिनांक 15-नवंबर-2019
अदालत से फटकार खाने और अदालत में राफेल मामले में मुंह की खाने के बाद राहुल गांधी और उनकी पार्टी फिर उसी बयानबाजी पर वापस लौट आए हैं. एक बार फिर देश को भ्रमित करने की कोशिश. एक बार फिर लचर और भ्रामक सवाल उछाले

“बेस प्राइस पहले से कम है... सेव और संतरे की तुलना नहीं की जा सकती... रफाल में गड़बड़ी के सबूत नहीं हैं... “ राफेल पर सर्वोच्च न्यायालय की बेंच ने यह फैसला एकमत से फैसला दिया, जिसकी अध्यक्षता स्वयं मुख्य न्यायाधीश कर रहे थे. न्यायालय ने कहा कि राफेल पर आरोप लगाने वाले कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाए. न्यायालय ने अपना फैसला सुना दिया और फैसले के साथ बेंच के जस्टिस जोसेफ ने लिखा कि इसके बाद भी “सीबीआई अगर चाहे तो जांच कर सकती है..” जस्टिस जोसेफ ने ऐसा क्यों लिखा? क्योंकि अदालत में सुनवाई के दौरान कुछ ऐसे बिंदु आए जिन पर कोर्ट ने माना कि ये विमान तकनीकी और वायुसेना की ज़रूरतों से जुडी बातें हैं, जिनका फैसला अदालत नहीं कर सकती. तो फिर इन पर राय देने वाली अधिकृत संस्था और व्यक्ति कौन होंगे वायुसेना और वायुसेना के अधिकारियों के अतिरिक्त? वायुसेना ने राफेल विमान और राफेल डील को सौ में से सौ अंक देकर पास किया है. फिर भी सवाल उठाने वाले चाहें तो सीबीआई के पास जाएं, ऐसा जस्टिस जोसेफ ने लिखा. लेकिन राफेल सौदे को उन्होंने भी सही करार दिया.
सर्जिकल स्ट्राइक के नायक का बयान
बालाकोट पर जिनके नेतृत्व में भारत की वायुसेना ने धमाकेदार सर्जिकल स्ट्राइक की, उन पूर्व वायुसेना प्रमुख बी एस धनोआ ने अदालत के फैसले के बाद कहा कि दिसंबर 2018 में ही मैंने इस बारे में बयान जारी किया था लेकिन तब “कुछ लोगों” द्वारा कहा गया कि मैं राजनीतिक बन रहा हूँ. मुझे उम्मीद है कि अब राफेल पर बहस को बंद कर दिया जाएगा, क्योंकि ऐसी राजनीति करने से अपनी सेना का नुकसान होता है. ऐसा करने से न केवल राफेल जैसा आवश्यक सौदा प्रभावित होता है, बल्कि दूसरे रक्षा सौदे भी लटकने लगते हैं क्योंकि भ्रम का वातावरण बनता है.
धनोआ ने पहले कहा था कि “राफेल डील बहुत अच्छी डील है. वायुसेना को बहुत अच्छा विमान मिला है. डील पूरी तरह पारदर्शी है..” दरअसल खरीद की पूरी प्रक्रिया वायुसेना की निगरानी और वायुसेना की अनुमति-सहमति से हुई है. इसके दस्तावेज अदालत के सामने पेश किये गए हैं. इसलिए वायुसेना प्रमुख विश्वास के साथ ये बात कह सके. इसीलिए अदालत ने कहा था कि “कुछ लोगों के मत के आधार पर हम फैसला नहीं दे सकते. राफेल खरीद नियमों के तहत की गई है.”
अदालत से छूटते ही पलटे राहुल
चुनाव का माहौल बनाने के लिए “चौकीदार चोर है...” का आलाप करते देशभर में घूमे कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष को भी अदालत ने लताड़ लगाईं. एक अलग फैसले में राहुल गांधी को चेतावनी देते हुए न्यायमूर्ति ने कहा कि राहुल को बोलते समय सावधान रहना चाहिए. राहुल ने मीडिया के सामने झूठ बोला था कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी कह दिया है कि चौकीदार चोर है. अपने इस बयान पर राहुल ने अदालत में बिना शर्त अदालत माँगी, और न्यायालय की अवमानना और अदालत को लेकर झूठ बोलने के मामले से अपनी जान छुड़ाई. लेकिन अदालत से छूटते ही फिर बोलना शुरू कर दिया कि राफेल के मामले में अदालत के फैसले से जाँच का रास्ता खुल गया है, और तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए.
मजबूर दरबारी
राहुल गांधी के इस राग पर उनके दरबारी सुर में सुर मिलाने को मजबूर हैं. परन्तु सत्य ये है कि राहुल के इस तरह के दुस्साहसों से कोई भी पार्टी प्रवक्ता अकेले में माथा ठोकेगा ही. वो अदालत का नाम लेकर झूठे बयान दे देते हैं. वो वायुसेना और रक्षा विशेषज्ञों की परवाह नहीं करते. राहुल की जगह कोई भी मंजा हुआ राजनेता होता तो वो देश के जनमानस और हालात - हकीकत को समझ कर मुंह खोलता. देशवासियों में, अदालत-वायुसेना और मोदी, तीनों की विश्वसनीयता, राहुल गांधी से बहुत ज्यादा है, और इस तरह के गैरजिम्मेदार बयान देकर वो इसे और नीचे ले जा रहे हैं. उनके लिए बच निकलने का एक रास्ता यह हो सकता था कि वो बयान देते कि वो न्यायालय के फैसले का सम्मान करते हैं, और जागरूक विपक्ष की भूमिका निभाते रहेंगे. पर ये राहुल गांधी हैं, वो एक बार फिर जेपीसी जांच की हास्यास्पद मांग पर अड़ गए हैं.
फिर वही मजाक
जेपीसी याने जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी. संयुक्त संसदीय दल. जिसमें सभी पार्टियों के सांसद हों, जैसे कांग्रेस, सपा, बसपा, ओवैसी और सत्तारूढ़ पक्ष के सांसद. राहुल की माँग के अनुसार ये लोग मिलकर राफेल मामले के उन तकनीकी पहलुओं की जांच करें, जिनकी जांच करने में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं को असमर्थ पाया. जिनकी जांच वायुसेना के प्रशिक्षित अधिकारी कर चुके हैं, और राफेल सौदा जिनकी रजामंदी से हुआ है. कुल मिलाकर राहुल और उनकी पार्टी की समस्या ये है कि वो अपने पहले के बयानों में इस कदर फंस चुके हैं, कि बाहर निकलने का सम्मानजनक रास्ता बचा नहीं है.

एक बार फिर नौ झूठ उछाले....
इसलिए उनके प्रवक्ताओं ने फिर वही घिसे-पिटे सवाल उछाल दिए जिनका उत्तर बार-बार दिया जा चुका है. राहुल की हरी झंडी मिलते ही रणदीप सुरजेवाला ने नौ सवाल पूछे. ये सवाल और उनके जवाब संक्षेप में इस प्रकार हैं -
सवाल 1- एचएएल को कॉन्ट्रैक्ट क्यों नहीं दिया ?
जवाब - एचएएल राहुल-सोनिया गांधी की यूपीए सरकार के दौरान ही राफेल सौदे बातचीत से बाहर हो गया था| सौदा यदि तय हो जाता तो रफाल निर्माता कंपनी दसौं एचएएल को 108 विमानों के निर्माण के लिए बिना आयुधों की तकनीक के, सिर्फ खाली विमान की) तकनीक देती, लेकिन वो भी न हो सका. एचएएल की हालत कांग्रेस सरकारों ने इतनी खराब करके रखी कि दसौं कम्पनी हमारे एचएएल के साथ साझेदारी करने को तैयार ही नहीं हुई. उसने तो मनमोहन सरकार से एचएएल के साथ सौदा करने से साफ़ मना कर दिया था. और कहा था कि यदि भारत सरकार ज्यादा जोर देगी तो एचएएल के बनाए गए रफाल विमानों की जिम्मेदारी (गारंटी) दसौं नहीं लेगी.
सवाल 2- एक 12 दिन पुरानी कम्पनी जिसे कोई तर्जुबा नहीं था, उसे ( याने रिलायंस को) कॉन्ट्रैक्ट कैसे दे दिया ?
जवाब - रिलायंस को विमान बनाने का ठेका नहीं मिला है. रिलायंस को टाटा, गोदरेज, विप्रो, महिंद्रा जैसी कंपनियों के साथ माल आपूर्ति का ठेका मिला है. और यह शर्त यूपीए ने ही बातचीत में जोड़ी थी.
सवाल 3- 526 करोड़ का जहाज़ 1600 करोड़ में ख़रीद कर राजस्व को 41,205 करोड़ का नुक़सान क्यों पहुंचाया गया ?
जवाब - अदालत और वायुसेना दोनों ने स्पष्ट किया है कि मोदी सरकार के खरीदे गए विमान का बेस प्राइस यूपीए के समय से कम है. और आयुध से युक्त राफेल की तुलना यूपीए के समय खरीदे जाने वाले (अगर खरीदे जाते) खाली विमान से करना वैसा ही है जैसे ‘सेव और संतरे’ की तुलना करना.

सवाल 4- राष्ट्रीय सुरक्षा को नुक़सान क्यों पहुंचाया गया जब ज़रूरत 126 विमानों की थी मोदी जी ने उसे कम कर के 36 कर दिया ?
जवाब - यूपीए के रक्षा मंत्री एंटनी ने प्रेस के सामने कहा था कि सरकार के पास राफेल खरीदने के लिए पैसा नहीं है. यानी 126 विमानों की सिर्फ बात हुई थी, सौदा नहीं. मोदी सरकार ने 126 खाली विमानों की जगह 36 विमान खरीदे, जो घातक मिसाइलों और नयी तकनीक से युक्त हैं.जिनसे वायुसेना संतुष्ट है. इसके साथ ही वायुसेना को दुश्मन के विमानों और मिसाइलों से बचाव के लिए रूस से खरीदा गया दुनिया का सर्वश्रेष्ठ एस-400 मिसाइल तंत्र दिया गया है, जिसका अमेरिका विरोध कर रहा था.

सवाल 5- रक्षा खरीद प्रक्रिया और सुरक्षा पर बनी कैबिनेट कमेटी को किनारे करके एक तरफ़ा जहाज़ ख़रीद की घोषणा क्यों की गयी ?
जवाब - एकतरफा जहाज खरीदी के आरोप को अदालत ने खारिज कर दिया है, और कहा है कि खरीदी की प्रक्रिया से वो संतुष्ट हैं. अदालत के सामने साक्ष्य रखे गए कि राफेल खरीद के लिए हर नियम का पालन किया गया.

सवाल 6- भाजपा सरकार ने देश को राफेल जहाज़ बनाने की तकनीक ट्रांसफर से वंचित क्यों कर दिया ?
जवाब - राफेल निर्माता तकनीक (विमान और आयुध तथा मॉडिफिकेशन की तकनीक सहित) ट्रांसफर के लिए कम से कम 200 विमानों की खरीद की शर्त रख रहे हैं. फिलहाल ये संभव नहीं है. वायुसेना भी दूसरे विकल्पों को टटोल रही है.

सवाल 7 - जब जहाज़ इमरजेंसी (आपात) ख़रीद प्रावधान के तहत ख़रीदे जा रहे हैं, तो उनकी प्राप्ति में 8 साल की देरी क्यों ?
जवाब - विमानों की डिलीवरी में 8 साल नहीं लग रहे. सौदा 2016 में तय हुआ. पहले 4 विमान अगले साल मई में भारत को मिल जाएंगे. दूसरी बात, आधुनिक लड़ाकू विमान दुकानों के काउंटर पर रखे नहीं होते कि पैसे देकर उठा ले जाओ. सौदे की लम्बी प्रक्रिया के बाद इनका निर्माण प्रारंभ होता है. उनमें खरीददार की आवश्यकता के अनुसार नई तकनीक जोड़ी जाती है. हर विमान पर हजारों घंटों का परीक्षण होता है. तब जाकर ये आपके पास पहुंचते हैं. और प्रति प्रश्न ये कि पिछले 60 सालों में वायुसेना के लिए ये ‘इमरजेंसी’ के हालात किसने बनाए? और यह कांग्रेस को यूपीए को दस सालों के सत्ता काल में क्यों नहीं दिखाई दिया ?
सवाल 8 - सुरक्षा पर बनी कैबिनेट कमेटी, जिसके प्रमुख मोदी जी हैं, उसने राफेल जहाज़ की कुल कीमत को 5.2 बिलियन यूरो से बढ़ाकर 8.2 बिलियन यूरो क्यों कर दिया यानी लगभग 40% इज़ाफ़ा क्यों कर दिया?
जवाब - इसका जवाब अदालत दे चुकी है, ‘सेव और संतरे’ का उदाहरण देकर.

सवाल 9 - क़ानून मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय की डिफेन्स एक्विजीशन विंग के ऐतराज़ के बावजूद सॉवरेन गारंटी की शर्त को दरकिनार क्यों किया गया ?
जवाब – अदालत में साबित हुआ है कि ऐसा कोई ऐतराज इन संस्थाओं के ओर से नहीं किया गया. सॉवरेन गारंटी तब ली जाती है जब आप किसी कंपनी से सौदा करते हैं. राफेल का सौदा भारत सरकार और फ़्रांस सरकार के बीच हुआ है. सौदेबाजी के कई प्रकार होते हैं. सौदे से सर्वोच्च न्यायालय, कैग और वायुसेना संतुष्ट हैं.

स्पष्ट है कि अदालत का फैसला आने के बाद कांग्रेस उसी रवैये पर लौट आई है जिस रवैये पर वह 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान थी. देश की सुरक्षा, वायुसेना का सम्मान और कैग जैसी संस्थाओं की साख को चोट पहुंचाने के अपने घातक मिशन में राहुल गांधी एक बार फिर जुट गए हैं. कहा जा सकता है कि बाल दिवस (14 नवम्बर) पर अदालत से मिली फटकार उनके किसी काम नहीं आई.