राम का नाम लो और आगे बढ़ो!
   दिनांक 15-नवंबर-2019
जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि, उत्तर दिसि बह सरजू पावनि।
जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा, मम समीप नर पावहिं बासा।।
यह सुहावनी नगरी मेरी जन्मभूमि है। इसके उत्तर में जीवों को पावन करने वाली सरयू नदी बहती है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य बिना परिश्रम मेरे समीप निवास पा जाता है।— उत्तरकांड, रामचरित मानस

 
एक कविता की पंक्तियां हैं-
यह भरत की भूमि है, भूगोल की सीमा नहीं बस।
इसी तरह है अयोध्या! यह केवल भूखंड या कोई नाम भर नहीं है!
जिन्हें इस बात में कुछ संदेह हो निश्चित ही वे ऐसे लोग होंगे जो यह नहीं जानते कि इस देश में बहुतांश लोग इस नगरी का नाम ‘जी’ प्रत्यय लगाए बिना नहीं पुकारते। अयोध्या नहीं, अयोध्या जी!
कहा होगा शेक्सपियर ने कि नाम में क्या रखा है, किन्तु कहा होगा दुनिया के किसी और हिस्से और परिस्थिति के संदर्भ में। क्योंकि मनुष्य के धरती पर आते ही उसे अर्थपूर्ण नाम देने वाला, संस्कारित करने वाला समाज यह सोच ही नहीं सकता कि नाम में क्या रखा है!
नाम ठीक हो, काम ठीक हो और ‘अपने राम’ सबको ऐसी ठीक लीक पर चलाए रहें कि पुरखों का नाम मैला न हो, यहां तो जीवन की चाह, इसका निचोड़ इतना ही है।
कलियुग में भी ‘मर्यादा’ का यह मंत्रपाठ कैसा है, किसके कारण है!
यहां भूगोल की आधुनिक रेखाओं से पुराना भारत और अयोध्या को ‘अयोध्या जी’ बनाने वाली छवि उभरती है! यह राम हैं।
सबको दिशा-भरोसा देने वाले राम। निषाद के दाता राम। अहिल्या-शबरी के त्राता राम। सुग्रीव-भरत के सखा-भ्राता .. सब राम ही तो हैं।
श्री रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसीलिए कहा-
कलियुग केवल नाम अधारा, सुमिर-सुमिर नर उतरहिं पारा।।
हम भारतीयों के लिए जिस तरह अयोध्या सिर्फ अयोध्या नहीं है उसी तरह मानस केवल ग्रंथ नहीं, जीवन की भटकन समाप्त करने वाला दिशासूचक है।
जो समाज ‘राम-राम’ के परस्पर अभिवादन से लेकर किसी व्यक्ति के अंतिम प्रयाण के समय भी ‘राम नाम सत्य है’ की टेक लगाता है उसके लिए यह असह्य था कि उससे ‘राम’ का ही प्रमाण मांगा जाए!
9 नवंबर को देश के शीर्ष न्यायालय ने केवल निर्णय नहीं दिया, इस असहनीय पीड़ा का अंत किया है।
इस निर्णय की यूं तो बहुत सारी और बहुत लंबी व्याख्याएं हो सकती हैं किन्तु इसके तीन बहुत महत्वपूर्ण आयाम हैं-
-पहला आयाम है जनता को साफ-साफ समझ आने लायक फैसला होना। निर्णय की सर्वप्रमुख बात यह है कि इसमें किसी तरह का धुंधलापन या उलझाव नहीं है। फैसले में कहा गया कि हिन्दुओं की आस्था अयोध्या के बारे में भगवान राम के जन्मस्थान के रूप में है। इसे चुनौती नहीं दी जा सकती।
राष्ट्रव्यापी सामाजिक जुड़ाव वाले इस सबसे पुराने और संवेदनशील फैसले को मात्र 1045 पृष्ठ में समेटना सहज नहीं था। कहा जा सकता है कि जिस तरह तथ्यों की छंटाई हुई और अनावश्यक बातों को बुहारते हुए फैसले की राह बनी उसमें तथ्यपरकता के आग्रह ने इसे संक्षिप्त और स्पष्ट बना दिया। निर्णय से यह बात एकदम साफ हो गई कि अब तक जिस भूमि को विवादित कहा जा रहा था उस पर हिन्दू समाज की दावेदारी ही ठीक यानी ‘विधि सम्मत’ है।
-इस ऐतिहासिक निर्णय की दूसरी प्रमुख बात है न्यायाधीशों के मध्य सर्वसम्मति होना। पीठ ने एक स्वर से कहा कि विवादित 2.77 एकड़ जमीन अब केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगी जो इसे सरकार द्वारा बनवाए जाने वाले ट्रस्ट को सौंपेंगे। दरअसल, 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जैसा फैसला दिया था उससे चीजें और उलझ गई थीं। बहुत हद तक एक-सी होने पर भी ‘जन्मस्थान’ पर पीठ की बंटी हुई राय की बहुत चर्चा हुई थी। साथ ही विवादित जमीन को सभी पक्षकारों में बराबर बांटने का फैसला इसलिए भी किसी के गले नहीं उतरा, क्योंकि किसी ने इस बात की मांग ही नहीं की थी। जो किसी ने मांगा नहीं, सोचा नहीं, वैसा निर्णय आने का अर्थ यह हुआ कि इससे समाज में तनाव बढ़ा। भारत की संवैधानिक संस्थाओं पर हल्ला बोलने वालों को, समाज की विभाजक रेखाओं पर ‘खेलने’ वालों को मौका मिला। शीर्ष न्यायालय की संवैधानिक पीठ का एकमत होना समाज को बांटने-तोड़ने की मंशा पालने वालों पर भी कुठाराघात है।
-इस निर्णय का तीसरा महत्वपूर्ण पहलू है भारतीय न्यायपालिका की निर्णय क्षमता की साख बढ़ना। सामाजिक तौर पर अस्वीकार्य चीजों को बढ़ाते हुए न शासन चल सकते हैं और न न्यायतंत्र का सम्मान बढ़ सकता है। इस फैसले ने सिद्ध किया कि भारत में पुराने से पुराने, जटिल से जटिल बना दिए गए मामलों पर अदालत खुलकर निर्णय दे सकती है। जो बातें फैसले में आर्इं यदि ठीक इन्हीं बातों पर मध्यस्थता हो भी जाती, या फिर अदालत सबको संतुष्ट रखने की दृष्टि से बचते-बचाते फैसला देते दिखती तो इससे विघ्नसंतोषियों को ही मौका मिलता। ऐसे किसी संकेत मात्र तक से बचते हुए न्यायालय ने 40 दिन तक लगातार सुनवाई और अथक परिश्रम का उदाहरण प्रस्तुत किया। 500 वर्ष पुराने मामले में 533 साक्ष्यों और 88 गवाहियों का अध्ययन करते हुए पीठ ने जो आकलन प्रस्तुत किया वह अपने आप में एक मिसाल है।
पाञ्चजन्य के इस अंक में सिर्फ फैसले की व्याख्या नहीं है। हमने प्रयास किया है कि भारत के सबसे बड़े सांस्कृतिक आंदोलन के विभिन्न आयामों, इसे सुगठित रूप देने वाली विभूतियों और इसके हर पड़ाव के शिलालेखों को अपने पाठकों के सामने रख सकें। यह जरूरी था क्योंकि इस फैसले, इसकी स्वीकार्यता और लंबे चले आंदोलन की परिणति में इस देश की भूमि पर जन्मे सभी को एकजुट करने के सूत्र हैं। आपको हमारा प्रयास कैसा लगा जरूर बताइएगा।